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लद्दाख के दुर्गम मोर्चों पर 3100 किमी का सफर तय कर पार्वती जांगिड़ ने 3750 जवानों को बांधा रक्षासूत्रराजस्थान
21 सित॰ 2026, 3:26 pm (33 मिनट पहले)· 0

लद्दाख के दुर्गम मोर्चों पर 3100 किमी का सफर तय कर पार्वती जांगिड़ ने 3750 जवानों को बांधा रक्षासूत्र

जोधपुर की पार्वती जांगिड़ सुथार ने लद्दाख की कठिन सीमाओं पर 21 दिनों का अभियान पूरा किया, जहां उन्होंने सियाचिन और रेजांग ला जैसे रणनीतिक मोर्चों पर तैनात 3750 सैनिकों को रक्षासूत्र बांधे.

देश के सबसे कठिन और बर्फीले सीमांत इलाकों में तैनात भारतीय सैनिकों के प्रति कृतज्ञता जताने के लिए एक विशेष अभियान पूरा किया गया है. ‘युवा संसद, भारत’ की चेयरपर्सन कर्नल (मानद) पार्वती जांगिड़ सुथार ने लद्दाख के अत्यधिक दुर्गम क्षेत्रों में 3100 किलोमीटर लंबी यात्रा तय की. 21 दिनों तक चले इस विशेष अभियान में उन्होंने सीमा चौकियों पर तैनात लगभग 3750 जवानों की कलाइयों पर अपने हाथों से तैयार किए गए रक्षासूत्र बांधे. इसके साथ ही विभिन्न मोर्चों पर सक्रिय 71 सैन्य फॉर्मेशन्स और यूनिट्स को कर्तव्यनिष्ठा के लिए सम्मानित किया गया.

दिल्ली से शुरू हुआ भारत रक्षा पर्व अभियान

इस पूरे सफर का आयोजन “सुरक्षित सीमा-समर्थ भारत, 35वीं भारत रक्षा पर्व यात्रा-2026” के बैनर तले किया गया. अभियान की आधिकारिक शुरुआत 28 अगस्त को देश की राजधानी दिल्ली में हुई थी. इस मौके पर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल एन. एस. राजा सुब्रमणि को रक्षासूत्र बांधकर इस राष्ट्रव्यापी यात्रा का शुभारंभ किया गया. इसके पश्चात पार्वती जांगिड़ सीधे लद्दाख के सीमावर्ती इलाकों में पहुंचीं, जहां उन्होंने भारतीय सेना, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) और सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) के बहादुर जवानों से मुलाकात कर उनका हौसला बढ़ाया.

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रेजांग ला युद्ध स्मारक पर वीरों को नमन

इस पूरी यात्रा का सबसे मार्मिक और भावनात्मक क्षण 16,420 फीट की ऊंचाई पर स्थित ऐतिहासिक रेजांग ला युद्ध स्मारक पर देखने को मिला. यह वही रणभूमि है जहां 18 नवंबर 1962 को 13 कुमाऊं की चार्ली कंपनी के शूरवीरों ने चीनी सेना के खिलाफ अदम्य साहस दिखाते हुए ऐतिहासिक मुकाबला किया था. इस भीषण युद्ध में कंपनी कमांडर मेजर शैतान सिंह, परमवीर चक्र समेत अनेक रणबांकुरों ने मातृभूमि की रक्षा में अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था. जोधपुर के रहने वाले वीर सपूत मेजर शैतान सिंह की शहादत स्थली पर पहुंचकर पार्वती जांगिड़ ने पुष्पचक्र अर्पित किया और युद्धभूमि की पावन मिट्टी को अपने माथे से लगाकर वीरों के बलिदान को याद किया.

सियाचिन ग्लेशियर और बाल्टिस्तान के अंतिम गांवों में पहुंचीं

कठिन जलवायु और शून्य से नीचे के तापमान के बीच पार्वती जांगिड़ दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर के बेस कैंप और अग्रिम मोर्चों तक पहुंचीं. उन्होंने वहां हाड़ कंपा देने वाली ठंड में तैनात ‘सियाचिन वॉरियर्स’ के साथ रक्षाबंधन का पावन पर्व मनाया और जवानों को रक्षासूत्र बांधे. इस पड़ाव पर उन्होंने ग्लेशियर के रक्षक माने जाने वाले ‘ओपी बाबा’ के पवित्र देवस्थल पर भी मत्था टेका और देश की रक्षा में लगे हर जवान की दीर्घायु, सुरक्षित सेवा तथा उनके परिवारों की सुख-समृद्धि की कामना की.

इसके अलावा वह ऐतिहासिक बाल्टिस्तान क्षेत्र के सीमावर्ती गांवों में भी गईं. वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध में अदम्य पराक्रम के साक्षी रहे तुरतुक, थांग, त्याक्षी और चालुंका जैसे अग्रिम गांवों का दौरा कर उन्होंने लद्दाख स्काउट्स और मेजर चेवांग रिनचेन के शौर्य को श्रद्धांजलि अर्पित की. उन्होंने गिलगित-बाल्टिस्तान के प्रवेश द्वार के रूप में विख्यात ‘जीरो आरडी’ पोस्ट पर पहुंचकर वहां तैनात पहरेदारों को रक्षासूत्र बांधे.

