उत्तराखंड सरकार द्वारा जच्चा और बच्चा के पोषण और स्वास्थ्य को सहारा देने के मकसद से चलाई जा रही महालक्ष्मी किट योजना प्रशासनिक लापरवाही की जद में आ गई है। नवजात बच्चों और स्तनपान कराने वाली माताओं के उपयोग के लिए तैयार की गई इन किटों में समय सीमा पार कर चुका सामान दिए जाने का मामला सामने आया है। इस तरह के पुराने उत्पादों का इस्तेमाल प्रसूता और नवजात शिशु दोनों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डाल सकता है, जिसको लेकर अब व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
देहरादून के गढ़ी कैंट में सामने आई गंभीर लापरवाही
लापरवाही की यह सीधी घटना राजधानी देहरादून के गढ़ी कैंट क्षेत्र से सामने आई। यहां 7 सितंबर को एक धात्री महिला को आधिकारिक वितरण के तहत महालक्ष्मी किट दी गई थी। घर पहुंचकर जब परिजनों ने डिब्बे को खोलकर उसमें रखी सामग्री की जांच की, तो उसमें मौजूद शरीर पर लगाने वाला तेल, क्रीम और खाने-पीने का सामान अपनी मियाद पूरी कर चुका था। पीड़िता के अनुसार, उस सामग्री की अंतिम वैध तारीख 30 अगस्त ही दर्ज थी। यानी वैधता खत्म होने के एक हफ्ते से भी अधिक समय बाद यह किट महिला को सौंप दी गई थी।
महालक्ष्मी किट में शामिल वस्तुएं और उनका मूल्य
योजना के नियमों के मुताबिक, प्रत्येक लाभार्थी को लगभग 3 हजार रुपये मूल्य की सामग्री उपलब्ध कराई जाती है, जिसमें कुल 23 तरह के जरूरी सामान रखे जाते हैं। इनमें से 13 उत्पाद विशेष रूप से गर्भवती और धात्री महिलाओं की जरूरतों को ध्यान में रखकर तय किए गए हैं, जिनमें 250 ग्राम सूखी खुमानी, छुआरा, सरसों का तेल, नहाने का साबुन और कपड़े धोने का साबुन शामिल हैं। इसके अलावा 9 अन्य चीजें नवजात शिशु की देखभाल के लिए होती हैं, जिनमें शिशु के उपयोग का तेल, साबुन, क्रीम तथा 2 जोड़ी कपड़े शामिल किए जाते हैं।
निदेशालय ने जारी किया आदेश, व्यवस्था सुधारने की कवायद
मामले के सार्वजनिक होने और विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े होने के बाद महिला एवं बाल विकास निदेशालय हरकत में आया। फजीहत से बचने के लिए निदेशालय स्तर पर 25 सितंबर को एक आधिकारिक पत्र जारी किया गया, जो प्रदेश के सभी जिला कार्यक्रम अधिकारियों यानी DPO को भेजा गया है। इस आदेश में स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि वितरण केंद्रों पर ‘फर्स्ट इन फर्स्ट आउट’ (FIFO) व्यवस्था को कड़ाई से लागू किया जाए। इसका सीधा मतलब यह है कि जो किट या सामग्री पहले आई है अथवा जिसकी एक्सपायरी नजदीक है, उसे प्राथमिकता के आधार पर पहले वितरित किया जाए। साथ ही संपूर्ण वितरण और निगरानी व्यवस्था को पुख्ता बनाने को कहा गया है।
आंगनबाड़ी राशन और भंडारण प्रणाली पर पहले भी उठ चुके हैं सवाल
राज्य में पोषण योजनाओं के भंडारण और वितरण में अनियमितता का यह कोई अकेला मामला नहीं है। इससे पहले भी प्रदेश के विभिन्न आंगनबाड़ी केंद्रों से बच्चों और गर्भवती महिलाओं को मिलने वाले राशन को लेकर शिकायतें आती रही हैं। पूर्व में केंद्रों से बांटे जाने वाले अंडे, सत्तू और हलवे की गुणवत्ता पर सवाल उठ चुके हैं और स्थानीय नागरिक अमानक व खराब पोषण सामग्री दिए जाने की बात उठाते रहे हैं। अब देखना होगा कि उच्च स्तर से जारी इन नए दिशा-निर्देशों के बाद जमीनी स्तर पर वितरण प्रणाली कितनी पारदर्शी और सुरक्षित हो पाती है।



















