जयपुर अपनी ऐतिहासिक इमारतों, किलों और महलों के साथ-साथ अपने प्राचीन धार्मिक स्थलों के लिए भी दुनियाभर में अलग पहचान रखता है। यहां 16वीं और 17वीं शताब्दी के दौरान राजा-महाराजाओं द्वारा कई मंदिरों और धार्मिक केंद्रों की स्थापना की गई थी, जो आज भी शहर की समृद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का अहम हिस्सा बने हुए हैं।
शहर में वैसे तो कई प्रमुख गुरुद्वारे मौजूद हैं, लेकिन सिख समुदाय की आस्था से जुड़े सबसे पहले गुरुद्वारे की बात करें तो यह ऐतिहासिक स्थल चारदीवारी के व्यस्त बाजार चौड़ा रास्ता में स्थित है। इस प्राचीन गुरुद्वारे का नाम श्री गुरु नानक देव सत्संग सभा है, जहां आज भी शहर के कोने-कोने से ही नहीं बल्कि देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु मत्था टेकने पहुंचते हैं। इस ऐतिहासिक स्थान पर गुरु स्वरूप पालकी, 10 गुरुओं की अत्यंत प्राचीन तस्वीर और उस कालखंड के शस्त्र आज भी सुरक्षित रूप से मौजूद हैं। सैकड़ों साल बीत जाने के बाद भी यह गुरुद्वारा अपनी ऐतिहासिक गरिमा और परंपरा को संजोए हुए लोगों की गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है।
जयपुर में हुई थी पहली सिख पीठ की स्थापना
ऐतिहासिक और स्थानीय जानकारियों के अनुसार, जयपुर के तत्कालीन राजा-महाराजाओं ने न केवल देश के भीतर बल्कि बाहरी क्षेत्रों से भी बेहतरीन कारीगरों, विद्वानों और विभिन्न धर्मों के लोगों को यहां आमंत्रित कर बसाया था। इसी क्रम में 16वीं शताब्दी के दौरान जब मिर्जा राजा मानसिंह काबुल-गांधार का युद्ध जीतकर आमेर लौटे थे, तब वह वहां से पांच सिख परिवारों को अपने साथ आमेर ले आए थे। इसके बाद, जब सवाई जयसिंह द्वारा आधुनिक जयपुर शहर की बसावट की जा रही थी, तब इन परिवारों के पूर्वजों को जड़ियों के रास्ते में बसाया गया था। शहर के निर्माण और बसावट के दौरान ही जयपुर में सिख पंथ की सेवा और पूजा-पाठ को सुचारू रूप से कायम रखने के लिए इस प्रथम गुरुद्वारे का निर्माण करवाया गया था।
इस धार्मिक स्थल के निर्माण के लिए सवाई जयसिंह द्वारा स्वयं जमीन दान दी गई थी। जयपुर के शाही शासक सभी धर्मों का आदर करते थे और राजपरिवार के सदस्य सिख गुरुओं के विशेष अनुयायी माने जाते थे। इसी धार्मिक सद्भाव और उदारता के परिणामस्वरूप जयपुर में गुरुद्वारे की स्थापना की गई और इसके आसपास के इलाकों में सिख परिवारों को बसाया गया ताकि वे अपनी संस्कृति और परंपराओं का निर्वाह कर सकें।
स्थापत्य कला और प्राचीन विरासतों का अनूठा संगम
जयपुर के चौड़ा रास्ता क्षेत्र में गोवर्धन नाथ जी की गली के भीतर स्थित यह गुरुद्वारा अपनी अनूठी और बेजोड़ स्थापत्य कला के लिए आज भी आकर्षण का केंद्र है। इस भवन की वास्तुकला में उस दौर के शाही देवालयों की तर्ज पर गुंबदनुमा और कलशनुमा आकृतियों के साथ बेहद बारीक नक्काशी देखने को मिलती है, जो आज भी पूरी तरह सुरक्षित है। इस गुरुद्वारे के भीतर राजस्थान का सबसे प्राचीन चित्र भी संरक्षित है, जिसे विशेष रूप से नेचर पेंटिंग में उपयोग होने वाले रंगों और पारंपरिक कुंदन मीनाकारी के जरिए तैयार किया गया था। इस दुर्लभ चित्र में सिख पंथ के सभी 10 गुरुओं को दर्शाया गया है।
इसके अलावा, गुरुद्वारे की स्थापना के शुरुआती दौर से ही यहां रखे गए प्राचीन शस्त्र भी आज तक संभालकर रखे गए हैं। सिख मर्यादा के नियमों का पालन करते हुए जहां गुरु ग्रंथ साहिब की सवारी का प्रकाश किया जाता है, वहीं इन पवित्र शस्त्रों को भी सुशोभित किया जाता है। इस स्थान पर पीढ़ियों से लगातार सेवा-पूजा, लंगर और प्रसाद वितरण की परंपरा पूरी निष्ठा के साथ निभाई जा रही है। चाहे गुरु नानक देव की जयंती हो या फिर कोई अन्य विशेष पर्व, यहां आने वाले श्रद्धालु दशकों और पीढ़ियों से इस पवित्र स्थान पर हाजिरी लगाते आ रहे हैं। यही प्रमुख कारण है कि यह गुरुद्वारा आज भी गुलाबी शहर की धार्मिक और सांस्कृतिक संस्कृति की एक विशिष्ट और जीवंत पहचान बना हुआ है।
















