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बीकानेर के ९१ साल पुराने महालक्ष्मी मंदिर की अनूठी परंपरा, राजपरिवार भेजता है शाही पोशाक और कुंवारे लाते हैं पीले चावलराजस्थान
7 नव॰ 2026, 10:05 am (2 मिनट पहले)· 0

बीकानेर के ९१ साल पुराने महालक्ष्मी मंदिर की अनूठी परंपरा, राजपरिवार भेजता है शाही पोशाक और कुंवारे लाते हैं पीले चावल

बीकानेर में स्थित ९१ साल पुराने ऐतिहासिक महालक्ष्मी मंदिर में दीपावली के पावन पर्व पर शाही पोशाक अर्पित की जाती है और यहां कुंवारे युवक विशेष मनोकामना के साथ पीले चावल लेकर पहुंचते हैं।

बीकानेर के दाऊजी रोड पर स्थित प्राचीन श्री महालक्ष्मी मंदिर में दीपावली के दौरान भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है, क्योंकि लोग धन और समृद्धि की देवी की आराधना करने पहुंचते हैं। लगभग ९१ साल पुराने इस ऐतिहासिक स्थल पर सालभर चहल-पहल रहती है, किंतु प्रकाश पर्व के समय इसका धार्मिक महत्व काफी अधिक बढ़ जाता है। शहर के मध्य में स्थित यह मंदिर स्थानीय लोगों की गहरी आस्था का मुख्य केंद्र है और यहां दर्शन के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।

वर्ष १९३२ में हुई थी स्थापना

इस ऐतिहासिक धार्मिक स्थल की स्थापना वर्ष १९३२ में बीकानेर रियासत के तत्कालीन राजपंडित यमुना दत्त श्रीमाली द्वारा कराई गई थी। मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के पवित्र अनुष्ठान में बीकानेर रियासत के तत्कालीन महाराजा गंगा सिंह ने खुद शिरकत की थी और मुख्य यजमान की भूमिका निभाई थी। श्री महालक्ष्मी मंदिर ट्रस्ट के ट्रस्टी एवं पुजारी राजेंद्र कुमार श्रीमाली के मुताबिक, इसी शाही जुड़ाव के कारण इस प्राचीन मंदिर का इतिहास रियासतकाल से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है।

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राजपरिवार की ओर से भेजी जाती है पोशाक

इस मंदिर की सबसे खास विशेषता यहां निभाई जाने वाली शाही परंपरा है, जिसके तहत बीकानेर के पूर्व राजपरिवार की तरफ से साल में दो बार मां महालक्ष्मी को विशेष पोशाक भेजी जाती है। पहली पोशाक दीपावली के शुभ अवसर पर आती है, जबकि दूसरी पोशाक श्राद्ध पक्ष की अष्टमी के दिन अर्पित की जाती है। इन खास मौकों पर देवी को यही विशेष पोशाक पहनाई जाती है, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर परिसर में इकट्ठा होते हैं।

हाथियों की सूंड और कलश वाली अद्भुत मूर्ति

मंदिर के भीतर स्थापित माता महालक्ष्मी की अलौकिक प्रतिमा भक्तों के आकर्षण का मुख्य बिंदु है, जहां देवी एक खिले हुए कमल के फूल पर विराजमान मुद्रा में नजर आती हैं। इस प्रतिमा की विशेषता यह है कि इसमें हाथियों की सूंड में कलश दर्शाए गए हैं, जो सनातन संस्कृति में सुख, वैभव, समृद्धि और धन का प्रतीक माने जाते हैं। यहां आने वाले भक्त परिवार की खुशहाली और उन्नति की कामना करते हैं।

दीपावली पर पूरे दिन खुले रहते हैं कपाट

सामान्य दिनों में इस मंदिर में रोजाना लगभग २०० से ३०० श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं, जबकि शुक्रवार के दिन यह आंकड़ा हजारों तक पहुंच जाता है। दीपावली के खास मौके पर सुबह से लेकर देर रात तक भक्तों का तांता लगा रहता है और भारी भीड़ को नियंत्रित करने तथा दर्शन सुलभ बनाने के लिए मंदिर के पट पूरे दिन और रात खुले रखे जाते हैं।

कुंवारे युवकों की अनूठी मनोकामना

इस प्राचीन मंदिर से एक बेहद दिलचस्प और अनूठी लोक मान्यता जुड़ी हुई है, जिसके तहत विवाह योग्य कुंवारे युवक विशेष अवसरों पर पीले चावल लेकर माता के दरबार में अपनी अर्जी लगाते हैं। वे मां महालक्ष्मी से अपने लिए एक सुयोग्य जीवनसंगिनी यानी गृह लक्ष्मी की कृपा पाने की प्रार्थना करते हैं। बीकानेर के निवासियों के लिए यह मंदिर श्रद्धा, विश्वास और सांस्कृतिक धरोहर का एक जीवित प्रतीक बना हुआ है।

सवाल-जवाब

श्री महालक्ष्मी मंदिर बीकानेर में कहां स्थित है?
यह प्राचीन मंदिर बीकानेर के दाऊजी रोड पर स्थित है।
इस ऐतिहासिक मंदिर की स्थापना कब हुई थी?
इस मंदिर की स्थापना वर्ष १९३२ में बीकानेर रियासत के राजपंडित यमुना दत्त श्रीमाली द्वारा की गई थी।
मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के समय कौन उपस्थित थे?
बीकानेर रियासत के तत्कालीन महाराजा गंगा सिंह ने प्राण प्रतिष्ठा समारोह में मुख्य यजमान के रूप में भाग लिया था।
राजपरिवार द्वारा मंदिर में कितनी बार पोशाक भेजी जाती है?
राजपरिवार की तरफ से साल में दो बार, यानी दीपावली और श्राद्ध पक्ष की अष्टमी पर विशेष पोशाक भेजी जाती है।
दीपावली के दिन मंदिर के कपाट कब तक खुले रहते हैं?
दीपावली के अवसर पर भक्तों की भारी भीड़ को देखते हुए मंदिर के पट सुबह तड़के से लेकर देर रात तक पूरे दिन खुले रहते हैं।
कुंवारे युवक मंदिर में क्या अर्पित करने आते हैं?
विवाह योग्य कुंवारे युवक सुयोग्य जीवनसंगिनी की कामना के लिए पीले चावल लेकर मंदिर में आते हैं।
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