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समुद्री सुरक्षा को बड़ा बूस्ट देने की तैयारी, भारत और जर्मनी के बीच ₹90,000 करोड़ की पनडुब्बी डील पर जल्द लग सकती है मुहरभारत
4 अग॰ 2026, 8:27 am (3 घंटे पहले)· 2

समुद्री सुरक्षा को बड़ा बूस्ट देने की तैयारी, भारत और जर्मनी के बीच ₹90,000 करोड़ की पनडुब्बी डील पर जल्द लग सकती है मुहर

भारत और जर्मनी के बीच लगभग ₹90,000 करोड़ की लागत से छह अत्याधुनिक पनडुब्बियां खरीदने का समझौता होने की उम्मीद है। प्रोजेक्ट-75I के तहत इन पनडुब्बियों में एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा।

नई दिल्ली में रक्षा गलियारों से लेकर रणनीतिक हलकों तक इस बात की चर्चा जोरों पर है कि भारत एक ऐसी पनडुब्बी हासिल करने जा रहा है जिसे पानी के भीतर का खामोश शिकारी कहा जा सकता है। आधुनिक समय में किसी भी राष्ट्र की सैन्य ताकत केवल जमीन या आसमान तक सीमित नहीं है, बल्कि समंदर की गहराई में उसकी मौजूदगी ही असली शक्ति तय करती है। भारतीय नौसेना को पिछले कुछ महीनों में कई ऐसी पनडुब्बियां मिली हैं जो देश की समुद्री सीमाओं की रक्षा करने में सक्षम हैं। अब इसी कड़ी में एक बहुत बड़ा रक्षा सौदा होने जा रहा है, जो समंदर में भारत की मारक क्षमता को कई गुना बढ़ा देगा। इस नई पनडुब्बी की खासियत यह है कि यह बिना सतह पर आए हफ्तों तक पानी के अंदर छिपी रह सकती है और दुश्मन को इसकी भनक तक नहीं लगेगी। ठीक वैसे ही जैसे कोई शिकारी अपने शिकार पर चुपचाप नजर गड़ाए बैठा रहता है और सही समय आते ही हमला कर देता है। यह पूरी चर्चा भारत और जर्मनी के बीच प्रस्तावित उस ऐतिहासिक समझौते को लेकर है जिसके तहत देश को अत्याधुनिक पनडुब्बियां मिलने वाली हैं।

प्रोजेक्ट-75I और पनडुब्बियों की खासियत

इस पूरे रक्षा सौदे की सबसे बड़ी हाइलाइट केवल इसकी भारी-भरकम कीमत या छह नई पनडुब्बियों की संख्या नहीं है, बल्कि इसके पीछे की तकनीक है। इस डील का सबसे अहम पहलू वह क्षमता है जिसके बल पर ये पनडुब्बियां समुद्र के भीतर लंबे समय तक बिना बाहर आए अपने ऑपरेशन को अंजाम दे सकती हैं। आधुनिक नौसैनिक युद्धनीति में यह खूबी किसी भी युद्धपोत या पनडुब्बी को सबसे खतरनाक और असरदार हथियार बनाती है।

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जुलाई 30 को भारत में जर्मनी के राजदूत फिलिप एकरमैन ने यह भरोसा जताया कि बहुप्रतीक्षित प्रोजेक्ट-75I पर अगस्त के महीने में औपचारिक समझौता हो सकता है। लगभग 8 अरब यूरो यानी करीब ₹90,000 करोड़ की लागत वाली इस विशाल परियोजना में भारत की तरफ से मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड और जर्मनी की तरफ से थाइसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स प्रमुख साझेदार के तौर पर काम करेंगी।

