राजस्थान के सीकर जिले में अरावली पर्वतमाला की सुरम्य घाटियों के बीच बसा जीणमाता धाम सदियों से सनातन आस्था और लोक परंपरा का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। यह पावन तीर्थ केवल धार्मिक मान्यताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि सदियों पुराने गौरवशाली इतिहास, स्थापत्य कला और कई ऐतिहासिक घटनाओं को भी समेटे हुए है। श्रद्धालुओं की अटूट निष्ठा का प्रतीक माने जाने वाले इस पवित्र स्थल का जुड़ाव मुगल काल के कई रोचक प्रसंगों से रहा है, जिनकी वजह से माता को लोकमानस में विशेष पहचान मिली।
मुगल सेना का आक्रमण और मधुमक्खियों का प्रहार
जीणमाता मंदिर से जुड़ी ऐतिहासिक और लोक मान्यताओं में सबसे चर्चित प्रसंग मुगल शासक औरंगजेब के दौर का माना जाता है। उस समय जब साम्राज्य की सेनाएं देश के कई क्षेत्रों में धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुंचाने का अभियान चला रही थीं, तब सैनिकों की एक टुकड़ी सीकर स्थित जीणमाता मंदिर को नष्ट करने के इरादे से आगे बढ़ी थी। जैसे ही हमलावर सैनिक मंदिर के द्वार तक पहुंचे और तोड़फोड़ की कोशिश शुरू की, वहां मौजूद पुजारियों और भक्तों में भारी खलबली मच गई।
मुगल सेना के दबाव के बीच पुजारियों और श्रद्धालुओं ने पूर्ण श्रद्धा भाव से जगदम्बा मां जीणमाता से रक्षा की गुहार लगाई। मान्यता है कि भक्तों की इस प्रार्थना के तुरंत बाद अरावली की कंदराओं और मंदिर के आसपास के क्षेत्रों से अचानक असंख्य भंवरों यानी मधुमक्खियों का विशाल झुंड उमड़ पड़ा। इन भंवरों ने पूरी शक्ति के साथ हमलावर सैनिकों पर भीषण धावा बोल दिया। मधुमक्खियों के लगातार डंक मारने से सैनिकों की कतारें बिखर गईं, उनके बीच चीख-पुकार मच गई और वे अपनी जान बचाने के लिए मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए। इस घटना के बाद औरंगजेब की टुकड़ी को उल्टे पांव लौटना पड़ा और तभी से जीणमाता को जनसाधारण के बीच 'भंवरों की देवी' के नाम से जाना जाने लगा। प्रचलित वृत्तांतों के अनुसार, इस हैरतअंगेज घटनाक्रम से प्रभावित होकर बाद में औरंगजेब ने मंदिर में जलने वाली अखंड ज्योति के लिए नियमित तेल भेजने की व्यवस्था भी शुरू की थी।
आठ ऐतिहासिक शिलालेख बयां करते हैं प्राचीन विरासत
यह धार्मिक स्थल केवल मौखिक परंपराओं या दंतकथाओं पर आधारित नहीं है, बल्कि पुरातात्विक साक्ष्यों के जरिए भी इसकी प्राचीनता प्रमाणित होती है। अनुसंधानकर्ताओं ने मंदिर परिसर की गहन पड़ताल के बाद यहां से करीब आठ महत्वपूर्ण शिलालेख प्राप्त किए हैं। इनमें सबसे प्राचीन अभिलेख विक्रम संवत 1029 का है, जो अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार लगभग 972 ईस्वी बैठता है। इसके अलावा परिसर में संवत 1132 और संवत 1162 के दौर के शिलालेख भी सुरक्षित अवस्था में मौजूद हैं।
संवत 1162 यानी लगभग 1105 ईस्वी के शिलालेख में प्रसिद्ध चौहान वंशीय शासक पृथ्वीराज प्रथम के शासनकाल का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। ऐतिहासिक दस्तावेजों और अभिलेखीय संदर्भों में यह बात भी दर्ज मिलती है कि मोहिल वंश के हट्टड़ अथवा हन्ड नामक व्यक्ति ने इस विशाल मंदिर का निर्माण या जीर्णोद्धार कराया था। पत्थरों पर उत्कीर्ण ये प्रमाण इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि यह पावन धाम 1000 वर्ष से भी अधिक पुराना है और राजपूत कालीन स्थापत्य का साक्षी रहा है।
शारदीय नवरात्र महोत्सव और विशेष श्रृंगार
वर्तमान समय में जीणमाता धाम में नौ दिवसीय शारदीय नवरात्र मेले का भव्य आयोजन किया जा रहा है, जिसमें भाग लेने के लिए देश के विभिन्न कोनों से लाखों श्रद्धालु सीकर पहुंच रहे हैं। नवरात्र के पावन उत्सव के दूसरे दिन मां के द्वितीय स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी के रूप में प्रतिमा का मनमोहक श्रृंगार किया गया। मंदिर के मुख्य पुजारी भवानी शंकर शर्मा ने इस विषय में जानकारी देते हुए स्पष्ट किया कि ब्रह्मचारिणी का यह रूप साधकों और भक्तों को आत्मबल, तप, नियम और संयम का मार्ग अपनाने की प्रेरणा प्रदान करता है।
इस वर्ष नवरात्र उत्सव को अत्यंत भव्य और सुगंधित रूप देने के लिए उत्तर प्रदेश के इत्र नगरी कहे जाने वाले कन्नौज से विशेष केसरिया इत्र मंगवाया गया है। इसी इत्र के साथ-साथ कन्नौज के महकते प्राकृतिक फूलों और पांच विभिन्न पारंपरिक सुंदर पोशाकों से गर्भगृह तथा माता के दरबार को सजाया गया है। मंदिर प्रबंधन की ओर से माता को ताजे फलों और विविध मेवों का विशेष भोग लगाया गया है। दर्शनार्थियों की भारी भीड़ को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा के चाक-चौबंद प्रबंध किए गए हैं और पूरा अरावली क्षेत्र माता के जयकारों से गुंजायमान हो रहा है।




















