राजा हो या साधु, देवता हों या इतिहास का कोई पात्र, कुछ ही पल में भेष बदल लेने वाला एक कलाकार कभी राजस्थान के हर मेले और गांव के जलसे की जान हुआ करता था. आज उसी बहुरुपिया कलाकार को दर्शक ढूंढने पड़ रहे हैं, क्योंकि मोबाइल और डिजिटल दुनिया ने लोगों का मनोरंजन करने का ढंग ही बदल डाला है.
भेष बदलकर किरदार में उतरने की कला
राजस्थान की चुनिंदा लोक परंपराओं में बहुरुपिया कला को खास दर्जा हासिल है, और इसी वजह से राज्य की पहचान बाकी देश से अलग बनती है. संवाद, हाव-भाव और अभिनय के दम पर बहुरुपिया कलाकार अलग-अलग रूप धरकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध करते आए हैं. एक जमाने में गांवों और शहरी गलियों में यही मनोरंजन का सबसे बड़ा सहारा था.
भरतपुर से सटे ब्रज इलाके में इस कला की जड़ें खासी गहरी रही हैं. गांव-गांव के मेलों, धार्मिक जलसों और सामूहिक कार्यक्रमों में बहुरुपियों की मौजूदगी उस आयोजन की सबसे बड़ी रौनक मानी जाती थी. कोई कलाकार एक दिन राजा-महाराजा बनता तो दूसरे दिन साधु का चोला ओढ़ लेता, कभी देवी-देवता का स्वरूप धरता तो कभी इतिहास के किसी नायक में ढल जाता. जो भी रूप हो, उसका असर इतना गहरा होता कि तमाशबीनों की भीड़ अपने आप जुट जाती.
साधन कम, हुनर ज्यादा
बहुरुपिया कलाकारों की असली पहचान न वेशभूषा थी, न मेकअप, बल्कि यह था कि वे किरदार को कितनी शिद्दत से जी लेते थे. मुट्ठी भर साधनों के बल पर भी ये फनकार घंटों तक तमाशबीनों को बांधे रख सकते थे. इसी हुनर ने बहुरुपिया कला को राज्य की समृद्ध लोक विरासत में शुमार करा दिया.
अब स्क्रीन में सिमटा मनोरंजन
वक्त बदलने के साथ मनोरंजन का पूरा ढांचा ही पलट गया है. मोबाइल, इंटरनेट, सोशल मीडिया और टीवी जैसे डिजिटल माध्यमों ने लोगों की पसंद और आदतें दोनों बदल दी हैं. पहले दर्शक खुद कलाकार तक पहुंचते थे, आज मनोरंजन उंगलियों के इशारे पर स्क्रीन में सिमट आया है, इसलिए घर से निकलने की जरूरत ही कम पड़ती है.
इसका सबसे बड़ा खामियाजा बहुरुपिया कलाकारों की कमाई और उनकी कला की साख, दोनों को उठाना पड़ा है. इस कला को बचाने के लिए आज भी चंद कलाकार भेष बदलकर गांव-कस्बों में निकलते हैं, लेकिन तालियां अब पहले जितनी नहीं बजतीं और सम्मान भी पुराने दौर जैसा नहीं रहा. युवा पीढ़ी का रुझान भी इस कला की तरफ लगातार कम होता जा रहा है, जिससे इसे आगे बढ़ाने वालों की तादाद घट रही है.
विरासत मानकर बचाने की दरकार
अब वक्त आ गया है कि बहुरुपिया जैसी कलाओं को महज तमाशा नहीं बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर मानकर इन्हें बचाने के ठोस इंतजाम किए जाएं. कलाकारों को प्रदर्शन का उचित मंच, आर्थिक मदद और नए मौके दिए जाएं, ताकि आने वाली नस्लें भी इस फन को पहचान सकें. ऐसा नहीं हुआ तो सदियों पुरानी यह कला डिजिटल दौर के शोर में हमेशा के लिए दब सकती है.



















