ब्राजील के सियासी इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ते हुए अनुभवी वामपंथी राजनेता लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा ने राष्ट्रपति पद के कड़े चुनावी मुकाबले में जीत हासिल कर ली है। कांटे की टक्कर वाले रन-ऑफ में उन्होंने अपने दक्षिणपंथी प्रतिद्वंद्वी फ्लेवियो बोल्सोनारो को पछाड़कर देश की सत्ता पर चौथी बार अपनी दावेदारी पक्की की। लातिन अमेरिका के सबसे बड़े देश में यह परिणाम बेहद असामान्य माना जा रहा है, क्योंकि इस पूरे क्षेत्र में मौजूदा सरकारों के खिलाफ वोट डालने और रूढ़िवादी ताकतों को चुनने की लहर चल रही है। अर्जेंटीना, चिली और कोलंबिया जैसे प्रमुख राष्ट्रों की कमान पहले ही दक्षिणपंथी नेताओं के हाथों में जा चुकी है, लेकिन ब्राजील ने एक अलग रास्ता चुना है।
चुनौतियों भरा सफर और अप्रत्याशित चुनावी उलटफेर
इस ताजा जनादेश तक पहुंचने की राह लूला के लिए बिल्कुल भी आसान नहीं रही। चुनाव के पहले चरण में, जो 4 अक्टूबर को आयोजित हुआ था, फ्लेवियो बोल्सोनारो ने लूला पर बढ़त बना ली थी। उस समय राजनीतिक विश्लेषक मान रहे थे कि महज तीन सप्ताह के सीमित समय में इस अंतर को पाटना लगभग असंभव होगा। हालांकि, पहले दौर के झटके के तुरंत बाद लूला के चुनावी अभियान में जबरदस्त तेजी देखने को मिली। सड़कों पर उतरे विशाल जनप्रदर्शनों और सोशल मीडिया पर चलाए गए सघन अभियान ने उनके पक्ष में माहौल तैयार किया। वर्ष 1989 में पहली बार राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल होने वाले पूर्व मेटलवर्कर लूला दशकों से ब्राजील के वामपंथ का मुख्य चेहरा रहे हैं। उन्होंने जनवरी 2003 से दिसंबर 2010 तक दो कार्यकाल पूरे किए थे और फिर जनवरी 2023 में दोबारा सत्ता संभाली थी।
गहरे राजनीतिक विभाजन के बीच नई पारी
रविवार को मतदान के बाद लूला जब अपने समर्थकों से मिले, तो उत्साह चरम पर था, लेकिन चुनाव आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि 21.3 करोड़ की आबादी वाला यह देश वैचारिक रूप से गहराई से बंटा हुआ है। कुल मतदाताओं में से 48 प्रतिशत से अधिक लोगों ने बोल्सोनारो के पक्ष में वोट दिया। लूला का नया कार्यकाल 5 जनवरी 2027 से औपचारिक रूप से शुरू होना तय है, लेकिन उनके सामने वर्ष 2003 में पहली बार पद संभालने के बाद से अब तक का सबसे जटिल राजनीतिक परिदृश्य खड़ा है। ब्राजील के लोकतांत्रिक दौर की सबसे मुखर दक्षिणपंथी संसद के साथ उन्हें तालमेल बिठाना होगा। इस आम चुनाव में बोल्सोनारो की लिबरल पार्टी ने संसद के भीतर सबसे बड़ी बढ़त हासिल की है, जिससे सरकार के लिए विधायी राह बेहद पथरीली रहने वाली है।
घरेलू मोर्चे पर आम सहमति बनाने का संकल्प
