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बीकानेर में मुस्लिम महिलाएं बुन रहीं आस्था का धागा, गंगा-जमुनी तहजीब की अनूठी मिसालराजस्थान
7 नव॰ 2026, 4:43 pm (7 घंटे पहले)· 1

बीकानेर में मुस्लिम महिलाएं बुन रहीं आस्था का धागा, गंगा-जमुनी तहजीब की अनूठी मिसाल

बीकानेर में कृष्णा खत्री द्वारा संचालित मौली निर्माण का कारोबार धार्मिक सौहार्द और महिला सशक्तिकरण की मिसाल पेश कर रहा है। यहाँ हिंदू और मुस्लिम महिलाएं मिलकर रोजाना 400 किलो मौली तैयार करती हैं जो देश के कई राज्यों में पहुँचती है।

सनातन परंपरा में कलाई पर बाँधे जाने वाले पवित्र धागे यानी मौली या कलावा का अत्यधिक धार्मिक महत्व है। किसी भी शुभ कार्य, पूजा-पाठ, अनुष्ठान या दीपावली जैसे पर्वों की शुरुआत बिना मौली के अधूरी मानी जाती है। हालांकि बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ हैं कि यह पवित्र धागा किन कठिन चरणों से गुजरकर आमजन तक पहुँचता है और इसे बनाने में कितनी मेहनत लगती है। राजस्थान के बीकानेर जिले में संचालित मौली निर्माण का यह कार्य धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक सद्भाव और महिला उद्यमिता की एक बेहतरीन दास्तान बयान कर रहा है।

दो दशक पुराना सफर और छोटे स्तर से शुरुआत

बीकानेर की उद्यमी कृष्णा खत्री पिछले करीब 20 वर्षों से इस व्यवसाय से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने इस काम की शुरुआत मात्र 10 हजार रुपए की छोटी सी पूँजी के साथ की थी। उनके परिवार के मुताबिक, उनके ससुर ने सबसे पहले इस काम को बहुत छोटे पैमाने पर शुरू किया था, लेकिन कच्चे माल की नियमित आपूर्ति न मिलने के कारण इस कारोबार को कई बार बंद करना पड़ा था। इसके बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों और इस काम में छिपी संभावनाओं को समझते हुए कृष्णा खत्री ने वर्ष 2011 में इसे बड़े पैमाने पर दोबारा शुरू किया। कड़ी मेहनत और अनुभव के बलबूते आज यह कारोबार काफी फैल चुका है और बीकानेर की बनी यह मौली देश के तमाम राज्यों के बाजारों तक अपनी पहुँच बना चुकी है।

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एकजुट होकर काम करती हैं हिंदू और मुस्लिम महिलाएँ

इस कारोबार की सबसे अनूठी और सुंदर बात यह है कि इसमें जुड़ी महिला कामगारों में मुस्लिम समाज की महिलाएँ भी शामिल हैं। यानी जिस पवित्र और धार्मिक धागे को हिंदू परिवार पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ अपनी कलाई पर धारण करते हैं, उसे आकार देने में हिंदू और मुस्लिम महिलाएँ मिलकर अपना योगदान दे रही हैं। यह पहल देश की गंगा-जमुनी तहजीब की एक जीवंत मिसाल पेश करती है, जहाँ धर्म और आस्था से ऊपर उठकर आजीविका और आपसी सहयोग का सुंदर ताना-बाना बुना गया है।

मौली तैयार होने की लंबी और दिलचस्प प्रक्रिया

मौली बनाने की पूरी प्रक्रिया काफी लंबी और दिलचस्प होती है, जिसे पूरा होने में करीब 8 से 10 दिन का समय लग जाता है। सबसे पहले कच्चे धागे से उसकी लच्छियाँ तैयार की जाती हैं। इसके बाद धागे की रंगाई यानी डाइंग का काम किया जाता है। रंगाई के पश्चात इस धागे को लगभग दो दिनों तक धूप में पूरी तरह सुखाया जाता है। जब धागा पूरी तरह सूख जाता है, तब मशीनों की सहायता से इसकी गोलियाँ बनाई जाती हैं। इसके बाद मौली के गेड़े तैयार किए जाते हैं जिन पर उचित लेबल लगाए जाते हैं और अंत में बेहतरीन पैकेजिंग के बाद इसे बाजार में बिक्री के लिए भेज दिया जाता है। इस पूरी निर्माण श्रृंखला में लगभग दस अलग-अलग लोगों के हाथों से धागा गुजरता है।

