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दिल्ली एम्स में 13 साल के लंबे इलाज के बाद 15 वर्षीय तन्वी की मौत, कोटा निवासी पिता ने लगाए गंभीर आरोपराजस्थान
2 सित॰ 2026, 8:31 am (1 घंटे पहले)· 2

दिल्ली एम्स में 13 साल के लंबे इलाज के बाद 15 वर्षीय तन्वी की मौत, कोटा निवासी पिता ने लगाए गंभीर आरोप

राजस्थान के कोटा की 15 वर्षीय तन्वी का दिल्ली एम्स में 13 साल से इलाज चल रहा था। दिल और फेफड़ों की जटिल बीमारी से जूझ रही बच्ची की कार्डिएक अरेस्ट से मौत हो गई, जिसके बाद बेबस पिता ने अस्पताल प्रबंधन पर लापरवाही और बार-बार तारीखें टालने के आरोप लगाए हैं।

राजस्थान के कोटा जिले के रहने वाले मुकेश परिहानी अपनी दो साल की मासूम बेटी तन्वी को बेहतर इलाज की आस में देश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल दिल्ली एम्स लेकर आए थे। साल 2012 से शुरू हुआ यह सफर लगातार 13 वर्षों तक अस्पताल के गलियारों, जांच कमरों और प्रशासनिक मुलाकातों के चक्कर में उलझा रहा। परिवार को भरोसा था कि देश का शीर्ष चिकित्सा संस्थान उनकी बेटी को नया जीवन देगा। हालांकि, 13 साल के लंबे इंतजार, अंतहीन तारीखों और अनगिनत जांचों के बाद मंगलवार को अस्पताल प्रशासन ने 15 वर्षीय तन्वी का शव उसके पिता को सौंप दिया। इस दुखद अंत के बाद पीड़ित पिता का धैर्य टूट गया और उन्होंने अस्पताल प्रबंधन पर गंभीर लापरवाही, समय पर इलाज न देने और प्रक्रियात्मक विलंब के गंभीर आरोप लगाए हैं।

जन्मजात हृदय रोग और 2012 में शुरुआती जांच

तन्वी की बीमारी का पहली बार तब पता चला था जब वह महज दो साल की थी। वर्ष 2012 में एक दिन अचानक उसे सांस लेने में भारी तकलीफ हुई और वह बेहोश हो गई। घबराए परिजनों ने कोटा में स्थानीय डॉक्टरों को दिखाया, जहां शुरुआती जांच के बाद पता चला कि बच्ची के दिल में गंभीर समस्या है। स्थानीय चिकित्सकों की सलाह पर मुकेश परिहानी अपनी बेटी को तुरंत ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, नई दिल्ली लेकर पहुंचे। वहां एम्स के कार्डियोलॉजी विभाग में कई महीनों तक विस्तृत जांच की प्रक्रिया चली। डॉक्टरों ने परिजनों को बताया कि तन्वी को वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट और पल्मोनरी एट्रेसिया नाम की गंभीर जन्मजात बीमारी है। इसका सीधा अर्थ यह था कि जन्म से ही उसके दिल में एक बड़ा छेद था और उसके फेफड़ों तक अशुद्ध खून साफ होने के लिए ले जाने वाली मुख्य धमनी यानी पल्मोनरी आर्टरी ठीक से काम नहीं कर रही थी।

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चिकित्सकों ने स्पष्ट किया कि पल्मोनरी एट्रेसिया के कारण बच्ची के फेफड़ों तक पर्याप्त मात्रा में रक्त नहीं पहुंच पा रहा था। रक्त आपूर्ति बाधित होने की वजह से उसके पूरे शरीर में ऑक्सीजन की निरंतर भारी कमी बनी रहती थी। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार यह एक अत्यंत नाजुक और आपातकालीन स्थिति थी, जिसमें समय पर सर्जिकल हस्तक्षेप की तत्काल आवश्यकता होती है। परिजनों को उम्मीद थी कि देश के सबसे अनुभवी डॉक्टर उनकी बेटी का इलाज करके उसे सामान्य जीवन प्रदान करेंगे। इसके बाद डॉक्टरों ने बच्ची की स्थिति को स्थिर रखने के लिए दवाएं शुरू कीं और सर्जरी की विस्तृत रूपरेखा तैयार करने में जुट गए।