सैन्य इकाइयों और अधिकारियों का हुआ सम्मान

इस 21 दिवसीय अभियान के दौरान न केवल 3,750 से अधिक सैनिकों को स्नेह का रक्षासूत्र बांधा गया, बल्कि उत्कृष्ट सामरिक योगदान के लिए 71 सैन्य फॉर्मेशन्स और यूनिट्स को ‘युवा संसद, भारत’ की तरफ से यूनिट प्रशस्ति-पत्र प्रदान किए गए. इसके अलावा रणनीतिक नेतृत्व और दीर्घकालिक राष्ट्र सेवा के लिए 99 वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को ‘राष्ट्रीय योद्धा सेवा सम्मान’ से अलंकृत किया गया. कठिन भौगोलिक चुनौतियों के बीच हजारों किलोमीटर का फासला तय कर जवानों तक पहुंचने के इस प्रयास की सेना, आईटीबीपी और बीआरओ के कमांडरों ने सराहना की और विशेष प्रशस्ति-पत्र सौंपे. इस व्यापक यात्रा का औपचारिक समापन कारगिल वॉर मेमोरियल, द्रास में अमर बलिदानियों को पुष्पचक्र अर्पित करने के साथ संपन्न हुआ.

सवाल-जवाब

पार्वती जांगिड़ सुथार ने लद्दाख में कितने किलोमीटर का सफर तय किया?
उन्होंने लद्दाख के दुर्गम सीमांत इलाकों में 21 दिनों के दौरान कुल 3100 किलोमीटर की यात्रा पूरी की.
इस अभियान के तहत कितने जवानों को रक्षासूत्र बांधे गए?
इस यात्रा के दौरान लगभग 3750 जवानों की कलाई पर स्वयं तैयार किए गए रक्षासूत्र बांधे गए.
35वीं भारत रक्षा पर्व यात्रा की शुरुआत कब और कहां से हुई?
इस यात्रा की शुरुआत 28 अगस्त को दिल्ली में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल एन. एस. राजा सुब्रमणि को रक्षासूत्र बांधकर की गई थी.
रेजांग ला युद्ध स्मारक पर किस वीर सपूत को श्रद्धांजलि दी गई?
वहां 1962 के युद्ध में सर्वोच्च बलिदान देने वाले 13 कुमाऊं के मेजर शैतान सिंह, परमवीर चक्र और अन्य वीर जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई.
इस यात्रा का औपचारिक समापन किस स्थान पर हुआ?
अभियान का समापन ऐतिहासिक कारगिल वॉर मेमोरियल, द्रास में अमर बलिदानियों को पुष्पचक्र अर्पित करने के साथ हुआ.
अभियान के दौरान कितनी सैन्य इकाइयों और अधिकारियों को सम्मानित किया गया?
यात्रा में 71 सैन्य फॉर्मेशन्स एवं यूनिट्स को यूनिट प्रशस्ति-पत्र और 99 वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को राष्ट्रीय योद्धा सेवा सम्मान प्रदान किए गए.
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टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·6 मिनट पहले

लद्दाख और सियाचिन जैसे सामरिक रूप से अत्यंत संवेदनशील और दुर्गम क्षेत्रों में 3100 किलोमीटर की यह यात्रा केवल एक सांस्कृतिक या भावनात्मक आयोजन नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा में तैनात जवानों के मनोबल को ऊंचा रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। 16,420 फीट की ऊंचाई पर रेजांग ला और सियाचिन के अग्रिम मोर्चों तक पहुंचना, जहां सुरक्षा और लॉजिस्टिक्स की कड़ी चुनौतियां होती हैं, यह दर्शाता है कि ऐसे अभियानों से सीमा प्रहरियों और नागरिकों के बीच का बंधन कितना मजबूत होता है। भविष्य में इस प्रकार के नागरिक-सैन्य संपर्क अभियान दूरदराज की चौकियों पर तैनात सुरक्षा बलों की मानसिक दृढ़ता को और बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएंगे।

Rohan Verma@rohan-verma·6 मिनट पहले

यह अभियान सिर्फ लद्दाख तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों के युवाओं और समाज में भी राष्ट्रभक्ति का एक मजबूत संदेश भेजता है। जब दूरदराज के क्षेत्रों में तैनात जवान ऐसे आयोजनों से जुड़ते हैं, तो उनकी मानसिक दृढ़ता और प्रशासनिक स्तर पर सीमावर्ती क्षेत्रों के प्रति संवेदनशीलता दोनों बढ़ती हैं। आने वाले समय में रक्षा और नागरिक जुड़ाव के ऐसे प्रयास सामरिक मोर्चों पर तैनात हमारे बलों के लिए एक बड़ी मनोवैज्ञानिक ताकत बनेंगे।

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