जयपुर से रवाना हुई राजस्थान सरकार की देवस्थान विभाग की मुख्यमंत्री वरिष्ठ नागरिक निःशुल्क तीर्थ यात्रा योजना प्रशासनिक लापरवाही और कुप्रबंधन का शिकार हो गई है। इस यात्रा के जरिए बुजुर्गों को सम्मानजनक और आरामदायक सफर का भरोसा दिया गया था, लेकिन कोलकाता और गंगासागर पहुंचे यात्रियों को इसके विपरीत बेहद दयनीय स्थितियों का सामना करना पड़ा। उदयपुर के राणा प्रताप नगर रेलवे स्टेशन से 10 अक्टूबर को कुल 970 बुजुर्गों को लेकर यह विशेष जत्था रवाना हुआ था, जहां पहुंचने के बाद यात्रियों की उम्मीदें टूट गईं और सरकारी दावों की पोल सबके सामने आ गई।
गंगासागर की ओर जाने वाली करीब 130 किलोमीटर लंबी बस यात्रा बुजुर्गों के लिए किसी शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना जैसी साबित हुई। महिला यात्रियों ने जब रास्ते में पानी पीने या शौचालय के लिए वाहन रुकवाने का आग्रह किया, तो ठेकेदार से जुड़े कर्मचारियों ने उनकी एक नहीं सुनी और साफ इनकार कर दिया। पूरी लंबी दूरी के दौरान बस को एक बार भी नहीं रोका गया, जिससे बुजुर्गों की मुश्किलें काफी बढ़ गईं। हालात तब और बिगड़ गए जब सफर के दौरान बस में तकनीकी खराबी आ गई और वह बीच रास्ते में ही बंद हो गई। धूप और खुले आसमान के नीचे बुजुर्ग यात्रियों को बिना किसी खान-पान के लगभग 6 घंटे तक सड़क किनारे भूखे-प्यासे बैठने पर मजबूर होना पड़ा, और इस संकट की घड़ी में मदद के लिए कोई भी प्रशासनिक अधिकारी या सरकारी नुमाइंदा वहां मौजूद नहीं था।
थ्री-स्टार सुविधाओं के दावे और धर्मशालाओं की हकीकत
योजना के निर्धारित नियमों और दिशानिर्देशों के तहत सभी तीर्थ यात्रियों को थ्री-स्टार श्रेणी के होटलों या वैसी ही उच्च स्तरीय सुविधाओं वाले स्थानों पर ठहराए जाने का प्रावधान था, जिसमें एक कमरे में अधिकतम दो लोगों के रुकने की व्यवस्था तय की गई थी। हालांकि, जमीनी हकीकत इन कागजी दावों से कोसों दूर निकली। यात्रियों को साफ-सुथरे होटलों के बजाय दुर्गंधयुक्त और पुरानी धर्मशालाओं में आश्रय दिया गया। स्थिति इतनी खराब थी कि एक ही छोटे कमरे में रखे गए दो तख्तों पर छह से आठ बुजुर्गों को साथ रहने के लिए मजबूर किया गया। गर्मी और उमस के बीच कमरों के एसी बंद रखे गए और आश्रम के प्रबंधकों ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि उन्हें इसके संचालन के लिए कोई राशि नहीं मिली है। इसके अलावा, स्नानागारों में पानी का कोई इंतजाम नहीं था और साफ-सफाई की स्थिति पूरी तरह से बदहाल थी।
भोजन में लापरवाही और बदसलूकी का सामना
यात्रियों के लिए खान-पान की गुणवत्ता बेहद निम्न स्तर की पाई गई, जहां बुजुर्गों को रात का बचा हुआ बासी और दुर्गंधयुक्त खाना परोस दिया गया। सुबह के समय चाय और नाश्ते के लिए यात्रियों को सुबह 11 बजे तक इंतजार करना पड़ा और जब चाय मिली तो वह पूरी तरह ठंडी हो चुकी थी। दिन का भोजन शाम को 5 बजे परोसा गया और रात का खाना आते-आते रात के 12:30 बज गए। हद तो तब पार हो गई जब दो रोटियां खाने के बाद कुछ बुजुर्गों ने तीसरी रोटी की मांग की, तो ठेकेदार के कारिंदों ने उन्हें देने से साफ इनकार कर दिया और उनके साथ अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया।
प्रशासन की चुप्पी और जबरन फीडबैक का दबाव
जब बुजुर्ग यात्रियों ने इस असहनीय कुप्रबंधन और दुर्व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाई, तो ठेकेदार के नुमाइंदों ने उन्हें डराना और धमकाना शुरू कर दिया। अपनी कमियों और लापरवाही पर पर्दा डालने के लिए कर्मचारियों ने बुजुर्गों से जबरन संतुष्टि पत्रों पर हस्ताक्षर करवा लिए। यात्रा की सुरक्षा और देखभाल के लिए तैनात किए गए सरकारी अमले और चिकित्सा दल के सदस्य पूरे रास्ते नदारद रहे। जब इस गंभीर मामले पर देवस्थान विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क साधने का प्रयास किया गया, तो किसी भी जिम्मेदार अधिकारी ने फोन उठाना मुनासिब नहीं समझा।
























