अमिताभ बच्चन की पोती आराध्या बच्चन से संबंधित एक मामले में सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने डिजिटल युग में पारिवारिक प्रतिष्ठा और बौद्धिक संपदा कानून से जुड़े कई गंभीर कानूनी प्रश्नों को रेखांकित किया है। अदालत ने इस विषय पर विस्तृत विचार-विमर्श की आवश्यकता पर बल देते हुए सवाल उठाया कि किसी प्रतिष्ठित परिवार का नाम और उसकी सामाजिक साख आखिर कितनी पीढ़ियों तक आगे बढ़ सकती है। इसके साथ ही इंटरनेट के माध्यम से फैलाई जाने वाली भ्रामक और फर्जी सामग्रियों को बौद्धिक संपदा अधिकारों के उल्लंघन के दायरे में लाने की संभावनाओं पर भी कानूनी मंथन शुरू हो गया है।
ट्रेडमार्क गुडविल और व्यक्तिगत साख के बीच अंतर पर कोर्ट का विचार
अदालत की कार्यवाही के दौरान जस्टिस अनुप जयराम भंभानी ने ट्रेडमार्क से मिलने वाले व्यावसायिक लाभ और किसी व्यक्ति या उसके परिवार के नाम से जुड़ी सामाजिक प्रतिष्ठा के बीच के मूलभूत अंतर को स्पष्ट किया। उन्होंने उल्लेख किया कि किसी भी ट्रेडमार्क का मूल्य और उसकी बाजार में साख आमतौर पर किसी विशिष्ट उत्पाद, ब्रांड या व्यावसायिक सेवा से जुड़ी होती है। इसके विपरीत, किसी व्यक्ति के उपनाम की सामाजिक स्वीकार्यता और सम्मान उसकी निजी उपलब्धियों, कार्यक्षेत्र में योगदान तथा लंबे समय में अर्जित पहचान से बनता है।
इसी संदर्भ में अदालत ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण वैधानिक पहलू को सामने रखा। कोर्ट ने पूछा कि यदि किसी बहुचर्चित उपनाम की प्रतिष्ठा को ट्रेडमार्क की तर्ज पर एक कानूनी गुडविल का रूप मान भी लिया जाए, तो क्या यह साख एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्वाभाविक रूप से हस्तांतरित हो सकती है। यदि यह हस्तांतरण होता भी है, तो कानून के तहत इसकी सीमा क्या निर्धारित की जानी चाहिए। यह प्रश्न इस संपूर्ण मामले की भावी दिशा तय करने वाला मुख्य आधार बन गया है।
हाईकोर्ट द्वारा तय किए गए तीन प्रमुख कानूनी बिंदु
मामले की व्यापकता और डिजिटल क्षेत्र में आ रही नई चुनौतियों को देखते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने विचार के लिए तीन मुख्य सवाल निर्धारित किए हैं।
- पहला सवाल: यदि किसी परिवार के प्रतिष्ठित नाम और उसकी गुडविल को ट्रेडमार्क के समान संरक्षण दिया जाता है, तो कानून की नजर में ऐसी प्रतिष्ठा का अस्तित्व कितनी पीढ़ियों तक बना रह सकता है?
- दूसरा सवाल: यदि इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फैलाई गई कोई फर्जी खबर अत्यंत आपत्तिजनक, हानिकारक या किसी व्यक्ति की छवि को नुकसान पहुंचाने वाली हो, तो क्या उसे बौद्धिक संपदा यानी IP अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन माना जाना चाहिए? यदि हां, तो यह उल्लंघन किस विशिष्ट श्रेणी के अंतर्गत वर्गीकृत होगा?
- तीसरा सवाल: क्या किसी व्यक्ति की मानहानि या उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को पहुंचाए गए नुकसान की अवधारणा को बौद्धिक संपदा अधिकारों के स्थापित सिद्धांतों और कानूनी प्रावधानों के साथ जोड़ा जा सकता है?
