प्यार की परिभाषा अक्सर लोग साथ निभाने और रिश्तों को मुकाम तक पहुंचाने में तलाशते हैं, लेकिन त्याग और समर्पण की एक ऐसी दास्तान भी है जो इंसान को अंदर तक झकझोर कर रख देती है। राजस्थान के पाली और मारवाड़ क्षेत्र में पूजे जाने वाले लोकदेवता इलोजी का जीवन इसी अगाध प्रेम और अनंत त्याग का एक ऐसा जीवंत उदाहरण है, जिसे याद करके आज भी लोगों की आंखें नम हो जाती हैं। उनकी जिंदगी में खुशियों का वह पल आने ही वाला था जिसकी उन्होंने और उनके परिवार ने बरसों से कल्पना की होगी, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। जब बारात उनके दरवाजे से निकलने के लिए पूरी तरह सज-धजकर तैयार खड़ी थी, ठीक उसी वक्त उनके पास एक ऐसी मनहूस खबर पहुंची जिसने उनकी पूरी दुनिया को एक ही झटके में उजाड़ दिया। उस पल मिले गहरे सदमे ने इलोजी को ताउम्र कुंवारा रहने के लिए विवश कर दिया और उन्होंने कभी किसी और को अपनी जीवनसंगिनी बनाने के बारे में नहीं सोचा। आज भी पाली की धरती पर इलोजी का वह प्राचीन मंदिर उसी अमर प्रेम और अधूरे सपने की दास्तान को बयां करता है, जहां दूर-दूर से प्रेमी जोड़े और अपनी मनोकामनाएं लेकर आने वाले श्रद्धालु शीश नवाने पहुंचते हैं।
करवा चौथ जैसे पर्व पति-पत्नी के अटूट रिश्ते, आपसी समर्पण और एक-दूसरे के प्रति आजीवन निष्ठा का प्रतीक माने जाते हैं, जहां सुहागिनें अपने जीवनसाथी की लंबी उम्र और आरोग्यता के लिए ईश्वर से प्रार्थना करती हैं। लेकिन इस दुनिया में कुछ प्रेम कहानियां ऐसी भी होती हैं जो पारंपरिक सीमाओं से परे जाकर इतिहास के पन्नों में अमर हो जाती हैं, और इलोजी की यह कथा उन्हीं में से एक है। होली और होलिका दहन के पावन पर्व पर राजस्थान के कोने-कोने में लोकदेवता के रूप में याद किए जाने वाले इलोजी और होलिका का प्रसंग प्रेम के उस सर्वोच्च शिखर को छूता है जहां पाने की चाहत से ज्यादा प्रिय की यादों को सहेजना अहम हो जाता है। लोकमान्यताओं और जनश्रुतियों के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि इलोजी का अनुराग राक्षसराज हिरण्यकश्यप की बहन होलिका के प्रति बेहद गहरा और पवित्र था। दोनों के बीच प्रेम पनपने के बाद परिवारों की रजामंदी से उनके विवाह की तैयारियां जोर-शोर से शुरू हो गईं। एक तरफ जहां इलोजी के यहां शहनाइयां बजने और धूमधाम से बारात लेकर निकलने की तैयारियां अंतिम चरण में थीं, वहीं दूसरी तरफ हिरण्यकश्यप अपने ही परम विष्णु भक्त बेटे प्रह्लाद को रास्ते से हटाने की खौफनाक साजिश रचने में व्यस्त था। जब उसकी कोई भी चाल अपने नापाक मकसद में कामयाब नहीं हो पाई, तब उसने अपनी बहन होलिका से मदद मांगने का निर्णय किया और उसे इस षड्यंत्र में शामिल कर लिया।
भाई हिरण्यकश्यप के विशेष आग्रह और उसके दिए गए वरदान के सहारे होलिका अपने भतीजे प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर प्रज्वलित अग्नि की जलती हुई लपटों के बीच बैठ गई, क्योंकि उसे विश्वास था कि अग्नि उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। लेकिन उस दैवीय और चमत्कारिक घटनाक्रम में होलिका खुद ही उस भीषण आग में पूरी तरह भस्म हो गई, जबकि भगवान विष्णु की कृपा से भक्त प्रह्लाद पूरी तरह सुरक्षित बाहर निकल आए। इधर इलोजी अपनी दुल्हन होलिका को ब्याहने के लिए बड़े ही अरमानों और