मेक इन इंडिया के तहत देश में होगा निर्माण

इस योजना के तहत तय किया गया है कि इन सभी पनडुब्बियों का निर्माण भारत के भीतर ही किया जाएगा। जानकारों का मानना है कि इनका ढांचा थाइसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स की टाइप-214 श्रेणी की आधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों के डिजाइन पर आधारित होगा। इन पनडुब्बियों को दुनिया भर में सबसे शांत और सबसे लंबी अवधि तक पानी के भीतर रहने वाली पारंपरिक पनडुब्बियों में शुमार किया जाता है। हालांकि, अभी तक इस सौदे पर अंतिम हस्ताक्षर होना बाकी है। इस अनुबंध की सटीक कीमत, पनडुब्बियों का फाइनल कॉन्फ़िगरेशन और भारत को मिलने वाले टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का दायरा तभी पूरी तरह साफ होगा जब ऑफिशियल कॉन्ट्रैक्ट पर मुहर लगाई जाएगी।

वैसे इस प्रोजेक्ट की समयसीमा को लेकर पहले भी कई बार फेरबदल हो चुके हैं। इसी साल मार्च के महीने में जर्मन राजदूत ने छह से आठ हफ्तों के भीतर इस समझौते के होने की उम्मीद जताई थी। वहीं अप्रैल के दौरान जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने तीन महीने के भीतर इस डील के फाइनल होने की संभावना जताई थी। अब अगस्त की नई समयसीमा यह जरूर बताती है कि दोनों देशों के बीच बातचीत अंतिम और निर्णायक दौर में प्रवेश कर चुकी है, लेकिन जब तक कागजों पर हस्ताक्षर नहीं हो जाते, तब तक इसे पूर्ण रूप से अंतिम नहीं माना जा सकता।

स्नोर्कल से जुड़ी तकनीकी चुनौतियां

एक सामान्य डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बी जब बैटरी पावर पर चलती है तो वह बेहद खामोश होती है और उसका पता लगाना कठिन होता है। इसकी मुख्य कमजोरी तब सामने आती है जब उन बैटरियों को फिर से चार्ज करने की आवश्यकता होती है। ऐसी स्थिति में पनडुब्बी को कम गहराई या पेरिस्कोप की गहराई तक ऊपर आना पड़ता है, पानी के ऊपर स्नोर्कल फैलाना होता है और वायुमंडलीय ऑक्सीजन का उपयोग करके अपने डीजल इंजन चालू करने पड़ते हैं। हालांकि इसे पूरी तरह से समुद्र की सतह पर आने की जरूरत नहीं होती, लेकिन सतह के इतने करीब आना और मास्ट को बाहर दिखाना दुश्मन के रडार पर आने का खतरा बढ़ा देता है। डीजल इंजन, उसका धुआं और स्नोर्कलिंग मास्ट कई तरह के अकूस्टिक, थर्मल, रडार या विजुअल सिग्नेचर छोड़ सकते हैं।

एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन तकनीक का महत्व

एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी एआईपी सिस्टम इन्हीं जोखिम भरे चार्जिंग पीरियड के बीच के फासले को बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। यह तकनीक बाहर की हवा से ऑक्सीजन लिए बिना ही बिजली का उत्पादन करती है। थाइसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स के मामले में, फ्यूल सेल स्टोर किए गए रिएक्टेंट्स का इलेक्ट्रोकेमिकल तरीके से इस्तेमाल करके बिजली बनाते हैं। इसकी मदद से पनडुब्बी पूरी तरह से पानी के अंदर डूबी रहने के दौरान भी अपनी बैटरी को रिचार्ज या सुरक्षित रख सकती है। थाइसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स का दावा है कि उनका लेटेस्ट टाइप 214 डिजाइन फ्यूल-सेल एआईपी को बेहद कम अकूस्टिक सिग्नेचर के साथ जोड़ता है, जिससे यह बिना किसी की नजर में आए हफ्तों तक पानी के भीतर ऑपरेशन को सपोर्ट कर सकता है। हालांकि किसी भी भारतीय पनडुब्बी की वास्तविक सहनशक्ति उसके अंतिम आकार, कॉन्फ़िगरेशन, गति और मिशन की रूपरेखा पर निर्भर करेगी।