2014 का सर्जिकल प्रस्ताव और 1.5 लाख रुपये का खर्च

एम्स दिल्ली में लगभग दो साल तक चले लगातार फॉलो-अप, रक्त जांच और स्कैन के बाद साल 2014 में डॉक्टरों की टीम ने एक बड़ा फैसला लिया। अस्पताल के मेडिकल रिकॉर्ड में औपचारिक रूप से यूनिफोकलाइजेशन और कंड्यूट सर्जरी का सुझाव दर्ज किया गया। यह पल्मोनरी एट्रेसिया के इलाज के लिए एक अत्यधिक उन्नत कार्डिएक सर्जरी मानी जाती है, जिसका मुख्य उद्देश्य फेफड़ों तक खून ले जाने वाली नसों का पुनर्निर्माण करना और दिल के छेद को दुरुस्त करना होता है। डॉक्टरों ने परिजनों को समझाया कि इस जटिल ऑपरेशन को अंजाम देकर बच्ची के शरीर में ऑक्सीजन के प्रवाह को सामान्य किया जा सकता है।

इस उन्नत कार्डिएक सर्जरी के लिए अस्पताल प्रशासन की ओर से लगभग डेढ़ लाख रुपये (₹1,50,000) का अनुमानित खर्च बताया गया। कोटा के एक साधारण परिवार के लिए यह रकम बड़ी थी, लेकिन अपनी बेटी की जान बचाने के लिए मुकेश परिहानी ने बिना एक पल गंवाए तुरंत इस खर्च की सहमति दे दी। परिवार ने आवश्यक कागजी कार्रवाई पूरी की और सर्जरी की तारीख तय होने का इंतजार करने लगा। उनके मन में यह उम्मीद जाग उठी थी कि अब तन्वी की बीमारी का स्थायी समाधान निकल आएगा और वह जल्द ही अन्य बच्चों की तरह सामान्य जीवन जी सकेगी।

2015 में टली सर्जरी और तन्वी का सीमित बचपन

साल 2014 में सर्जरी की स्वीकृति मिलने के बाद परिवार को अस्पताल से केवल आश्वासन और नई तारीखें ही मिलती रहीं। आखिरकार वर्ष 2015 में एम्स डॉक्टरों द्वारा ऑपरेशन के लिए एक निश्चित तारीख तय की गई। परिवार अपनी बेटी को लेकर बेहद आशान्वित था। आवश्यक दस्तावेज जमा कराए गए, प्री-ऑपरेटिव जांचें पूरी हुईं और सभी तैयारियां कर ली गईं। हालांकि, अंतिम समय में बिना कोई ठोस या संतोषजनक कारण बताए उस तय सर्जरी को टाल दिया गया। पिता मुकेश परिहानी के अनुसार, जब उन्होंने डॉक्टरों और अस्पताल कर्मचारियों से ऑपरेशन टलने की वजह पूछी, तो उन्हें कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया।

इसके बाद के साल तन्वी और उसके परिवार के लिए बेहद कष्टदायक साबित हुए। जैसे-जैसे तन्वी उम्र में बड़ी होती गई, उसकी शारीरिक स्थिति और अधिक बिगड़ती चली गई। वह अपने पूरे बचपन में कभी सामान्य बच्चों की तरह खेल नहीं सकी और न ही कभी स्कूल जा पाई। उसकी शारीरिक क्षमता इतनी कम हो चुकी थी कि थोड़ा सा चलने या हिलने-डुलने पर भी उसकी सांस फूलने लगती थी। शरीर में ऑक्सीजन की भारी कमी के कारण उसके होंठ नीले पड़ जाते थे और वह अक्सर चक्कर खाकर बेहोश हो जाती थी। इसके बावजूद उसके पिता ने हिम्मत नहीं हारी। वे अपनी आर्थिक स्थिति और परिस्थितियों से लड़ते हुए कोटा से दिल्ली के चक्कर काटते रहे और एम्स के ओपीडी रूम में घंटों अपनी बारी का इंतजार करते रहे।

2018 में मेडिकल मोड़: सुधारात्मक सर्जरी हुई असंभव

तारीखों, जांचों और चक्कर काटने का यह दौर तीन और सालों तक चलता रहा। वर्ष 2018 में जब तन्वी को पुनः जांच के लिए लाया गया, तो एम्स के कार्डियोलॉजी विभाग की रिपोर्ट ने परिवार के पैरों तले जमीन खिसका दी। डॉक्टरों ने विस्तृत कार्डिएक असेसमेंट के बाद परिजनों को सूचित किया कि अब तन्वी की सुधारात्मक सर्जरी नहीं की जा सकती। डॉक्टरों ने जांच रिपोर्ट के हवाले से बताया कि बच्ची के फेफड़ों को रक्त पहुंचाने वाली मुख्य धमनियां लगभग गायब हो चुकी थीं और उसके दिल का ढांचा बेहद जटिल हो चुका था। ऐसे में अब कोई भी सर्जिकल ऑपरेशन करना बच्ची के लिए अत्यंत खतरनाक और जानलेवा साबित हो सकता था।

