पारंपरिक ग्रामीण भारत में अक्सर या तो पूरी तरह से मिट्टी और खपरैल से बने कच्चे आशियाने दिखाई देते हैं, या फिर सीमेंट और कंक्रीट से तैयार आधुनिक पक्के मकान नजर आते हैं। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले स्थित ग्रामीण इलाके कतकालो के रहने वाले दिलीप मांझी ने इन दोनों तरीकों से अलग एक अनूठा रास्ता खोज निकाला है। आर्थिक संकट और पैसों की भारी तंगी के बीच जब पक्का मकान बनाना संभव नहीं हुआ, तो उन्होंने अपनी सूझबूझ का परिचय देते हुए पक्की ईंटों की जुड़ाई सीमेंट के बजाय मिट्टी के गिलावे से कर दी। करीब दो साल पहले रखी गई इस देसी शैली के मकान की बुनियाद आज भी मजबूती से टिकी हुई है और इसमें किसी प्रकार की दरार सामने नहीं आई है। दिलीप ने यह समूचा निर्माण किसी राजमिस्त्री के बिना, खुद अपने हाथों से पूरा किया है और अब वे इसमें अपने माता-पिता के साथ सुरक्षित जीवन बिता रहे हैं।
सीमेंट का खर्च बचाने के लिए अपनाया मिट्टी की जुड़ाई का देसी विचार
आर्थिक तंगी से जूझते ग्रामीण परिवारों के लिए सीमेंट, रेत और लोहे का खर्च उठाना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। दिलीप मांझी के सामने भी जब अपने परिवार के लिए छत जुटाने का सवाल आया, तो जेब में सीमेंट खरीदने लायक पर्याप्त पैसे नहीं थे। उन्होंने किसी अन्य स्थान पर पक्की ईंटों को गारे और मिट्टी की मदद से जुड़ते देखा था, जहां से उन्हें अपने घर के लिए यह विचार सूझा। सामग्री जुटाने के लिए उन्होंने एक अन्य निर्माण स्थल से मिली पुरानी ईंटों का सहारा लिया और कुछ ईंटें उन्होंने खुद अपने स्तर पर भी तैयार कीं, हालांकि उनकी निजी बनाई ईंटों की संख्या काफी कम थी। इन सभी उपलब्ध ईंटों को उन्होंने बिना सीमेंट के, पूरी तरह स्थानीय मिट्टी के गिलावे के साथ जोड़कर एक-एक कर दीवारें खड़ी कर दीं।
चार फीट गहरी नींव और जमीन के गड्ढों का समतलीकरण
मकान की बनावट और बुनियाद को टिकाऊ बनाने के लिए दिलीप ने धरातल की भौगोलिक स्थिति पर विशेष ध्यान दिया। उनके घर के आसपास की जमीन में गहरा गड्ढा था, जिसे पहले उन्होंने मिट्टी और मलबे से भरकर समतल किया। जमीन भराव के साथ ही ढांचे को स्थिरता देने के लिए उन्होंने मकान की नींव में ईंटों को लगभग चार फीट गहराई तक जमीन के अंदर दबाया। जब चार फीट की गहरी बुनियाद तैयार हो गई, तब उसके ऊपर मिट्टी के गारे से ईंटों की एक-एक परत जोड़कर दीवारें उठाई गईं। उपलब्ध संसाधनों का सही तालमेल बैठाकर उन्होंने अपने सीमित साधनों में यह पूरा ढांचा खड़ा कर दिखाया।
दो साल का सुरक्षित सफर और बारिश के मौसम की चुनौतियां
इस अनूठे मकान में दिलीप का परिवार पिछले दो वर्षों से लगातार रह रहा है और अब तक दीवारों में कोई बड़ी टूट-फूट या दरार नहीं दिखाई दी है। हालांकि दिलीप स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि मिट्टी के गिलावे से जुड़ी ईंटों का यह ढांचा सीमेंट और कंक्रीट से बने पक्के मकानों जितना मजबूत नहीं हो सकता। लगातार होने वाली तेज बारिश और पानी के सीधे रिसाव से मिट्टी की पकड़ ढीली पड़ने और दीवारों के कमजोर होने का जोखिम हमेशा बना रहता है। इस वजह से जलजमाव और नमी से सुरक्षा रखना इस प्रकार के ढांचे के लिए एक अहम पहलू है।
बांस के ढांचे और देशी खपरों से ढकी गई छत
दीवारों के साथ-साथ मकान की छत को तैयार करने में भी दिलीप ने सिर्फ स्थानीय और प्राकृतिक सामग्रियों का ही उपयोग किया। भारी भरकम सीमेंट की छत ढालने के बजाय उन्होंने बांस के छोटे-छोटे टुकड़ों और मजबूत लकड़ी की बल्लियों का ढांचा तैयार किया। इसके बाद उस लकड़ी और बांस के ढांचे के ऊपर पारंपरिक मिट्टी के खपरे बिछाए गए। इनमें से कुछ खपरों को उन्होंने अपने हाथों से गढ़ा था, जबकि बाकी बचे खपरों को उन्होंने बाजार से मामूली खर्च में खरीदा था। इस पूरी प्रक्रिया ने छत के निर्माण की लागत को बेहद सीमित कर दिया।
तीसरी तक की पढ़ाई और कंधों पर परिवार का बोझ
दिलीप मांझी की निजी जिंदगी भी संघर्षों से भरी रही है। घर के कमजोर आर्थिक हालात और जिम्मेदारियों के कारण वे तीसरी कक्षा से आगे अपनी औपचारिक पढ़ाई जारी नहीं रख सके। उनके पिता अकेले कामकाज संभालते थे, लिहाजा परिवार को संभालने के लिए दिलीप को बेहद कम उम्र में ही मेहनत मजदूरी और खेतीबाड़ी में हाथ बंटाना पड़ा। वर्तमान में वे खेती के काम के साथ-साथ जो भी मेहनत-मजदूरी का काम मिलता है, उसे करके परिवार का भरण-पोषण करते हैं।
सीमित साधनों में बुने भविष्य के नए सपने
वर्तमान समय में दिलीप अविवाहित हैं और अपने माता-पिता के साथ इसी खुद बनाए घर में रहते हैं। तीन सदस्यों वाले इस परिवार की जिंदगी सादगी और संघर्ष के बीच गुजर रही है, लेकिन अपने दम पर घर तैयार कर लेने के बाद अब वे आगे शादी करने की योजना भी बना रहे हैं। दिलीप मांझी का यह प्रयास दर्शाता है कि किस तरह ग्रामीण अंचलों में आर्थिक मजबूरियां लोगों को नए देसी विकल्प खोजने पर विवश करती हैं, हालांकि सुरक्षा, लंबी उम्र और बारिश से बचाव के लिहाज से ऐसे निर्माणों में सावधानी बरतना भी उतना ही जरूरी है।



