यह समझना भी जरूरी है कि एआईपी किसी पारंपरिक पनडुब्बी को परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बी में नहीं बदल देता है। यह तकनीक मुख्य रूप से शांत और कम गति वाली गश्त के लिए सबसे ज्यादा उपयुक्त होती है। अगर पनडुब्बी बहुत तेज गति से आगे बढ़ेगी तो उसकी ऊर्जा भी तेजी से खर्च होगी, जबकि एक परमाणु पनडुब्बी लंबी अवधि तक उच्च गति बनाए रख सकती है और ज्यादा समय तक तैनात रह सकती है। इसके बावजूद, ऐसे जलक्षेत्रों में जहां किसी पनडुब्बी को चुपचाप अपने लक्ष्य का इंतजार करना हो या किसी महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग की रक्षा करनी हो, पानी के भीतर रहने की क्षमता सामरिक रूप से बेहद निर्णायक साबित हो सकती है।

घरेलू स्तर पर भी चल रहा है काम

भारतीय रक्षा मंत्रालय ने जुलाई 2021 में एक प्रमाणित फ्यूल-सेल एआईपी सिस्टम से लैस छह पारंपरिक पनडुब्बियों के लिए प्रोजेक्ट-75I का रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी किया था। इस पूरे प्रोजेक्ट को एक भारतीय शिपयार्ड को किसी विदेशी प्रौद्योगिकी साझेदार के साथ जोड़ने के लिए रणनीतिक साझेदारी मॉडल के तहत रखा गया था। जब विश्लेषकों ने इस प्रतियोगिता की स्थिति की जांच की, तो उस समय भारत के पास मौजूद 17 पारंपरिक पनडुब्बियों में से किसी में भी एआईपी तकनीक नहीं थी। इसके बाद से भारत ने आईएनएस वाग्शीर को अपने बेड़े में शामिल किया है, जो मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड द्वारा पहले के प्रोजेक्ट-75 के तहत तैयार की गई छठी और अंतिम कलवरी-क्लास पनडुब्बी है।

वे कलवरी-क्लास पनडुब्बियां एआईपी के बिना ही डिलीवर की गई थीं, लेकिन देश उनके लिए एक अलग स्वदेशी समाधान पर भी काम कर रहा है। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन यानी डीआरडीओ एक घरेलू फ्यूल-सेल एआईपी सिस्टम विकसित कर रहा है जिसे भविष्य में पनडुब्बी के रिफिट के दौरान एक अतिरिक्त हल सेक्शन के जरिए उसके भीतर फिट किया जाना है। डीआरडीओ के नवीनतम प्रोजेक्ट अपडेट्स से यह संकेत मिलता है कि इस दिशा में भी स्वदेशी प्रयास तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

सवाल-जवाब

भारत और जर्मनी के बीच किस रक्षा प्रोजेक्ट पर समझौता होने की उम्मीद है?
भारत और जर्मनी के बीच प्रोजेक्ट-75I के तहत पनडुब्बी सौदे पर समझौता होने की उम्मीद है।
इस रक्षा सौदे की कुल अनुमानित लागत कितनी है?
इस पूरी परियोजना की अनुमानित लागत करीब 8 अरब यूरो यानी लगभग ₹90,000 करोड़ है।
इस डील में कौन सी कंपनियां साझेदार होंगी?
इस प्रोजेक्ट में भारत की मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड और जर्मनी की थाइसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स साझेदार होंगी।
पनडुब्बियों का निर्माण कहां किया जाएगा?
योजना के तहत सभी पनडुब्बियों का निर्माण भारत के भीतर ही किया जाएगा।
एआईपी तकनीक का क्या काम है?
एआईपी तकनीक पनडुब्बी को सतह पर आए बिना लंबे समय तक पानी के नीचे रहने और बैटरी चार्ज करने में मदद करती है।
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