डेयरी व्यवसाय अथवा घरेलू उपयोग के लिए दुधारू मवेशी चुनते समय बरती गई थोड़ी सी भी लापरवाही खरीदार की जेब पर भारी पड़ सकती है। यदि बिना सोचे-समझे केवल बेचने वाले के दावों पर यकीन कर लिया जाए, तो हजारों रुपये का घाटा होना तय है। इसलिए किसी भी गाय अथवा भैंस की खरीदारी को अंतिम रूप देने से पहले उसके दूध देने की वास्तविक क्षमता, थनों की स्थिति, दांतों से उम्र की पहचान, शारीरिक बनावट और स्वभाव की बारीकी से जांच करना बेहद आवश्यक कदम है।
दूध निकालने की तीन बार जांच और लेवटी की बनावट
पशु की दुग्ध क्षमता का सही आकलन करने के लिए एक बार का दूध देखना काफी नहीं होता। सबसे सुरक्षित तरीका यह है कि खरीदार लगातार तीन समय अपने हाथों से दूध निकालकर नापे। उदाहरण के तौर पर पहले दिन की शाम, अगले दिन की सुबह और फिर उसी दिन की शाम को दूध निकालें। इससे दूध की औसत मात्रा स्पष्ट हो जाती है। इसके साथ ही लेवटी यानी अयन और थनों की सेहत को भी भलीभांति परखना चाहिए। चारों थन एक समान आकार के होने चाहिए और उनके बीच बराबर दूरी बनी रहनी चाहिए। हल्के हाथों से थनों को टटोलकर देखें कि उनमें कोई सख्त गांठ, सूजन, लाली अथवा दर्द के लक्षण तो नहीं हैं, जो किसी बीमारी का संकेत हो सकते हैं।
दूध की नसें और ब्यांत का सही चुनाव
पशु के पेट के निचले भाग से शुरू होकर लेवटी तक पहुंचने वाली दूध की नसों का अध्ययन करना अत्यधिक लाभकारी रहता है। यदि यह नसें त्वचा पर साफ उभरी हुई, मोटी और लहरदार यानी टेढ़ी-मेढ़ी नजर आती हैं, तो यह अच्छे दुधारू पशु का मुख्य लक्षण माना जाता है। इसके विपरीत, जिन मवेशियों की नसें सपाट, सीधी या बहुत पतली होती हैं, उनमें प्रायः दूध उत्पादन कम दर्ज किया जाता है। खरीदारी के समय ब्यांत का क्रम भी ध्यान में रखें। अनुभवी जानकारों के अनुसार दूसरे या तीसरे ब्यांत का पशु खरीदना सबसे फायदे का सौदा साबित होता है, क्योंकि इस अवधि में पशु अपने उत्पादन के चरम पर रहता है।
दांत देखकर उम्र का पता लगाना और स्वभाव की परख
मवेशी की सही आयु जानने का सबसे प्रामाणिक तरीका उसके निचले जबड़े के दांत देखना है। पशु का मुंह खोलकर देखें, यदि उसके निचले जबड़े में चार से छह स्थायी दांत मौजूद हैं, तो वह पूर्णतः युवा माना जाता है। बहुत अधिक घिसे हुए, कमजोर अथवा टूटे दांत यह दर्शाते हैं कि पशु वृद्ध हो चुका है और आगे चलकर उसकी दूध देने की क्षमता घट जाएगी। इसके अतिरिक्त पशु के व्यवहार को समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उसकी पीठ पर स्नेह से हाथ फेरें और थनों को छूने का प्रयास करें। यदि पशु अत्यधिक बेचैन होता है, चिड़चिड़ापन दिखाता है, पैर चलाता है या अपरिचित व्यक्ति को पास नहीं आने देता, तो बाद में उसे पालना और दूध निकालना मुश्किल भरा हो सकता है।
शारीरिक ढांचा, 15 से 20 कदम की चाल और बछिया
उत्तम दुधारू पशु का शरीर आगे से पतला और पीछे से चौड़ा, यानी एक त्रिभुज के आकार जैसा दिखना चाहिए। उसकी त्वचा चमकदार, पतली और ढीली होनी चाहिए। आंखें पूरी तरह साफ व चमकीली दिखें और थूथन यानी नाक पर हल्की नमी बनी रहनी चाहिए। पशु को खूंटे से खोलकर कम से कम 15 से 20 कदम अवश्य चलाएं, ताकि पैरों का लंगड़ापन, चाल की कमजोरी अथवा खुरों के मुड़े होने का दोष सामने आ सके। खुर जरूरत से ज्यादा बड़े या टेढ़े न हों और उसका गोबर भी सामान्य बंधा हुआ होना चाहिए। इसके अलावा, यदि पशु के साथ मादा बच्चा यानी बछिया या कटिया हो, तो उसे प्राथमिकता दें, जिससे भविष्य में घर पर ही एक और दुधारू पशु तैयार हो सके।


