उत्पादन, कीमत और मासिक आमदनी का गणित

बेहतरीन गुणवत्ता बनाए रखने के लिए इस कार्य में उच्च कोटि के कच्चे धागे और रंगों का प्रयोग किया जाता है, जिसके लिए धागा बाहर से मँगवाया जाता है। वर्तमान में यहाँ रोजाना लगभग 400 किलो मौली तैयार की जाती है। बाजार में यह तैयार मौली करीब 280 रुपए प्रति किलो के भाव से बेची जाती है। ग्राहकों की अलग-अलग माँग और जरूरतों के हिसाब से इसके विभिन्न आकार के गेड़े तैयार किए जाते हैं। इस पूरे व्यवसाय के संचालन से कृष्णा खत्री को हर महीने लगभग 50 हजार रुपए की कमाई होती है, जिससे उनके परिवार को आर्थिक संबल मिलता है।

त्योहारों के सीजन में बढ़ती है देशव्यापी माँग

सालभर चलने वाले इस काम में दीपावली और अन्य बड़े त्योहारों के सीजन के दौरान माँग में जबरदस्त उछाल देखने को मिलता है। चूँकि इस धागे का उपयोग धार्मिक अनुष्ठानों, महालक्ष्मी पूजन और विभिन्न मांगलिक आयोजनों में अनिवार्य रूप से होता है, इसलिए पर्वों के दिनों में काम का दबाव और उत्पादन दोनों बढ़ जाते हैं। बीकानेर की इस यूनिट में तैयार होने वाली मौली केवल राजस्थान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह गुजरात, मध्यप्रदेश, असम, मणिपुर, उत्तर प्रदेश और दिल्ली समेत देश के कई अन्य राज्यों में भी भेजी जाती है, जहाँ इसकी लगातार माँग बनी रहती है।

सवाल-जवाब

बीकानेर में मौली निर्माण का कारोबार कौन चलाता है?
बीकानेर में यह कारोबार महिला उद्यमी कृष्णा खत्री द्वारा चलाया जा रहा है।
इस व्यवसाय की शुरुआत कितने रुपए से की गई थी?
इस कारोबार की शुरुआत महज 10 हजार रुपए की शुरुआती पूँजी से की गई थी।
रोजाना कितनी मात्रा में मौली तैयार की जाती है?
इस यूनिट में रोजाना करीब 400 किलो मौली तैयार की जाती है।
तैयार मौली बाजार में किस भाव पर बिकती है?
बाजार में तैयार मौली लगभग 280 रुपए प्रति किलो के भाव से बेची जाती है।
मौली बनाने की प्रक्रिया में कितना समय लगता है?
कच्चे धागे से मौली तैयार होने की पूरी प्रक्रिया में लगभग 8 से 10 दिन का समय लगता है।
इस काम से कितने लोगों को रोजगार मिला है?
इस कारोबार से लगभग 100 लोगों को रोजगार मिल रहा है, जिनमें मुस्लिम महिलाएँ भी शामिल हैं।
यहाँ तैयार होने वाली मौली किन-किन राज्यों में भेजी जाती है?
यहाँ की मौली राजस्थान के अलावा गुजरात, मध्यप्रदेश, असम, मणिपुर, उत्तर प्रदेश और दिल्ली भेजी जाती है।
इस कारोबार से हर महीने कितनी कमाई हो जाती है?
इस व्यवसाय से हर महीने लगभग 50 हजार रुपए की कमाई होती है।
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