अदालत ने स्पष्ट किया है कि ये प्रश्न केवल प्राथमिक विचार के रूप में सामने आए हैं और आगामी कार्यवाहियों में इनसे जुड़े अन्य कानूनी पहलुओं को भी शामिल किया जा सकता है।
साल 2023 में दायर मुकदमे की पृष्ठभूमि और भ्रामक सामग्रियां
यह पूरा कानूनी मामला वर्ष 2023 में उस समय शुरू हुआ था जब आराध्या बच्चन ने अपने पिता अभिषेक बच्चन के माध्यम से दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल की थी। इस याचिका में कई यूट्यूब चैनलों और इंटरनेट पर सक्रिय अज्ञात संस्थाओं के खिलाफ कड़े कदम उठाने की गुहार लगाई गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि डिजिटल माध्यमों पर ऐसी आपत्तिजनक सामग्रियां साझा की जा रही हैं जो बच्चन परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा को सीधे तौर पर आघात पहुंचाती हैं।
ऑनलाइन अपलोड किए गए विभिन्न वीडियोज में आराध्या के स्वास्थ्य को लेकर गंभीर और पूरी तरह से बेबुनियाद दावे किए जा रहे थे। कुछ वीडियोज में उनके गंभीर रूप से बीमार होने और अस्पताल में भर्ती होने की झूठी कहानियां गढ़ी गई थीं, जबकि एक वीडियो में तो उनकी मृत्यु तक की मनगढंत खबर प्रसारित कर दी गई थी। इस तरह की गैर-जिम्मेदाराना सामग्रियों से न केवल एक बच्चे की निजता प्रभावित हो रही थी, बल्कि परिवार की सामाजिक स्थिति पर भी गलत असर पड़ रहा था।
अंतरिम राहत और पर्सनालिटी राइट्स का विस्तृत होता दायरा
मामले की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने अप्रैल 2023 में एक अंतरिम आदेश जारी किया था। उस समय कोर्ट ने आराध्या के पक्ष में राहत देते हुए संबंधित डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को उनके स्वास्थ्य से जुड़ी किसी भी प्रकार की भ्रामक या फर्जी सामग्री के प्रकाशन और प्रसारण पर तत्काल रोक लगा दी थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा था कि बच्चों की गरिमा, सम्मान और उनके स्वास्थ्य से जुड़े अधिकारों का संरक्षण करना बेहद आवश्यक है।
हालाँकि, वर्तमान सुनवाई में यह मामला सिर्फ स्वास्थ्य संबंधी फर्जी खबरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें व्यक्तित्व अधिकार यानी पर्सनालिटी राइट्स, ट्रेडमार्क कानून और बौद्धिक संपदा कानून के जटिल संबंधों पर भी बहस छिड़ गई। जस्टिस भंभानी ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि पर्सनालिटी राइट्स की कानूनी व्याख्या समय के साथ लगातार फैलती जा रही है। उन्होंने टिप्पणी की कि व्यक्तित्व अधिकारों की अवधारणा अमीबा की तरह अपना आकार बदल रही है और यदि हर विषय को इसी अधिकार के तहत लाया जाएगा, तो इसकी स्पष्ट सीमाएं तय करना कठिन हो जाएगा।
बचपन और पारिवारिक विरासत की सुरक्षा पर वकीलों के तर्क
अदालत में बच्चन परिवार का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रवीण आनंद ने दलील दी कि किसी व्यक्ति या प्रतिष्ठित परिवार की साख की सुरक्षा को केवल पारंपरिक ट्रेडमार्क कानूनों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। उन्होंने कहा कि पासिंग ऑफ लॉ का दायरा ट्रेडमार्क से कहीं अधिक व्यापक है और बिना अनुमति के किसी नाम, तस्वीर या पहचान का दुरुपयोग करके साख को नुकसान पहुंचाने से रोका जाना चाहिए।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कोर्ट को अवगत कराया कि बच्चन परिवार के सदस्यों की तस्वीरों और नाम का इस्तेमाल करके झूठे दावे तैयार किए गए, जिससे पूरे परिवार की प्रतिष्ठा धूमिल हुई है। इस मामले में अभिषेक बच्चन भी एक पक्षकार के रूप में शामिल हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस बहुचर्चित मामले में आगे की कानूनी तर्कों की सुनवाई के लिए 15 सितंबर की तारीख तय की है।



















