राजस्थान के पंचायती राज चुनावों का बिगुल बजते ही ग्रामीण इलाकों की राजनीति का तापमान तेजी से ऊपर चढ़ने लगा है। एक तरफ जहां संभावित प्रत्याशी अपनी मजबूत दावेदारी पेश करने की हरसंभव कोशिश में जुटे हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ बड़े मंत्रियों और राजनीतिक दिग्गजों द्वारा अपने करीबी रिश्तेदारों को चुनाव मैदान में उतारने की प्रथा ने एक गंभीर बहस को हवा दे दी है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच यह बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या लोकतंत्र में केवल नेताओं के परिवार के सदस्यों को ही तरजीह दी जानी चाहिए या फिर उन आम कार्यकर्ताओं को भी अपना हक मिलना चाहिए जो वर्षों से पार्टी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर जमीन पर पसीना बहाते आए हैं। इस संवेदनशील मुद्दे पर जब भीलवाड़ा की आम जनता और स्थानीय प्रतिनिधियों से चर्चा की गई, तो उन्होंने बिना किसी झिझक के अपनी बेबाक राय सामने रखी।
राजस्थान जन मंच के अध्यक्ष का कड़ा विरोध
राजस्थान जन मंच के अध्यक्ष और स्थानीय व्यापारी कैलाश सोनी ने इस परंपरा को पूरी तरह से गलत करार दिया है। उनका साफ कहना था कि यदि कोई मुख्य नेता खुद मैदान में उतरना चाहता है, तो इसमें किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए, लेकिन नेताजी द्वारा अपनी पत्नी, बच्चों या अन्य सगे-सम्बन्धियों के लिए टिकट की मांग करना और उस प्रक्रिया में अपने रसूख व ताकत का गलत इस्तेमाल करना सरासर अनुचित है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जो पार्टी कार्यकर्ता दिन-रात संगठन की नींव को मजबूत करने में जुटे रहते हैं, उसकी नीतियों के अनुसार काम करते हैं और हर आयोजन में झंडा-बैनर उठाते हैं, उनका हक ऐसे नेताओं के परिजनों की वजह से छीन लिया जाता है। टिकट वितरण हमेशा धरातल पर पसीना बहाने वाले कर्मठ कार्यकर्ताओं के पक्ष में ही होना चाहिए।
कार्यकर्ताओं का टूटता है भरोसा
सेन समाज के प्रतिनिधि संजय सेन ने इस परंपरा को तत्काल प्रभाव से रोके जाने की पुरजोर वकालत की है। उन्होंने अपनी बात रखते हुए स्पष्ट किया कि जो लोग जमीनी स्तर पर तन-मन से पार्टी के हित में काम करते हैं और रात-दिन एक कर देते हैं, उन्हें नजरअंदाज कर जब किसी पारिवारिक सदस्य को उम्मीदवार बना दिया जाता है, तो संगठन के प्रति कार्यकर्ताओं की आस्था हिल जाती है। लंबे समय तक पूरी ईमानदारी से काम करने के बावजूद जब हाथ निराशा लगती है, तो कार्यकर्ताओं के भीतर गहरा क्षोभ उत्पन्न होने लगता है और धीरे-धीरे उनका मोहभंग होने की स्थिति बन जाती है, जो किसी भी संगठन के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
आम कार्यकर्ता की घटती है भूमिका
युवा नेता लोकेश बासीता ने अपनी बात रखते हुए कहा कि मौजूदा दौर में आम कार्यकर्ता की स्थिति केवल भीड़ जुटाने या व्यवस्था संभालने तक ही सीमित कर दी गई है। कार्यकर्ता घर-घर जाकर समर्थन जुटाता है और नेताओं को ऊंचे पदों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाता है, लेकिन जब टिकट देने की बारी आती है तो उसका जमकर शोषण किया जाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन लोगों को वातानुकूलित कमरों से निकालकर सीधे चुनावी मैदान में उतार दिया जाता है, उन्होंने कभी संगठन के लिए संघर्ष का सामना नहीं किया होता है। वे केवल सत्ता का लाभ उठाकर किनारा कर लेते हैं, जिससे सामान्य कार्यकर्ताओं का भविष्य अधर में लटक जाता है और क्षेत्र के विकास कार्य भी बुरी तरह प्रभावित होते हैं।
विकास कार्यों में बाधा और जनता का बढ़ता गुस्सा
स्थानीय व्यापारी गौरव के अनुसार, राजनीति में परिजनों को टिकट देने की यह पुरानी प्रथा अब पूरी तरह अनुचित हो चुकी है। जो चेहरे पहले से ही विधायक, सांसद या मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर काबिज रहे हैं, बार-बार उनके ही परिवार के सदस्यों को प्राथमिकता दी जाती है, जिससे जमीनी स्तर के नए और सक्रिय लोगों को आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिल पाता है। इस प्रकार की राजनीतिक ठहराव की स्थिति के कारण आम जनता का आक्रोश लगातार भड़क रहा है और स्थानीय परेशानियां सही मंच तक नहीं पहुंच पाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप विकास के पहिए थम जाते हैं। अब ग्रामीण अंचल के लोग यही चाहते हैं कि परिवारवाद की इस संस्कृति को समाप्त किया जाए ताकि कर्मठ और जमीनी कार्यकर्ताओं को आगे आने का मौका मिले और विकास की गति को नई दिशा मिल सके।















