त्योहारों का मौसम आते ही देश के हर कोने में खानपान की रौनक बढ़ जाती है और बात जब मिठाइयों के साथ नमकीन की हो, तो शहर विशेष के स्वाद सबसे आगे आ जाते हैं। देश के प्रमुख शिक्षा केंद्र कोटा की अपनी एक अलग पहचान है, जो यहां के मशहूर कड़के सेव से जुड़ी हुई है। तीखेपन, चटपटे मसालों और अलसी के तेल में तैयार होने वाले इन कुरकुरे सेव का स्वाद ऐसा है कि जो भी इन्हें एक बार चखता है, उसकी यादों में यह हमेशा के लिए बस जाता है। दिवाली जैसे बड़े अवसरों पर घरों की मेहमाननवाज़ी में इनका खास स्थान होता है और लोग इन्हें बड़े चाव से खरीदते हैं।
अलसी के तेल से मिलती है खास पहचान
कोटा के इन पारंपरिक कड़के सेव की सबसे बड़ी विशेषता इनको बनाने की वह पुरानी विधि है, जो सौ साल से भी अधिक समय से चली आ रही है। बाजार में मिलने वाली अधिकांश नमकीनें अलग-अलग तरह के खाद्य तेलों में बनाई जाती हैं, लेकिन इस विशेष नमकीन को तैयार करने में अलसी के तेल का प्रयोग किया जाता है। यही एक मुख्य वजह है जो इसके स्वाद को अन्य सभी नमकीनों से बिल्कुल अलग और अनूठा बनाती है। इसका तीखापन और जबरदस्त कुरकुरापन खाने वालों को अपनी ओर खींचता है, जिसके कारण कोटा के बाहर से आने वाले पर्यटक भी इस जायके को अपने साथ ले जाना नहीं भूलते हैं।
चार पीढ़ियों से संजोई जा रही है विरासत
किसी भी पारंपरिक व्यंजन की सफलता इस बात में निहित होती है कि उसे बनाने वाले लोग उसकी मूल पहचान को कैसे संभाल कर रखते हैं। कोटा में इस पुरानी परंपरा को मोहन जी की चौथी पीढ़ी आज भी पूरी ईमानदारी और मेहनत के साथ आगे बढ़ा रही है। समय के साथ भले ही लोगों की पसंद में बदलाव आए हों और बाजार में तरह-तरह के नए उत्पाद आ गए हों, लेकिन कड़के सेव के जायके और गुणवत्ता में कोई कमी नहीं आई है। पुराने ग्राहकों के लिए यह नमकीन सिर्फ खाने की वस्तु नहीं है, बल्कि उनके बचपन और पुरानी यादों का एक खूबसूरत हिस्सा है, जबकि युवा पीढ़ी भी इसके अनोखे स्वाद की दीवानी हो रही है।
त्योहारों के दिनों में बढ़ती है मांग
दीपावली जैसे पावन पर्व पर घरों में मिठाइयों के साथ-साथ नमकीन की खरीददारी भी जोरों पर होती है। रिश्तेदारों का आना-जाना हो या मेहमानों का स्वागत करना हो, कोटा के कड़के सेव हर मौके पर लोगों की पहली पसंद बने रहते हैं। त्योहारी सीजन में इनकी मांग में भारी उछाल देखने को मिलता है। स्थानीय निवासियों के लिए यह नमकीन केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं है, बल्कि उनकी संस्कृति और खानपान की अनमोल विरासत का प्रतीक है। इसके अलावा, शहर में कोचिंग के लिए आने वाले हजारों विद्यार्थी और बाहर से घूमने आने वाले लोग भी इस स्थानीय स्वाद का लुत्फ उठाना नहीं भूलते हैं।





