चिकित्सकीय टीम ने परिजनों को बताया कि अब सुधारात्मक सर्जरी का विकल्प खत्म हो चुका है और बच्ची की जिंदगी को केवल दवाओं के सहारे ही आगे बढ़ाया जा सकता है। परिवार ने इस कड़वे सच को भी चुपचाप स्वीकार कर लिया। डॉक्टरों की सलाह पर वे नियमित रूप से एम्स आते रहे और दवाओं का फॉलो-अप जारी रखा। तन्वी की हालत लगातार चिंताजनक बनी रही, लेकिन परिजनों ने डॉक्टरों के निर्देशों का पालन करना कभी बंद नहीं किया और हर महीने कोटा से दिल्ली की यात्रा करते रहे।

अगस्त 2024 में ट्रांसप्लांट का फैसला और अंतिम पल

वर्षों तक केवल दवाओं पर निर्भर रहने के बाद तन्वी की शारीरिक स्थिति और नाजुक हो गई। आखिरकार 13 साल के लंबे इंतजार के बाद, जब तन्वी 15 साल की हो चुकी थी, डॉक्टरों के मेडिकल बोर्ड ने एक नया फैसला लिया। अगस्त 2024 में डॉक्टरों के बीच सहमति बनी कि अब उसकी जान बचाने के लिए केवल एक ही अंतिम विकल्प बचा है और वह है संयुक्त हार्ट और लंग ट्रांसप्लांट। डॉक्टरों ने परिजनों को बताया कि बच्ची के दिल और फेफड़ों दोनों को बदलना पड़ेगा। इस प्रक्रिया के लिए तन्वी को अगस्त 2024 में एम्स नई दिल्ली में पुनः भर्ती कराया गया।

अस्पताल में भर्ती होने के बाद प्रत्यारोपण से जुड़ी विस्तृत मेडिकल जांचों का दौर शुरू हुआ। सोमवार शाम को डॉक्टरों की टीम ने तन्वी की एंडोस्कोपी जांच की और अंग प्रत्यारोपण की तैयारियां तेज कर दी गईं। हालांकि, सोमवार और मंगलवार की दरमियानी रात करीब रात ढाई बजे तन्वी ने अत्यधिक थकान, बेचैनी और कमजोरी की शिकायत की। ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टरों ने तुरंत उसकी जांच की, तो पता चला कि उसके शरीर में ऑक्सीजन का स्तर तेजी से गिर रहा है। कुछ ही देर में उसका ऑक्सीजन सेचुरेशन गिरकर मात्र 48 प्रतिशत तक पहुंच गया।

स्थिति बिगड़ते देख डॉक्टरों ने उसे तुरंत बाहरी ऑक्सीजन सपोर्ट दिया, लेकिन ऑक्सीजन की भारी कमी के कारण तन्वी को भयानक हाइपोक्सिक अटैक आ गया। मस्तिष्क और शरीर के मुख्य अंगों तक ऑक्सीजन न पहुंच पाने की वजह से उसके दिल ने काम करना पूरी तरह बंद कर दिया। डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद तन्वी को बचाया नहीं जा सका और मंगलवार सुबह 5 बजकर 6 मिनट पर डॉक्टरों ने कार्डिएक अरेस्ट के कारण उसे मृत घोषित कर दिया।

पिता के गंभीर आरोप और जांच की मांग

मंगलवार को जब अस्पताल प्रशासन ने 15 वर्षीय तन्वी का शव उसके पिता मुकेश परिहानी को सौंपा, तो माहौल गमगीन हो गया। रोते-बिलखते पिता की आंखों में अपनी बेटी को खोने का गहरा दुख था, तो वहीं उनकी कांपती आवाज में अस्पताल प्रबंधन के प्रति भारी आक्रोश भी था। मुकेश परिहानी ने एम्स प्रशासन पर 13 सालों तक गुमराह करने का आरोप लगाते हुए कहा कि "एम्स ने हमें तेरह साल तक इंतजार करवाया और तारीखें टालता रहा।" उन्होंने कहा कि अस्पताल ने वर्षों तक सिर्फ कागजी प्रक्रियाएं पूरी कराईं, बार-बार नए दस्तावेज मांगे और कई मौकों पर तो उन पर अस्पताल से डिस्चार्ज लेने का दबाव भी बनाया गया।

