राजस्थान के भरतपुर स्थित केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान में इन दिनों बर्ड वॉचर्स के कान ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गए हैं. यहां घास के मैदानों में दुर्लभ और बेहद शर्मीला पक्षी ब्रिस्टल्ड ग्रासबर्ड मानसून के साथ फिर सक्रिय हो गया है, लेकिन इसे कैमरे में उतारना तो दूर, आंखों से देख पाना भी किसी चुनौती से कम नहीं है.
आवाज है पहचान, शक्ल है राज
ब्रिस्टल्ड ग्रासबर्ड की खासियत यही है कि यह जितनी आसानी से सुनाई देता है, उतनी ही मुश्किल से दिखाई देता है. घनी और ऊंची घास के बीच रहने वाला यह पक्षी इंसानी आहट भांपते ही झट से छिप जाता है. यही वजह है कि केवलादेव पहुंचने वाले सैलानी और पक्षी प्रेमी अक्सर इसकी मीठी और तेज पुकार तो सुन लेते हैं, मगर पक्षी उनकी नजरों से ओझल ही रहता है.
बारिश ने बिछाई पक्षियों के लिए हरी चादर
दरअसल मानसून की बारिश के बाद केवलादेव घना में हरियाली अपने पूरे शबाब पर आ जाती है. कांस और घास के मैदान घने हो जाते हैं, जिससे पक्षियों को छिपने और भोजन तलाशने के लिए मुफीद माहौल मिलता है. इसी अनुकूल वातावरण के चलते ब्रिस्टल्ड ग्रासबर्ड जैसे शर्मीले पक्षी भी बाहर निकलकर सक्रिय हो जाते हैं और अपनी मौजूदगी आवाज के जरिए दर्ज कराने लगते हैं. मौसम बदलते ही उद्यान में पक्षियों की चहल-पहल और उनकी आदतों में भी फर्क साफ नजर आने लगता है.
फोटोग्राफरों के लिए घंटों का सब्र
घना के अलग-अलग घास वाले हिस्सों में गूंज रही इस आवाज ने बर्ड वॉचर्स की उत्सुकता बढ़ा दी है. अनुभवी पक्षी प्रेमी सिर्फ आवाज सुनकर ही दूर से बता देते हैं कि ब्रिस्टल्ड ग्रासबर्ड आसपास मौजूद है. कई बर्ड फोटोग्राफर इसकी एक झलक कैद करने के लिए घास के मैदानों में घंटों टकटकी लगाए बैठे रहते हैं. लेकिन जरा सी हलचल या आहट होते ही यह पक्षी दोबारा घास में गुम हो जाता है, इसलिए इसे देखने का इकलौता तरीका है, पूरी तरह खामोश और धैर्यवान बने रहना.
सैकड़ों प्रजातियों का घर है केवलादेव
केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान को दुनियाभर में उसकी जैव विविधता के लिए जाना जाता है, जहां सैकड़ों प्रजातियों के पक्षी पाए जाते हैं. हर मौसम के साथ यहां पक्षियों की गतिविधियों और उनकी संख्या में बदलाव देखने को मिलता है. मानसून के महीनों में घास के मैदान कई स्थानीय और दुर्लभ पक्षियों के लिए अस्थायी लेकिन बेहद जरूरी ठिकाना बन जाते हैं, और ब्रिस्टल्ड ग्रासबर्ड इसी मौसमी बदलाव का सबसे दिलचस्प उदाहरण है.
घना घूमने जाएं तो कान भी रखें खुले
अगर आप मानसून के मौसम में केवलादेव घना घूमने की योजना बना रहे हैं तो सिर्फ आंखों से पक्षी तलाशने के बजाय अपने कानों पर भी भरोसा कीजिए. हो सकता है घनी घास में छिपा यह दुर्लभ पक्षी दिखे न दिखे, लेकिन उसकी सुरीली आवाज आपको उसकी मौजूदगी का पक्का संकेत जरूर दे जाए.





















