दैनिक जीवन में सीढ़ियां चढ़ते समय घुटनों से अचानक कट-कट जैसी आवाज सुनाई देना या फर्श पर पालथी मारकर बैठने के बाद खड़े होने में भारीपन महसूस होना बेहद आम बात है। कई लोग घंटों कुर्सी पर बैठने के बाद उठते समय जोड़ों में खिंचाव या परेशानी महसूस करते हैं। अधिकांश लोग इन शारीरिक बदलावों को सिर्फ उम्र का स्वाभाविक प्रभाव समझकर छोड़ देते हैं। वहीं कुछ लोगों के मन में यह डर बैठ जाता है कि उनकी हड्डियां तेजी से घिस रही हैं और वे गठिया का शिकार हो चुके हैं। हकीकत यह है कि हर आवाज किसी गंभीर बीमारी का संकेत नहीं होती, लेकिन इसे पूरी तरह नजरअंदाज करना भी भारी पड़ सकता है। घुटनों की आंतरिक बनावट और कार्यप्रणाली को समझकर ही इस ध्वनि और उसके प्रभावों का सही आकलन किया जा सकता है।
घुटनों से आने वाली आवाज की आंतरिक संरचना और कारण
घुटनों की बनावट में तीन मुख्य हिस्से यानी कंपार्टमेंट शामिल होते हैं। इनमें सामने की तरफ मौजूद भाग को पेटेलोफेमोरल कंपार्टमेंट कहा जाता है। इसके अलावा अंदरूनी हिस्से को मीडियल कंपार्टमेंट और बाहरी हिस्से को लेटरल कंपार्टमेंट के रूप में पहचाना जाता है। घुटने के बिल्कुल सामने पटेला यानी घुटने की टोपी स्थित होती है। जब हम पैर मोड़ते या सीधा करते हैं, तो इस पटेला की स्थिति और उसकी स्वाभाविक गति में असंतुलन आने पर कट-कट की आवाज पैदा हो सकती है।
कई मामलों में पटेला अपनी सामान्य पटरी या खांचे में सही तरीके से फिसलने के बजाय थोड़ा इधर-उधर खिसक जाता है, जिसे चिकित्सकीय भाषा में पटेला मैलट्रैकिंग कहते हैं। इसके साथ ही जांघ और घुटने के आसपास की मांसपेशियों में ताकत का असंतुलन होने पर भी जोड़ पर असमान दबाव पड़ता है। एआईओआर सुपर स्पेशियलिटी यूनिट के ऑर्थोपेडिक सर्जन और रोबोटिक एक्सपर्ट डॉ. आशीष सिंह के अनुसार, घुटनों से आने वाली यह चटकने जैसी आवाज ऑस्टियोआर्थराइटिस का शुरुआती संकेत हो सकती है। हालांकि केवल इस आवाज के आधार पर यह निश्चित नहीं किया जा सकता कि कार्टिलेज नष्ट हो रही है या गठिया विकसित हो चुका है। इसके सटीक निदान के लिए संबंधित लक्षणों की व्यवस्थित जांच आवश्यक होती है।
ध्वनि के अलावा इन लक्षणों पर तुरंत दें ध्यान
यदि घुटने से आने वाली आवाज के साथ रोजमर्रा की सामान्य गतिविधियों में रुकावट आने लगे, तो सतर्क होना बेहद जरूरी है। चलने-फिरने या बैठने में हो रही असुविधा जोड़ों के अंदरूनी तनाव को दर्शाती है।
- सीढ़ियां चढ़ने अथवा नीचे उतरते समय घुटनों में असामान्य खिंचाव या दर्द महसूस होना।
- काफी देर तक एक ही स्थिति में बैठने के बाद एकाएक खड़े होने पर जोड़ों का जाम महसूस होना।
- भारतीय शैली के शौचालय में बैठने अथवा उठने के दौरान घुटने मोड़ने में तीव्र कठिनाई होना।
- जमीन पर पालथी मारकर बैठने में असमर्थता या नीचे से सहारे के बिना खड़े न हो पाना।
- घुटनों के साथ-साथ हाथों अथवा शरीर के अन्य जोड़ों में भी दर्द और सूजन का अनुभव होना।
इन सभी लक्षणों का होना हर बार पूर्ण गठिया की पुष्टि नहीं करता, लेकिन यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि जोड़ सामान्य रूप से काम नहीं कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में समय रहते हड्डी रोग विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए, ताकि जोड़ को पहुंचने वाले संभावित नुकसान को समय रहते नियंत्रित किया जा सके।