धूमधाम के साथ बारात सजाकर निकलने की पूरी तैयारी कर चुके थे, लेकिन रास्ते में ही उनके पास होलिका के निधन का दिल दहला देने वाला संदेश पहुंच गया। अपने जीवन के सबसे बड़े प्रेम को यूं अचानक खो देने का यह आघात इतना भयंकर था कि उसने इलोजी को भीतर से पूरी तरह तोड़कर रख दिया। लोककथाओं के अनुसार, जब इलोजी ने होलिका का वह जला हुआ नश्वर शरीर देखा, तो उनका सब्र टूट गया और वे फूट-फूटकर रो पड़े। उन्होंने अपने प्रेम के प्रति अनंत समर्पण दिखाते हुए होलिका की चिता की राख को अपने पूरे शरीर पर मल लिया और उसी क्षण यह आजीवन संकल्प ले लिया कि वे कभी विवाह नहीं करेंगे और ताउम्र कुंवारे ही रहेंगे।
आज के दौर में भले ही रिश्तों की परिभाषाएं बदल चुकी हों, लेकिन राजस्थान के कई प्रमुख शहरों और गांवों में इलोजी की पूजा आज भी उसी श्रद्धा और विश्वास के साथ एक लोकदेवता के रूप में की जाती है। मारवाड़ आंचल में उन्हें एक मस्तमौला, निराले और अनोखे देवता के रूप में विशेष आदर दिया जाता है, और कई स्थानों पर उन्हें महादेव के गण भैरूनाथ के स्वरूप में भी पूजा जाता है। इलोजी की जो प्रतिमाएं मंदिरों में स्थापित की जाती हैं, उन्हें बहुत करीने से सजाया जाता है और उनके सिर पर ठीक एक दूल्हे की तरह पारंपरिक साफा और कलंगी सुशोभित होती है। उनके गले में फूलों का खूबसूरत हार तथा हाथ-पैरों में पड़े कंगन उनकी इस मूर्ति को बेहद खास और अलग पहचान देते हैं। स्थानीय जनमानस की गहरी मान्यताओं के अनुसार, जिन दंपतियों को संतान सुख की प्राप्ति नहीं होती, वे महिलाएं विशेष रूप से इलोजी के मंदिर में पहुंचकर अपनी मन्नत मांगती हैं और आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। इसके अलावा, क्षेत्र के व्यापारी वर्ग भी अपने कारोबार में भारी तरक्की, बरकत और धन-धान्य की समृद्धि की कामना के लिए इन लोकदेवता की उपासना करते हैं, जिसके चलते साल भर इन पावन मंदिरों में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है और भक्तों का आना-जाना कभी बंद नहीं होता।
पाली सहित पूरे मारवाड़ क्षेत्र के अनेक इलाकों में इलोजी की पूजा-अर्चना की यह प्राचीन परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है जितनी डेढ़ सदी पहले हुआ करती थी। स्थानीय निवासियों और वहां के व्यापारियों के अनुसार, धानमंडी और सर्राफा बाजार के मुख्य परिसरों में स्थित करीब 150 साल पुराने इलोजी के इन मंदिरों में हर साल बहुत ही भव्य और विशेष अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं। जब होली और धुलंडी के पारंपरिक मेलों का उल्लास अपने चरम पर होता है, तब इन मंदिरों के आसपास की संस्कृति और लोक परंपराओं की ऐसी अद्भुत झलक देखने को मिलती है जो बरबस ही सबका मन मोह लेती है। इलोजी की यह लोककथा इस बात का सबसे बड़ा संदेश देती है कि प्रेम केवल किसी भौतिक रिश्ते को हासिल करने या वैवाहिक बंधन में बंध जाने तक सीमित नहीं होता, बल्कि किसी के प्रति अपना सर्वस्व समर्पित कर देना और उसकी यादों को जीवन की आखिरी सांस तक अपने दिल में संजोकर रखना भी प्रेम का ही एक अत्यंत पवित्र रूप है। यही वह मुख्य वजह है कि राजस्थान की संस्कृति और लोकचेतना में इलोजी की यह कहानी आज भी बुजुर्गों की जुबानी नई पीढ़ी को बड़े चाव से सुनाई जाती है।


