मतदान से पहले लूला ने इस चुनावी लड़ाई को राष्ट्र के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ करार दिया था। उन्होंने देश के ध्रुवीकृत छोरों को आपस में जोड़ने के लिए शासन की एक नई शैली अपनाने का वादा किया। वोटिंग से पहले एक लाइवस्ट्रीम संवाद में उन्होंने जनता से कहा था कि यह मुल्क अब पहले जैसा कभी नहीं रहेगा। हालांकि उन्होंने शासन के इस नए तरीके का विस्तृत खाका सामने नहीं रखा, लेकिन उन्होंने दोहराया कि वे सभी वर्गों के लिए अवसर और जनहितकारी नीतियों के साथ एक न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिए लगातार संघर्षरत रहेंगे। अपने चौथे कार्यकाल के अंत तक 85 वर्ष के होने जा रहे इस दिग्गज नेता के लिए विरोधी संसद के रहते अपने वादों को धरातल पर उतारना पिछले तीन कार्यकालों के मुकाबले कहीं अधिक कठिन साबित होगा।
भू-राजनीतिक खींचतान और वाशिंगटन से तनाव
लूला की नई सरकार को न केवल घरेलू गतिरोध बल्कि वैश्विक स्तर पर भी कड़े दबाव का सामना करना पड़ेगा। इसमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रुख विशेष रूप से अहम है। ट्रंप ने हालांकि फ्लेवियो बोल्सोनारो का उस तरह सीधा समर्थन नहीं किया जैसा उन्होंने कोलंबिया और होंडुरास में जीत दर्ज करने वाले दक्षिणपंथी उम्मीदवारों के लिए किया था, लेकिन व्हाइट हाउस इस विशाल देश में एक रूढ़िवादी नेतृत्व को देखना अधिक पसंद करता। अमेरिकी प्रशासन लातिन अमेरिका को अपने प्रभाव क्षेत्र के रूप में देखता है और रक्षा, सुरक्षा तथा व्यापार पर अपनी रणनीतियों के पैरोकार नेताओं को बढ़ावा देना चाहता है। इसके साथ ही वाशिंगटन की प्राथमिकता पश्चिमी गोलार्ध में चीन की बढ़ती पैठ को सीमित करने की भी रही है।
ब्राजील खनिज और ऊर्जा संसाधनों के मामले में बेहद संपन्न है। यह देश तेल से समृद्ध होने के अलावा दुर्लभ पृथ्वी खनिजों के दुनिया के दूसरे सबसे बड़े भंडार का स्वामी है। मौजूदा समय में दक्षिण अमेरिका के बड़े देशों में ब्राजील ही एकमात्र ऐसा राष्ट्र है जहां दक्षिणपंथी सरकार नहीं है, और लूला को आमतौर पर बीजिंग के साथ करीबी रखने वाले नेता के रूप में देखा जाता है। चुनावी समर के दौरान फ्लेवियो बोल्सोनारो ने सत्ता में आने पर ब्राजील की नीतियों को वाशिंगटन के साथ मजबूती से जोड़ने का संकल्प लिया था। इसके विपरीत, लूला ने अमेरिकी प्रशासन को चुनावी प्रक्रिया में दखलंदाजी न करने की चेतावनी देते हुए स्पष्ट कहा था कि उनका देश कभी भी किसी का पिछवाड़ा नहीं बनेगा।
अमेजन वर्षावन और पर्यावरण नीति को लेकर राहत
व्हाइट हाउस में भले ही इस नतीजे से निराशा का माहौल हो, लेकिन पर्यावरण कार्यकर्ताओं और संस्थाओं ने लूला की इस जीत का पुरजोर स्वागत किया है। पर्यावरणविदों को अंदेशा था कि यदि बोल्सोनारो सत्ता में आते हैं, तो ब्राजील के ताकतवर कृषि कारोबार और खनन लॉबी को खुली छूट मिल जाएगी। पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के शासनकाल में अमेजन के जंगलों में बड़े पैमाने पर कटाई और आग लगने की अभूतपूर्व घटनाएं दर्ज की गई थीं। कार्यकर्ताओं की दलील थी कि जूनियर बोल्सोनारो के नेतृत्व में पर्यावरण नियमों में ढिलाई से इस संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को भारी विनाश झेलना पड़ सकता था। लूला के जीतने से अमेजन के संरक्षण को लेकर चल रहे अंतरराष्ट्रीय प्रयासों को नई उम्मीद मिली है।



















