अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में 57 भारतीय मूल के चेहरे दिखाएंगे ताकत, गवर्नर से लेकर मेयर पद तक दावेदारीदीपावली पर हैदराबाद के मुख्य द्वारों पर क्यों बांधा जाता है पूजित कद्दू, जानिए इस पुरानी मान्यता का रहस्यराजस्थान के झुंझुनूं में दर्दनाक हादसा, सड़क बनाते समय करंट की चपेट में आने से पांच मजदूरों ने गंवाई जानघरों में दीमक और जंग की झंझट खत्म करने आई जापानी चौखट, आगरा में बढ़ी मांगगुवाहाटी में राजस्थान लाइम उद्योग ने पेश किया लक्जरी आउटडोर लिविंग स्पेस हेवन स्केप्स, अभिनेता मुकेश खन्ना ने किया उद्घाटनआंध्र प्रदेश निकाय चुनाव में 59 लाख से अधिक वोट पड़े, 275 प्राथमिकियों के बीच 3 नवंबर को परिणामशुक्र का कन्या राशि में गोचर 6 नवंबर से: वृषभ, मिथुन, कन्या और धनु राशि के लिए धन और तरक्की के योगसरगुजा के केसरा गांव में पुरखों की परंपरा, छत पर सरसों सुखाकर तैयार होती है अनोखी सूकटीअमेरिका-ईरान में कूटनीतिक सुलह के संकेतों से कच्चे तेल में फिसलन, कीमतें 100 डॉलर से नीचे खिसकींमुद्रा बाजार में संभावित तूफान: नीतिगत जोखिमों से यूरो और अमेरिकी डॉलर में बढ़ सकती है भारी हलचल
नागौर में रबी सीजन के साथ जई की बुवाई शुरू, दुधारू पशुओं के लिए पौष्टिक चारे की तैयारी में जुटे किसानराजस्थान
2 नव॰ 2026, 11:34 am (1 घंटे पहले)· 0

नागौर में रबी सीजन के साथ जई की बुवाई शुरू, दुधारू पशुओं के लिए पौष्टिक चारे की तैयारी में जुटे किसान

राजस्थान के नागौर जिले में पशुपालकों ने दुधारू मवेशियों के लिए पौष्टिक हरे चारे की आपूर्ति सुनिश्चित करने के मकसद से जई की बुवाई शुरू कर दी है। समय पर बुवाई और उन्नत प्रमाणित बीजों के इस्तेमाल से चारे की पैदावार बढ़ने के साथ महंगे बाजारू आहार का खर्च भी घटेगा।

राजस्थान के नागौर जिले में रबी की नई फसल ऋतु का आगाज होते ही ग्रामीण क्षेत्रों में जई की खेती का काम तेजी पकड़ चुका है। स्थानीय किसान और पशुपालक सर्दियों के इस महत्वपूर्ण दौर में अपने मवेशियों के लिए हरे चारे का पुख्ता बंदोबस्त करने में जुट गए हैं। ग्रामीण आजीविका में दुधारू मवेशियों की भूमिका बेहद अहम होने के चलते चारे की निरंतर उपलब्धता पशुपालकों के लिए हमेशा प्राथमिक जरूरत रहती है। कृषि के जानकारों का कहना है कि नवंबर का शुरुआती पखवाड़ा जई की बुवाई के लिए सबसे अनुकूल समय माना जाता है। इस अवधि में बुवाई पूरी कर लेने से पौधे को विकास के लिए मुफीद वातावरण मिलता है और बाद में भरपूर हरा चारा हासिल होता है। समयबद्ध तरीके से काम करने वाले किसान न केवल साल के बाकी महीनों के लिए बेहतर चारे का भंडार तैयार कर पाते हैं, बल्कि उन्हें बाहर से खरीदे जाने वाले महंगे पशु आहार पर भी निर्भर नहीं रहना पड़ता।

दुग्ध उत्पादन और पशु स्वास्थ्य के लिए पौष्टिक विकल्प

जई के पौधे की ताजी और हरी पत्तियां पशुओं के आहार के लिहाज से काफी गुणकारी और स्वादिष्ट मानी जाती हैं। इसमें मौजूद आवश्यक पोषक तत्व दुधारू पशुओं के शारीरिक स्वास्थ्य को मजबूत रखने के साथ उनके दूध देने की क्षमता को बढ़ाने में सीधी मदद करते हैं। विशेष तौर पर गाय और भैंस जैसे दुधारू मवेशियों के लिए जई का हरा चारा बेहद लाभकारी सिद्ध होता है। राजस्थान के नागौर जैसे इलाकों में जहां ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बुनियाद काफी हद तक डेयरी और पशुपालन पर टिकी है, वहां जई जैसी फसलों का रकबा बढ़ना किसानों के लिए राहत लेकर आता है। जहां सिंचाई की सुविधाएं उपलब्ध हैं, वहां जई की फसल बहुत सरलता से उगाई जा सकती है। इससे सूखे और कम चारे वाले महीनों में भी पशुओं को पौष्टिक भोजन मिलता रहता है और बाजार के चारे पर होने वाला भारी भरकम खर्च सीमित हो जाता है।

