राजस्थान के हाड़ौती इलाके में स्थित कोटा खान-पान की अलग परंपरा और संस्कृति की वजह से दुनिया के कई हिस्सों में परिचित है. इस पहचान में कोटा कचौरी का नाम खास है, जिसकी मांग भारत में ही नहीं, विदेशों में भी बनी हुई है. जोधपुर स्वीट्स के संचालक कमल पाठक ने एक साक्षात्कार में इस व्यंजन के इतिहास और स्वाद की खासियतों पर बात की है. उनका कहना है कि चंबल के पानी की खास तासीर इसके अनूठे जायके में अहम भूमिका निभाती है.
1965 में कोटा से शुरू हुआ कारोबारी सफर
इस कारोबार की शुरुआत 1965 में हुई, जब मूल रूप से जोधपुर से आने वाले दिवंगत कुंदन लाल जी पाठक ने कोटा में ‘जोधपुर स्वीट्स’ खोला. परिवार की जड़ें जयपुर की मेजबानी और होटल कारोबार से भी जुड़ी हैं. गुलाबचंद जी के दादाजी दिवंगत जगदीश जी ने वहां ‘जगदीश होटल’ की नींव रखी थी और 65 कमरों से इसकी शुरुआत की. बाद में परिवार ने कोटा में जोधपुर स्वीट्स के नाम से कारोबार आगे बढ़ाया.
तेल, हींग और मसालों की भूमिका
कचौरी की तलावट शुद्ध मूंगफली के तेल में होती है. तेल की शुद्धता और मसालों का बेहतरीन संतुलन इसकी मुख्य पहचान है. हींग का चुनाव बिल्कुल शुद्ध सामग्री तक सीमित रखा जाता है. मिश्रण में काली मिर्च का मसाला, अलग-अलग प्रकार के गरम मसाले और अन्य शुद्ध मसाले शामिल होते हैं. इन सबके मेल से जो स्वाद तैयार होता है, उसे देश के किसी दूसरे हिस्से में उसी रूप में नहीं पाया जाता.
सामान्य कचौरियां भारत के कई हिस्सों में मिल जाती हैं, लेकिन कोटा वाली पहचान पूरी तैयारी के मेल से बनती है. परिवार का जोर किसी एक मसाले पर नहीं, बल्कि पानी, तेल, हींग और मसालों की साझा भूमिका पर है. इसी मिली-जुली तैयारी की वजह से इसे सामान्य कचौरियों से अलग देखा जाता है.
नाश्ते से मेहमाननवाजी तक
यह कचौरी सुबह के नाश्ते का हिस्सा ही नहीं है. पिकनिक हो या शादी-ब्याह, छोटा समारोह हो या बड़ा आयोजन, इन मौकों पर इसे खास तौर पर रखा जाता है. घर में मेहमान आने पर पहले कोटा कचौरी या जोधपुर की प्याज कचौरी परोसकर स्वागत किया जाता है. इस तरह यह व्यंजन रोजमर्रा के खाने और मेहमाननवाजी, दोनों में जुड़ा हुआ है.
इन तमाम मौकों पर इसका शामिल होना दिखाता है कि यह केवल बाजार में मिलने वाला नाश्ता नहीं है. यह स्थानीय रस्मों, दैनिक खाने और मेहमानों का स्वागत करने के तरीके का भी हिस्सा बन गया है.
दुकान से शोरूम तक और कोटा से जोधपुर तक
जब जोधपुर स्वीट्स ने कोटा में काम शुरू किया, तब शहर को उद्योग नगरी कहा जाता था. वहां की दुकान धीरे-धीरे बड़े शोरूम में बदली और विरासत अगली पीढ़ियों के हाथ में पहुंची. कोटा और जोधपुर में अब इसकी शाखाएं चल रही हैं. 1965 में शुरू हुआ यह सफर अब आगे की पीढ़ियों के साथ कोटा और जोधपुर में बढ़ रहा है.
गुलाबचंद, अरुण और कमल दूसरी पीढ़ी के तौर पर संचालन संभाल रहे हैं. उनके बाद साहिल, तनय और कार्तिक तीसरी पीढ़ी से पूरी जिम्मेदारी के साथ काम में शामिल हैं. दूसरी और तीसरी पीढ़ी की भूमिका इस बात को स्पष्ट करती है कि कारोबार अब परिवार की साझा जिम्मेदारी बन चुका है.
जयपुर के होटल और कोटा की मिठाई दुकान की कहानियां मिलकर परिवार की मेजबानी और खान-पान कारोबार की पुरानी पृष्ठभूमि दिखाती हैं. कोटा की दुकान का बड़े शोरूम में बदलना इसी लंबे सफर का अगला चरण है.



















