दीपावली का पावन पर्व देश के अलग-अलग हिस्सों में अपनी अनूठी संस्कृति और लोक परंपराओं के साथ मनाया जाता है। देश के अन्य स्थानों पर जहां नरक चतुर्दशी के दिन भगवान कृष्ण की उपासना या यमराज के निमित्त दीपदान किया जाता है, वहीं राजस्थान के करौली जिले में छोटी दिवाली का स्वरूप पूरी तरह अलग नजर आता है। इस क्षेत्र में इस विशेष तिथि को कुत्तों के नाम दीप जलाने और उनके पूजन की अनूठी परंपरा का निर्वहन किया जाता है, जिसके चलते इसे स्थानीय बोलचाल में कुत्तों की दिवाली भी कहा जाता है।
छोटी दिवाली यानी नरक चतुर्दशी की रात करौली के तमाम घरों में महिलाएं विशेष रूप से आटे से चौमुखा दीपक तैयार करती हैं। इस दीपक को घर की देहरी या बाहर प्रज्वलित कर कुत्तों को समर्पित किया जाता है। इसके साथ ही आवारा या घर के आसपास दिखने वाले कुत्तों को मीठे पकवान और भोजन कराने का रिवाज भी पूरी निष्ठा के साथ निभाया जाता है। ऐसी प्राचीन मान्यता है कि इन दीपकों के प्रकाश से यमदूतों का मार्ग रोशन होता है और मृत्यु के देवता यमराज की विशेष कृपा परिवार पर बनी रहती है।
धार्मिक मान्यता और परिवार की सुरक्षा
स्थानीय ज्योतिषाचार्य एवं कर्मकांडी पंडित मनीष उपाध्याय के अनुसार, करौली में यह अनूठी परंपरा बरसों से चली आ रही है और इसके मूल में गहरी धार्मिक आस्था जुड़ी हुई है। सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार श्वान यानी कुत्ते को भैरव बाबा की सवारी और यमराज का दूत माना गया है। ऐसी धारणा है कि नरक चतुर्दशी के दिन कुत्तों की पूजा-अर्चना करने और उन्हें भरपेट भोजन कराने से यमराज प्रसन्न होते हैं, जिससे न केवल परिवार की हर प्रकार की विपत्तियों से सुरक्षा होती है बल्कि घर में सुख-समृद्धि का वास भी बना रहता है।
घर के बाहर जलाए जाते हैं चौमुखे दीप
इस विशिष्ट परंपरा का सबसे मुख्य आकर्षण आटे से बनने वाला चौमुखा दीपक होता है। महिलाएं इसे बड़े यत्न से बनाती हैं और छोटी दिवाली की संध्या पर इसे घर के मुख्य द्वार के बाहर प्रज्वलित करती हैं। कई परिवार इस अनुष्ठान को सीधे तौर पर कुत्तों के नाम जोड़कर देखते हैं। दीपक जलाने की इस क्रिया के साथ ही श्वानों को अपने हाथों से भोजन कराना इस सांस्कृतिक आयोजन का एक अनिवार्य और महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है.
गलियों में दिखता है अनोखा और जीवंत नजारा
छोटी दिवाली की रात जब करौली की तंग गलियों और मोहल्लों में अलग-अलग घरों के बाहर ये विशेष दीपक टिमटिमाते हैं, तो पूरा वातावरण अत्यंत अद्भुत हो जाता है। एक तरफ जहां लोग घरों के भीतर दीपोत्सव की अन्य तैयारियों में व्यस्त रहते हैं, वहीं दूसरी तरफ सड़कों पर कुत्तों के लिए जलने वाले ये दीप इस पर्व को एक बिल्कुल अलग और मानवीय पहचान देते हैं। इस रीति-रिवाज को पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभाने वाले परिवारों का साफ तौर पर मानना है कि यह महज एक कोरा धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि मूक जीवों के प्रति करुणा और स्नेह व्यक्त करने का एक सुंदर संदेश भी है।



