पीड़ित पिता ने आरोप लगाया कि जब उनकी बेटी की स्थिति बेहद नाजुक थी, तब भी उसे त्वरित और उचित इलाज नहीं मिला। उन्होंने एम्स प्रबंधन से अपनी बेटी की मौत का स्पष्ट और सन्तोषजनक जवाब मांगा है। मुकेश परिहानी ने आशंका जताई है कि इस पूरे मामले में कहीं न कहीं घोर लापरवाही या साजिश हुई है। उन्होंने मांग की है कि तन्वी के इलाज की पूरी प्रक्रिया, तारीखें टालने के कारणों और मंगलवार तड़के हुई उसकी मौत की परिस्थितियों की उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए ताकि सच्चाई सामने आ सके।

अस्पताल का रिकॉर्ड और डॉक्टरों का पक्ष

बच्ची की मौत से ठीक पहले 28 अगस्त को एम्स के डॉक्टरों द्वारा दी गई जानकारी और अस्पताल के आधिकारिक मेडिकल रिकॉर्ड इस मामले में अलग पहलू सामने रखते हैं। डॉक्टरों के अनुसार, वर्ष 2014 में जो करीब डेढ़ लाख रुपये की सर्जरी का अनुमान दिया गया था, वह उस समय की स्थिति के आधार पर था जब सुधारात्मक सर्जरी संभव मानी जा रही थी। हालांकि, बाद में की गई जांचों में जब यह स्पष्ट हुआ कि बच्ची के फेफड़ों की मुख्य धमनी (पल्मोनरी आर्टरी) मौजूद ही नहीं है, तो सुधारात्मक ऑपरेशन की संभावना खत्म हो गई। इसी कारण चिकित्सा बोर्ड ने हार्ट-लंग ट्रांसप्लांट के विकल्प पर विचार करना शुरू किया था।

एम्स के रिकॉर्ड दर्शाते हैं कि तन्वी 2012 से लगातार अस्पताल के ओपीडी और फॉलो-अप क्लिनिक के संपर्क में थी। वर्ष 2018 के मेडिकल दस्तावेजों में साफ तौर पर दर्ज किया गया था कि बच्ची के फेफड़ों को रक्त आपूर्ति करने वाली मुख्य नसें गायब हैं और उसके दिल की शारीरिक संरचना इतनी जटिल है कि कोई भी ओपन सर्जरी जानलेवा हो सकती थी। बहरहाल, परिजनों द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों और बच्ची की मौत की वास्तविक परिस्थितियों की स्थिति अब किसी आधिकारिक जांच के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।

सवाल-जवाब

तन्वी को जन्म से क्या स्वास्थ्य समस्या थी?
तन्वी जन्मजात हृदय दोष वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट और पल्मोनरी एट्रेसिया से पीड़ित थी। उसके दिल में छेद था और फेफड़ों तक खून पहुंचाने वाली नसें ठीक से काम नहीं कर रही थीं।
तन्वी के इलाज के लिए परिवार एम्स कब आया था?
परिवार तन्वी को इलाज के लिए साल 2012 में पहली बार राजस्थान के कोटा से दिल्ली एम्स लेकर आया था।
2014 में डॉक्टरों ने किस सर्जरी की सलाह दी थी?
2014 में डॉक्टरों ने यूनिफोकलाइजेशन और कंड्यूट सर्जरी कराने का सुझाव दिया था, जिसकी लागत करीब डेढ़ लाख रुपये बताई गई थी।
2018 में सुधारात्मक सर्जरी क्यों रद्द कर दी गई?
2018 की जांच रिपोर्ट में डॉक्टरों ने पाया कि फेफड़ों को रक्त पहुंचाने वाली मुख्य नसें गायब थीं और दिल का ढांचा बेहद जटिल था, जिससे सर्जरी जानलेवा हो सकती थी।
तन्वी की मौत किस वजह से हुई?
मंगलवार तड़के तन्वी का ऑक्सीजन स्तर गिरकर 48 प्रतिशत पर पहुंच गया। हाइपोक्सिक अटैक आने के बाद सुबह 5 बजकर 6 मिनट पर कार्डिएक अरेस्ट से उसकी मौत हो गई।
संपादकीय नीति सुधार नीति

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