देश के सबसे कठिन और बर्फीले सीमांत इलाकों में तैनात भारतीय सैनिकों के प्रति कृतज्ञता जताने के लिए एक विशेष अभियान पूरा किया गया है. ‘युवा संसद, भारत’ की चेयरपर्सन कर्नल (मानद) पार्वती जांगिड़ सुथार ने लद्दाख के अत्यधिक दुर्गम क्षेत्रों में 3100 किलोमीटर लंबी यात्रा तय की. 21 दिनों तक चले इस विशेष अभियान में उन्होंने सीमा चौकियों पर तैनात लगभग 3750 जवानों की कलाइयों पर अपने हाथों से तैयार किए गए रक्षासूत्र बांधे. इसके साथ ही विभिन्न मोर्चों पर सक्रिय 71 सैन्य फॉर्मेशन्स और यूनिट्स को कर्तव्यनिष्ठा के लिए सम्मानित किया गया.
दिल्ली से शुरू हुआ भारत रक्षा पर्व अभियान
इस पूरे सफर का आयोजन “सुरक्षित सीमा-समर्थ भारत, 35वीं भारत रक्षा पर्व यात्रा-2026” के बैनर तले किया गया. अभियान की आधिकारिक शुरुआत 28 अगस्त को देश की राजधानी दिल्ली में हुई थी. इस मौके पर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल एन. एस. राजा सुब्रमणि को रक्षासूत्र बांधकर इस राष्ट्रव्यापी यात्रा का शुभारंभ किया गया. इसके पश्चात पार्वती जांगिड़ सीधे लद्दाख के सीमावर्ती इलाकों में पहुंचीं, जहां उन्होंने भारतीय सेना, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) और सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) के बहादुर जवानों से मुलाकात कर उनका हौसला बढ़ाया.
रेजांग ला युद्ध स्मारक पर वीरों को नमन
इस पूरी यात्रा का सबसे मार्मिक और भावनात्मक क्षण 16,420 फीट की ऊंचाई पर स्थित ऐतिहासिक रेजांग ला युद्ध स्मारक पर देखने को मिला. यह वही रणभूमि है जहां 18 नवंबर 1962 को 13 कुमाऊं की चार्ली कंपनी के शूरवीरों ने चीनी सेना के खिलाफ अदम्य साहस दिखाते हुए ऐतिहासिक मुकाबला किया था. इस भीषण युद्ध में कंपनी कमांडर मेजर शैतान सिंह, परमवीर चक्र समेत अनेक रणबांकुरों ने मातृभूमि की रक्षा में अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था. जोधपुर के रहने वाले वीर सपूत मेजर शैतान सिंह की शहादत स्थली पर पहुंचकर पार्वती जांगिड़ ने पुष्पचक्र अर्पित किया और युद्धभूमि की पावन मिट्टी को अपने माथे से लगाकर वीरों के बलिदान को याद किया.
सियाचिन ग्लेशियर और बाल्टिस्तान के अंतिम गांवों में पहुंचीं
कठिन जलवायु और शून्य से नीचे के तापमान के बीच पार्वती जांगिड़ दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर के बेस कैंप और अग्रिम मोर्चों तक पहुंचीं. उन्होंने वहां हाड़ कंपा देने वाली ठंड में तैनात ‘सियाचिन वॉरियर्स’ के साथ रक्षाबंधन का पावन पर्व मनाया और जवानों को रक्षासूत्र बांधे. इस पड़ाव पर उन्होंने ग्लेशियर के रक्षक माने जाने वाले ‘ओपी बाबा’ के पवित्र देवस्थल पर भी मत्था टेका और देश की रक्षा में लगे हर जवान की दीर्घायु, सुरक्षित सेवा तथा उनके परिवारों की सुख-समृद्धि की कामना की.
इसके अलावा वह ऐतिहासिक बाल्टिस्तान क्षेत्र के सीमावर्ती गांवों में भी गईं. वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध में अदम्य पराक्रम के साक्षी रहे तुरतुक, थांग, त्याक्षी और चालुंका जैसे अग्रिम गांवों का दौरा कर उन्होंने लद्दाख स्काउट्स और मेजर चेवांग रिनचेन के शौर्य को श्रद्धांजलि अर्पित की. उन्होंने गिलगित-बाल्टिस्तान के प्रवेश द्वार के रूप में विख्यात ‘जीरो आरडी’ पोस्ट पर पहुंचकर वहां तैनात पहरेदारों को रक्षासूत्र बांधे.
सैन्य इकाइयों और अधिकारियों का हुआ सम्मान
इस 21 दिवसीय अभियान के दौरान न केवल 3,750 से अधिक सैनिकों को स्नेह का रक्षासूत्र बांधा गया, बल्कि उत्कृष्ट सामरिक योगदान के लिए 71 सैन्य फॉर्मेशन्स और यूनिट्स को ‘युवा संसद, भारत’ की तरफ से यूनिट प्रशस्ति-पत्र प्रदान किए गए. इसके अलावा रणनीतिक नेतृत्व और दीर्घकालिक राष्ट्र सेवा के लिए 99 वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को ‘राष्ट्रीय योद्धा सेवा सम्मान’ से अलंकृत किया गया. कठिन भौगोलिक चुनौतियों के बीच हजारों किलोमीटर का फासला तय कर जवानों तक पहुंचने के इस प्रयास की सेना, आईटीबीपी और बीआरओ के कमांडरों ने सराहना की और विशेष प्रशस्ति-पत्र सौंपे. इस व्यापक यात्रा का औपचारिक समापन कारगिल वॉर मेमोरियल, द्रास में अमर बलिदानियों को पुष्पचक्र अर्पित करने के साथ संपन्न हुआ.





















