कारगिल विजय दिवस का पावन अवसर केवल 1999 के ऐतिहासिक युद्ध में मिली जीत का जश्न मनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के उन वीर परिवारों के प्रति सम्मान प्रकट करने का भी दिन है जिन्होंने राष्ट्र की रक्षा को ही अपना परम धर्म मान लिया है। नागौर जिले के अंतर्गत आने वाली डेह तहसील के नोसरिया गांव का चाम्पावत परिवार एक ऐसी ही अद्भुत और अनुकरणीय मिसाल पेश करता है। इस गौरवशाली परिवार की लगातार चार पीढ़ियों ने भारतीय सेना का हिस्सा बनकर देश की सीमाओं की रखवाली की है। प्रथम विश्व युद्ध के मैदानों से लेकर कारगिल की दुर्गम चोटियों तक, इस परिवार की वीरता और राष्ट्रभक्ति भारत के सैन्य इतिहास का एक अटूट हिस्सा बन चुकी है।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान रखी गई थी देशभक्ति की मजबूत नींव
चाम्पावत परिवार का भारतीय सेना के साथ जुड़ाव भारत की आजादी से काफी पहले का है। इस देशभक्ति की परंपरा की शुरुआत पहली पीढ़ी के सदस्य लालसिंह ने की थी। उन्होंने साल 1914 से लेकर 1918 तक चले प्रथम विश्व युद्ध के दौरान राजपूत राइफल्स में बतौर हवलदार अपनी सेवाएं दी थीं। उस ऐतिहासिक कालखंड में लालसिंह ने भारत-जर्मन मोर्चे पर तैनात रहकर बेहद कठिन परिस्थितियों में अपने कर्तव्यों का पालन किया और अपनी बहादुरी का परिचय दिया। उस दौर में सेना में भर्ती होना महज एक नौकरी पाना नहीं था, बल्कि देश के प्रति पूर्ण समर्पण का मार्ग था, और लालसिंह ने अपनी निष्ठा से आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहद मजबूत मार्गदर्शक का काम किया।
द्वितीय विश्व युद्ध और स्वतंत्रता के बाद मिला सम्मान
इस समृद्ध सैन्य विरासत को आगे बढ़ाते हुए लालसिंह के बेटे जसवंत सिंह ने दूसरी पीढ़ी के रूप में सेना का रुख किया। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीय सेना में शामिल होकर अदम्य साहस और युद्ध कौशल का प्रदर्शन किया। सैन्य क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें साल 1939, 1945 और 1947 से संबंधित विभिन्न सैन्य पदकों से अलंकृत किया गया। स्वतंत्रता दिवस के विशेष अवसर पर भारत सरकार ने भी उनकी विशिष्ट सेवाओं का सम्मान किया था। जसवंत सिंह का निधन 7 जून 2018 को 96 वर्ष की लंबी आयु में हुआ, लेकिन उनके द्वारा अर्जित किए गए पदक और उपलब्धियां आज भी चाम्पावत परिवार की सबसे अनमोल धरोहर के रूप में सहेज कर रखी गई हैं।
कारगिल की दुर्गम पहाड़ियों पर तीसरी पीढ़ी का पराक्रम
देश सेवा का यह अटूट सिलसिला जब तीसरी पीढ़ी तक पहुंचा, तो हवलदार हुकम सिंह ने इस मशाल को थाम लिया। साल 1999 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध छिड़ा, तब हुकम सिंह ने इस संघर्ष में सक्रिय रूप से भाग लेकर अपने पूर्वजों की विरासत को गौरवान्वित किया। बेहद दुर्गम पहाड़ियों, हाड़ कँपा देने वाली ठंड और विपरीत परिस्थितियों के बीच उन्होंने अपनी मातृभूमि की सुरक्षा का दायित्व बखूबी निभाया। भारतीय सेना के अन्य जांबाज जवानों के साथ मिलकर उन्होंने कारगिल युद्ध में दुश्मनों का सामना किया और परिवार की युद्ध परंपरा को एक नया शिखर दिया।
बदलते समय के साथ चौथी पीढ़ी ने संभाली प्रशासनिक कमान
समय के साथ युद्ध के तरीके बदल गए और सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां भी बदल गईं, लेकिन देश की सेवा करने का चाम्पावत परिवार का दृढ़ संकल्प तनिक भी नहीं डगमगाया। इसी परंपरा को चौथी पीढ़ी के सदस्य राजू सिंह आगे बढ़ा रहे हैं, जो साल 2011 में भारतीय सेना का हिस्सा बने। वर्तमान में राजू सिंह हवलदार क्लर्क के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। सेना के प्रशासनिक और कार्यालयी कामकाज को संभालते हुए भी वे देश की रक्षा प्रणाली के एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में अपना योगदान दे रहे हैं।
अनुशासन और देशप्रेम से सराबोर पारिवारिक माहौल
इस परिवार के लिए सेना की वर्दी धारण करना केवल एक पेशा या आजीविका का साधन नहीं है, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक पवित्र जिम्मेदारी है। हवलदार हुकम सिंह के अनुसार, उनके घर में बचपन से ही देशभक्ति और कठोर अनुशासन का वातावरण रहा है। घर के बुजुर्गों से सेना के पराक्रम की सच्ची कहानियां सुनते हुए ही नई पीढ़ी के बच्चों का पालन-पोषण हुआ, जिससे उनके मन में भी सेना के प्रति गहरी श्रद्धा और सेवा का भाव पैदा हुआ। पूरे परिवार का यही अटूट विश्वास है कि मातृभूमि की सेवा से बढ़कर दुनिया में कोई दूसरा धर्म नहीं है, और यही संस्कार वे अपनी आने वाली पीढ़ियों को सौंप रहे हैं।



















