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मांड गायकी की मूर्धन्य स्वर साधिका गवरी देवी 98 वर्ष की उम्र में चल बसीं, 'केसरिया बालम' ने दिलाई थी देशव्यापी ख्यातिराजस्थान
12 जून 2026, 8:45 pm (53 दिन पहले)· 1

मांड गायकी की मूर्धन्य स्वर साधिका गवरी देवी 98 वर्ष की उम्र में चल बसीं, 'केसरिया बालम' ने दिलाई थी देशव्यापी ख्याति

राजस्थान के लोकसंगीत को देश-दुनिया में पहचान दिलाने वाली विख्यात मांड गायिका गवरी देवी का 98 वर्ष की आयु में पाली स्थित निवास पर निधन हो गया। 'केसरिया बालम पधारो म्हारे देश' गीत से उन्हें देशभर में…

राजस्थान की लोकसंगीत परंपरा की धमक को देश और दुनिया तक ले जाने वाली नामचीन मांड गायिका गवरी देवी अब इस संसार में नहीं रहीं। 98 वर्ष की उम्र में उन्होंने गुरुवार रात तकरीबन 8 बजे पाली स्थित अपने घर पर अंतिम सांस ली। उनके जाने से राजस्थान के लोकसंगीत संसार में गहरे शोक का माहौल है। आज सुबह 11 बजे सर्वोदय नगर के मोक्षधाम में उनका अंतिम संस्कार होगा। अपने पीछे वे लोकसंगीत की ऐसी थाती छोड़ गई हैं, जो आने वाली कई पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बनी रहेगी।

राजस्थान की मांड गायकी के सबसे आदरणीय और चहेते कलाकारों में गवरी देवी का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता रहा है। अपनी मधुर आवाज और लोकधुनों के सहारे उन्होंने करीब आठ दशक तक प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को नई बुलंदियों तक पहुंचाया। उनकी गायकी में मरुधरा की माटी की सुगंध, लोकजीवन के भाव और राजस्थानी संस्कृति की रूह स्पष्ट रूप से सुनाई देती थी। उनकी इस विरासत को अब उनकी बहू सुंदरदेवी तथा पोतियां गंगा और नीतू आगे ले जा रही हैं।

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'केसरिया बालम पधारो म्हारे देश' से मिली शोहरत

राजस्थान के बाड़मेर जिले के कोरण गांव में एक लोक कलाकार परिवार में जन्मीं गवरी देवी ने सबसे लोकप्रिय लोकगीतों में गिने जाने वाले 'केसरिया बालम पधारो म्हारे देश' को अपने स्वर देकर देशभर में खास मुकाम हासिल किया। इसके साथ ही उन्होंने अनेक पारंपरिक मांड गीतों को अपनी आवाज दी, जो आज भी लोकसंगीत के रसिकों के बीच बेहद चहेते बने हुए हैं। उनकी प्रस्तुतियों का दायरा केवल राजस्थान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देश के अलग-अलग सांस्कृतिक मंचों पर भी उन्होंने अपनी कला से समां बांधा। संगीत की शुरुआती तालीम उन्हें अपने माता-पिता से ही मिली थी।

कई सम्मानों से अलंकृत हुईं गवरी देवी

विवाह के बाद पाली को अपनी कर्मभूमि बनाने वाली गवरी देवी ने उस दौर में लोकसंगीत को आगे बढ़ाया, जब आधुनिक संगीत का प्रभाव तेजी से फैल रहा था। इसके बावजूद उन्होंने पारंपरिक मांड गायकी की मूल आत्मा को सहेजे रखा और नई पीढ़ी को इससे जोड़ने का काम किया। अपने पति मिश्रीलाल राव के साथ उन्होंने देशभर में यादगार प्रस्तुतियां दीं। उनकी गायकी में शास्त्रीयता और लोकभाव का जो अनूठा मेल दिखता था, उसी ने उन्हें विशिष्ट पहचान दिलाई। लोकसंगीत के क्षेत्र में उनके बहुमूल्य योगदान को देखते हुए उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किए गए। उन्हें लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड समेत अनेक पुरस्कार और सम्मान मिले। ये सम्मान केवल उनकी गायकी के लिए नहीं थे, बल्कि राजस्थानी लोकसंस्कृति के संरक्षण और संवर्धन में उनके योगदान की भी पहचान थे।

समृद्ध विरासत छोड़ गईं स्वर साधिका

लगभग एक सदी का जीवन जीने वाली गवरी देवी ने अपने सुदीर्घ कलात्मक सफर में असंख्य श्रोताओं के हृदय में अपनी जगह बनाई। उनकी आवाज में राजस्थान की लोक परंपराओं की गूंज समाई रहती थी। उनके निधन से लोकसंगीत जगत ने एक ऐसी स्वर साधिका को खो दिया है, जिसकी कमी पूरी कर पाना सहज नहीं होगा। भले ही गवरी देवी आज हमारे बीच न हों, लेकिन उनके गीत, उनकी आवाज और लोकसंगीत के प्रति उनका समर्पण सदा जीवित रहेगा। राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत में उनका नाम हमेशा आदर और गर्व के साथ याद किया जाता रहेगा। वे अपने पीछे पांच पुत्रों समेत एक पुत्री और भरा-पूरा परिवार छोड़ गई हैं।

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