धनतेरस के पावन अवसर पर सोने और चांदी की धातुएं खरीदने की सदियों पुरानी परंपरा इस बार एक नए रूप में सामने आ रही है. पौराणिक मान्यताओं के तहत नई धातु और नए बर्तनों का घर में आगमन अत्यंत मंगलकारी और सौभाग्यवर्धक माना जाता रहा है. पहले के दौर में धनतेरस की खरीदारी का मुख्य केंद्र केवल सामान्य चांदी के सिक्के या पारंपरिक घरेलू बर्तन हुआ करते थे. समय के साथ अब ग्राहकों की प्राथमिकताओं और उनकी पसंद के तौर-तरीकों में स्पष्ट बदलाव दर्ज किया जा रहा है. धार्मिक आस्था के साथ वास्तु के सिद्धांतों के प्रति बढ़ती रुचि ने लोगों को पारंपरिक सिक्कों के अलावा विशेष प्रतीकात्मक डिजाइनों की ओर मोड़ा है. इस बार सर्राफा बाजार में चांदी से तैयार हाथी और कछुए खरीदारों के बीच आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरे हैं. इसके साथ ही रिद्धि और सिद्धि के प्रदाता भगवान गणेश, देवी लक्ष्मी की पावन प्रतिमाओं और चांदी व पीतल के बर्तनों की निरंतर मांग भी बाजारों में बनी हुई है.
सिक्कों की पारंपरिक औपचारिकता से आगे निकला सर्राफा बाजार
जोधपुर समेत विभिन्न सर्राफा बाजारों में इस बार धनतेरस की खरीदारी को लेकर एक बेहद अनूठा मिजाज दिखाई दे रहा है. पूर्व में अधिकांश ग्राहक केवल चांदी का एक छोटा सिक्का खरीदकर इस पर्व की औपचारिक रस्म पूरी कर लेते थे. अब स्थिति यह है कि खरीदार चांदी से तराशी गई विभिन्न सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आकृतियों को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं. चांदी के हाथी, कछुए, देवी लक्ष्मी और भगवान गणेश के विग्रहों के साथ नए डिजाइनों वाले कलात्मक उत्पादों ने ग्राहकों का दिल जीत लिया है. सबसे अहम बात यह है कि उपभोक्ता इन कलाकृतियों को केवल निवेश या धातु संचय के साधन के तौर पर नहीं देख रहे हैं. वे इन्हें अपने आशियाने और कार्यस्थल में शांति, सकारात्मकता और संपन्नता के स्थाई प्रतीक के रूप में स्थापित कर रहे हैं.
हाथी और कछुए का धार्मिक आधार तथा वास्तु का प्रभाव
चांदी के गहने और विविध हस्तशिल्प उत्पाद तैयार करने वाले अनुभवी कारीगर लोकेश सोनी के अनुसार, सनातन परंपरा में हाथी को धन-वैभव की अधिष्ठात्री देवी मां लक्ष्मी, असीम ऐश्वर्य, शक्ति और स्थिरता का संवाहक स्वीकार किया गया है. इसी मान्यता के कारण चांदी के हाथी की आकृति को अत्यंत शुभ मानते हुए लोग अपने घरों के लिए पसंद कर रहे हैं. दूसरी तरफ, चांदी के कछुए का सीधा संबंध भगवान विष्णु के कच्छप अवतार और मां लक्ष्मी के शुभागमन से जुड़ा हुआ है. वास्तुशास्त्र के नियमों के तहत चांदी से निर्मित कछुए को घर या कारोबारी प्रतिष्ठान की उत्तर दिशा में स्थापित करना अत्यधिक फलदायी और कल्याणकारी माना जाता है. इन्हीं मान्यताओं के गहरे प्रभाव के चलते इस धनतेरस पर इन दोनों विशिष्ट आकृतियों की मांग में जबरदस्त उछाल दर्ज किया गया है.
चांदी और पीतल के बर्तनों की अटूट परंपरा
नवरूपों और नई आकृतियों के बढ़ते क्रेज के बावजूद धनतेरस पर चांदी और पीतल के बर्तन खरीदने की ऐतिहासिक परंपरा यथावत बनी हुई है. ग्राहक इन दोनों पावन धातुओं को आरोग्य, पवित्रता और पारिवारिक खुशहाली का स्रोत मानकर रसोई और पूजा के बर्तनों की खरीदारी में गहरी रुचि दिखा रहे हैं. इसके साथ ही मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की छवि अंकित चांदी के सिक्कों और उनकी मूर्तियों की पूछपरख भी बरकरार है. सर्राफा बाजार में दिख रहा यह परिवर्तन यह रेखांकित करता है कि अब धनतेरस की खरीदारी सिर्फ धातु के वजन और बाजार भाव तक सीमित नहीं है, बल्कि लोग अपनी आस्था, वास्तु के नियमों और शुभ प्रतीकों को भी बराबर का महत्व दे रहे हैं.























