राजस्थान के कोटा शहर में किशोर सागर तालाब के किनारे बनी ऐतिहासिक बारहद्वारी वर्तमान समय में स्थानीय लोगों, युवाओं और पर्यटकों की चहल-पहल से गुलजार रहने वाला एक प्रमुख केंद्र बन चुकी है। बारह खंभों पर टिका यह सुंदर मंडप किसी दौर में रियासत के शाही परिवार के लिए शांत माहौल में सुकून पाने, ठंडी हवा का लुत्फ उठाने और डूबते सूरज की लाली देखने के मकसद से तैयार कराया गया था। आज यही राजपूताना वास्तुकला की निशानी शहर की नई पीढ़ी के बीच बेहद लोकप्रिय हो चुकी है। चारों ओर फैले किशोर सागर तालाब का पानी, जलराशि के मध्य खड़ा जगमंदिर, आसपास लहलहाते हरे-भरे पेड़ और इस प्राचीन छतरी का सुरम्य वातावरण ढलती शाम के वक्त बड़ी तादाद में लोगों को अपनी ओर खींच लाता है।
मेवाड़ और हाड़ौती के रिश्तों से जुड़ी निर्माण की कहानी
पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के विशेषज्ञ मुकेश कुमार ने इस धरोहर की पृष्ठभूमि साझा करते हुए बताया कि किशोर सागर तालाब की इस बारहद्वारी और पानी के बीच बने जगमंदिर का निर्माण लगभग 1745 के दौरान कराया गया था। इस स्थल का संबंध कोटा और मेवाड़ रियासतों के बीच बने ऐतिहासिक वैवाहिक रिश्तों से जुड़ा हुआ है। जब कोटा के तत्कालीन महाराव का विवाह मेवाड़ यानी उदयपुर की राजकुमारी ब्रज कंवर के साथ संपन्न हुआ, तब नई महारानी ने अपने पीहर उदयपुर के मशहूर जलमहलों और खूबसूरत झीलों जैसा दृश्य कोटा में भी देखने की इच्छा जाहिर की थी। महारानी ब्रज कंवर के मन की इस बात का मान रखते हुए कोटा के महाराव ने किशोर सागर तालाब के बिल्कुल बीचों-बीच भव्य जगमंदिर महल बनवाया और तालाब की पाल पर बारह खंभों वाली नक्काशीदार बारहद्वारी का निर्माण करवाया।
शाही आयोजनों से धार्मिक अनुष्ठानों तक का गवाह
राजशाही के दौर में बारहद्वारी और जलमहल का पूरा परिसर राजपरिवार के आमोद-प्रमोद और शाही पिकनिक का सबसे खास ठिकाना माना जाता था। उस जमाने में दिवाली, दशहरा और गणगौर जैसे पारंपरिक पर्वों के साथ-साथ बाद के दशकों में स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे बड़े राष्ट्रीय अवसरों पर भी यहां विशेष प्रबंध किए जाते थे। राजघराने के लोगों के लिए झूले लगाए जाते थे और कई तरह की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां आयोजित होती थीं। इसके अलावा साधु-संतों और धार्मिक विद्वानों की अगुवाई में इस पाल पर विशाल धार्मिक अनुष्ठान और पवित्र हवन भी विधि-विधान से संपन्न कराए जाते थे। बदलते वक्त के साथ इस पूरे परिसर के उपयोग और सामाजिक स्वरूप में भी कई दिलचस्प बदलाव दर्ज किए गए।
विसर्जन स्थल से आधुनिक फोटोशूट का नया ठिकाना
वर्ष 1989 से पहले तक कोटा शहर में मनाए जाने वाले गणेश उत्सव और दुर्गा पूजा के दौरान प्रतिमाओं का विसर्जन मुख्य रूप से चंबल नदी के तट पर हुआ करता था। बाद में सुरक्षा के बेहतर इंतजामों और धार्मिक शोभायात्राओं की आवाजाही को सुगम बनाने के उद्देश्य से वर्ष 1989 के बाद प्रतिमा विसर्जन की व्यवस्था चंबल तट से बदलकर किशोर सागर तालाब की पाल और बारहद्वारी के समीप कर दी गई। इसके अलावा आज के दौर में यह स्थल शाम की सैर करने वालों, प्री-वेडिंग शूट कराने वाले जोड़ों और सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा करने के शौकीन युवाओं की पहली पसंद में तब्दील हो चुका है। कोटा के आधुनिक इलाकों में कई नए निर्माण हुए हैं, लेकिन ऐतिहासिक शहर की इस बारहद्वारी जैसी कुदरती शांति और सौंदर्य दूसरी जगह तलाश पाना मुश्किल है।
धरोहर को सहेजने में जुटा स्थानीय प्रशासन
पुरातत्व विभाग स्थानीय प्रशासनिक तंत्र और कोटा विकास प्राधिकरण (KDA) के साथ मिलकर इस 280 साल पुरानी राजपूताना संरचना के मूल स्वरूप को सुरक्षित रखने और संवारने के काम में लगातार जुटा हुआ है। जलाशय के जल को छूकर आने वाले ठंडे झोंके और चारों तरफ फैली हरियाली शाम के समय यहां आने वाले लोगों को दिनभर की भागदौड़ के बाद अनोखा सुकून देती है। सदियों पुराना इतिहास समेटे यह विरासत वर्तमान में युवा पीढ़ी के लिए अतीत की संस्कृति को समझने और फुर्सत के पल बिताने का सबसे खूबसूरत जरिया बन चुकी है।



















