मौसम में होने वाले बदलाव के कारण मवेशियों की सेहत पर विपरीत प्रभाव पड़ना आम बात है, लेकिन इन दिनों नागौर के पशुपालकों के लिए गाय और भैंसों की आंख से जुड़ी बीमारियां बड़ी चिंता का विषय बनती जा रही हैं। तापमान और आद्रता में उतार-चढ़ाव के अलावा बैक्टीरियल व वायरल संक्रमण, धूल-मिट्टी तथा विभिन्न प्रकार की एलर्जी के चलते पशुओं में कीमोसिस की समस्या तेजी से उभर रही है। इस स्वास्थ्य स्थिति में आंख की बाहरी परत यानी कंजंक्टिवा में सूजन आ जाती है और ऊतकों के भीतर तरल पदार्थ एकत्र होने लगता है, जिससे प्रभावित हिस्सा फूला हुआ और कई बार जेली जैसा नजर आने लगता है।
यदि इस तकलीफ का समय रहते उचित उपचार न किया जाए, तो पशुओं को असहनीय दर्द सहना पड़ सकता है और उनका संक्रमण तथा दृष्टि से जुड़ा संकट काफी गहरा सकता है। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए पशु पालने वाले लोगों को शुरुआती संकेतों को भांपकर तुरंत किसी योग्य पशु चिकित्सक से संपर्क साधना चाहिए। मवेशियों में कीमोसिस पैदा होने के कई अलग-अलग कारण हो सकते हैं, जिनमें संक्रामक बोवाइन राइनोट्रेकाइटिस जैसे खतरनाक वायरल संक्रमण भी शामिल हैं, जो आंखों के भीतर तेज जलन और सूजन पैदा करते हैं। इसके अलावा मैदानों में चरते समय घास के तिनके चुभने या किसी नुकीली वस्तु के लगने से भी यह समस्या उत्पन्न हो सकती है।
खुले वातावरण में संक्रमण फैलने की मुख्य वजहें
खुले खेतों और मैदानों में उड़ने वाली धूल, परागकण, धुएं के गुबार तथा रासायनिक कीटनाशकों के सीधे संपर्क में आने से पशुओं की नाज़ुक आंखों में गंभीर जलन और एलर्जी की शिकायत हो जाती है। इसके अतिरिक्त थेलेजिया प्रजाति के परजीवी कृमि भी मवेशियों की आंखों को अपना शिकार बनाते हैं, जो मुख्य रूप से आंख की सतह, कंजंक्टिवा और आंसू की नलियों के आसपास सक्रिय रहते हैं। इन सूक्ष्म जीवों की मौजूदगी के कारण आंखों में लगातार सूजन बनी रहती है, पानी बहता रहता है और कॉर्निया पर घाव बनने का जोखिम भी काफी बढ़ जाता है। ऐसे जटिल मामलों में बिना किसी देरी के चिकित्सीय जांच और समुचित इलाज की आवश्यकता होती है।
इन प्रमुख लक्षणों से करें रोग की पहचान
पशु चिकित्सक विशाल प्रजापति ने इस बीमारी के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि कीमोसिस से पीड़ित पशु की आंखों में कई तरह के स्पष्ट बदलाव देखने को मिलते हैं। मवेशी की आंख की झिल्ली बुरी तरह सूजकर बाहर की ओर निकली हुई प्रतीत हो सकती है, जिससे लगातार पानी बहना, पीले रंग का गाढ़ा स्राव निकलना, आँखें लाल होना और बार-बार पलकें झपकाना इसके मुख्य लक्षण हैं। तेज धूप या अत्यधिक रोशनी के संपर्क में आने पर पशु अपनी आंखें बंद करने का प्रयास करता है और लगातार जारी रहने वाले दर्द व जलन के कारण वह काफी बेचैन भी रहने लगता है। यदि संक्रमण का दायरा बहुत बढ़ जाए तो पशु को बुखार तक आ सकता है, जबकि परजीवी कृमियों की स्थिति में कभी-कभी आंखों के भीतर छोटे कीड़े भी साफ दिखाई दे जाते हैं। आंखों में सफेद या धुंधलापन नजर आने पर या देखने में दिक्कत होने पर तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए।
बीमारी का इलाज और बचाव के जरूरी उपाय
कीमोसिस का संपूर्ण उपचार पूरी तरह से इसके वास्तविक कारणों और आंखों की तत्कालीन स्थिति पर निर्भर करता है, जिसका प्राथमिक उद्देश्य सूजन को कम करना, संक्रमण को मिटाना और दृष्टि को सुरक्षित रखना होता है। आंखों की साफ-सफाई के लिए केवल पशु चिकित्सक की सलाह के बाद ही स्टेराइल नॉर्मल सेलाइन या फिर उचित नेत्र शोधन घोल का उपयोग किया जाना चाहिए। जरूरत के हिसाब से डॉक्टर एंटीबायोटिक ड्रॉप्स या परजीवीरोधी दवाइयां लिख सकते हैं।
पशु चिकित्सक ने चेतावनी देते हुए स्पष्ट किया कि यदि मवेशी के कॉर्निया पर कोई घाव या अल्सर मौजूद है, तो कभी भी कॉर्टिकोस्टेरॉइड युक्त आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से घाव और अधिक गंभीर रूप ले सकता है। घरेलू नुस्खों के तहत बोरिक एसिड या किसी अन्य घोल से आंखें धोने के बजाय विशेषज्ञ की देखरेख में ही दवा डालें। अपने मन से पशु की आंख में कोई भी दवा डालना खतरनाक हो सकता है। बचाव के लिए पशुओं के रहने के स्थान को पूरी तरह साफ-सुथरा रखें, उन्हें धूल और धुएं से बचाएं तथा चराई के वक्त कांटेदार झाड़ियों से दूर रखें। समय पर इलाज कराने से मवेशी की आंखों को स्थायी नुकसान से बचाया जा सकता है।



