शारीरिक वजन का प्रभाव और मांसपेशियों की कसरत
उम्र बढ़ने के साथ शरीर के तमाम अंगों की तरह जोड़ों के ऊतकों में भी स्वाभाविक बदलाव आते हैं। ऑस्टियोआर्थराइटिस की स्थिति में मुख्य रूप से जोड़ के सिरों पर मौजूद सुरक्षात्मक कार्टिलेज प्रभावित होती है। जब शरीर का वजन जरूरत से ज्यादा बढ़ जाता है, तो दोनों घुटनों पर पड़ने वाला भार कई गुना बढ़ जाता है। यह अतिरिक्त दबाव कार्टिलेज के घिसने की गति को तेज कर सकता है।
जोड़ों को सुरक्षित रखने के लिए वजन पर नियंत्रण बनाए रखना प्राथमिक उपाय है। इसके साथ ही घुटने को सहारा देने वाली मांसपेशियों को मजबूत करने वाले कसरत नियमित रूप से करने चाहिए। व्यायाम का चयन हमेशा व्यक्ति की शारीरिक क्षमता, घुटने की स्थिति और दर्द की तीव्रता को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। किसी भी व्यायाम को गलत तरीके से करने पर जोड़ पर विपरीत असर पड़ सकता है, इसलिए जरूरत पड़ने पर योग्य फिजियोथेरेपिस्ट से सही व्यायाम का प्रशिक्षण लेना लाभदायक रहता है।
पोषण, कैल्शियम और विटामिन डी का महत्व
हड्डियों के ढांचे और जोड़ों की मजबूती के लिए खानपान में आवश्यक पोषक तत्वों की उपस्थिति अनिवार्य है। शरीर में कैल्शियम और विटामिन डी का पर्याप्त स्तर हड्डियों के घनत्व को सुरक्षित रखता है। इन दोनों तत्वों की कमी होने पर हड्डियां कमजोर हो सकती हैं और जोड़ों पर पड़ने वाले दैनिक दबाव को सहन करने की क्षमता घट जाती है।
संतुलित आहार के जरिए जरूरी पोषक तत्वों की आपूर्ति सुनिश्चित करने के साथ-साथ धूप और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय परामर्श से इन तत्वों की पूर्ति की जानी चाहिए। शुरुआती दौर में ही जीवनशैली में सुधार करने, उचित व्यायाम अपनाने और वजन नियंत्रित रखने से जोड़ों के बिगड़ने की प्रक्रिया को काफी हद तक धीमा किया जा सकता है।
क्या जोड़ों के क्षरण को धीमा करना संभव है?
ऑस्टियोआर्थराइटिस का निदान होने का अर्थ यह कतई नहीं है कि व्यक्ति के पास कोई चिकित्सीय विकल्प समाप्त हो चुका है। समस्या की अवस्था और गंभीरता के आधार पर इलाज के कई सुरक्षित और प्रभावी मार्ग उपलब्ध हैं। शुरुआती और मध्यम स्तर पर नियमित व्यायाम, व्यवस्थित फिजियोथेरेपी, वजन प्रबंधन और आवश्यक दवाओं के संयोजन से लक्षणों पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
उन्नत चिकित्सा पद्धतियों के तहत कुछ चयनित मरीजों में विशेष रीजनरेटिव प्रक्रियाओं का इस्तेमाल भी किया जाता है। इनमें पीआरपी (PRP), बोन मैरो एस्पिरेट कंसंट्रेट और एसीपी मैक्स जैसी आधुनिक तकनीकें शामिल हैं, जो जोड़ों के भीतर सुधार लाने में मदद करती हैं। इस प्रकार की उन्नत स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए मरीजों को बड़े महानगरों या राज्य से बाहर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि पटना स्थित एआईओआर सुपर स्पेशियलिटी यूनिट में यह सभी आधुनिक उपचार विकल्प सुलभ हैं।




