ये भी पढ़ें

उन्नत प्रमाणित किस्मों के चयन से बढ़ेगी पैदावार

फसल की गुणवत्ता और उपज काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि बुवाई के लिए किस तरह के बीजों का इस्तेमाल किया गया है। कृषि विशेषज्ञ रामनिवास चौधरी ने इस संबंध में बताया कि अच्छी पैदावार लेने के लिए किसानों को प्रमाणित उन्नत बीजों का ही चुनाव करना चाहिए। उन्होंने ओएस-6, ओएस-7 और कैंट जैसी किस्मों को हरे चारे के उत्पादन के लिहाज से काफी असरदार बताया है। किसानों को अपनी जमीन में किस्म का चयन करते वक्त स्थानीय जलवायु, उपलब्ध सिंचाई साधनों और खेत की मिट्टी की स्थिति का पूरा ध्यान रखना चाहिए। प्रमाणित बीजों से की गई बुवाई का अंकुरण एकसमान होता है, पौधे तेजी से स्थापित होते हैं और आगे चलकर चारे की कुल पैदावार में भी स्पष्ट बढ़ोतरी दर्ज की जाती है।

खेत की तैयारी, बीज दर और कतारबद्ध बुवाई के नियम

जई की खेती में जमीन की तैयारी और बीज डालने की तकनीक का सीधा असर फसल के फैलाव पर पड़ता है। युवा किसान अर्जुन चौधरी के अनुसार, बुवाई शुरू करने से पहले जमीन को पूरी तरह भुरभुरा बनाना जरूरी होता है। इसके लिए खेत की दो से तीन बार अच्छी तरह जुताई कर लेनी चाहिए। जुताई के बाद पाटा चलाकर खेत को समतल किया जाना चाहिए ताकि बाद में जब सिंचाई की जाए तो पानी पूरे रकबे में एक समान पहुंचे और कहीं जलजमाव न हो। बुवाई के लिए प्रति हेक्टेयर करीब 75 से 100 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है। बुवाई हमेशा कतारों में करने की सलाह दी जाती है, जिसमें कतार से कतार के बीच की दूरी 25 से 30 सेंटीमीटर रखी जानी चाहिए। इस दूरी पर बुवाई करने से पौधों को धूप और हवा के साथ फैलने की पूरी जगह मिलती है, जिससे बढ़वार शानदार होती है। इसके अलावा कतार में फसल होने पर निराई और गुड़ाई का काम भी बेहद आसानी से निपटाया जा सकता है। बुवाई के समय खेत की मिट्टी में पर्याप्त नमी होना अनिवार्य है ताकि बीज तुरंत और सही ढंग से अंकुरित हो सकें।

सिंचाई प्रबंधन और खरपतवार से सुरक्षा

जई की फसल से लगातार बढ़िया हरा चारा प्राप्त करने के लिए सिंचाई का प्रबंधन बहुत सावधानी से करना पड़ता है। खेत में नमी का स्तर बनाए रखना आवश्यक है ताकि पौधे बिना किसी रुकावट के बढ़ते रहें। सिंचाई की आवृत्ति खेत की मिट्टी के प्रकार और बदलते मौसम के रुख को देखकर तय की जानी चाहिए। साथ ही खेत में बहुत ज्यादा पानी भरने या जलभराव होने से बचना चाहिए, क्योंकि जरूरत से ज्यादा पानी फसल को नुकसान पहुंचा सकता है। इसके अलावा फसल जब शुरुआती दौर में हो, तब खेत में उगने वाले अनावश्यक खरपतवारों को तुरंत निकाल देना चाहिए। समय पर खरपतवार नियंत्रण करने से मिट्टी के तमाम पोषक तत्व और नमी सिर्फ जई के पौधों को मिलते हैं, जिससे चारे की गुणवत्ता बेहतरीन बनी रहती है।

लागत घटाकर पशुपालन को अधिक लाभकारी बनाने की रणनीति

पशुपालकों के लिए चारे की किल्लत सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती साबित होती है, क्योंकि बाजार में दाना और सूखा चारा काफी महंगा मिलता है। ऐसे में जई की खेती पशुपालकों को अपने ही खेत में ताजा, हरा और पौष्टिक आहार तैयार करने का मौका देती है। समय पर बुवाई, उपयुक्त प्रमाणित बीजों का चुनाव और सही देखरेख अपनाकर किसान प्रति बीघा या प्रति हेक्टेयर अधिकतम चारा हासिल कर सकते हैं। जब घर पर ही उच्च गुणवत्ता वाला हरा चारा उपलब्ध रहता है, तो पशु आहार की खरीद पर होने वाला दैनिक खर्च काफी हद तक कम हो जाता है। इसका सीधा असर पशुपालकों की बचत और ग्रामीण डेयरियों के मुनाफे पर पड़ता है, जिससे नागौर के किसानों के लिए पशुपालन अधिक फायदे का सौदा बन जाता है।

सवाल-जवाब

जई की बुवाई के लिए कौन सा समय सबसे उपयुक्त माना जाता है?
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार नवंबर का शुरुआती समय जई की बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त रहता है।
हरे चारे के लिए जई की कौन सी उन्नत किस्में सुझाई गई हैं?
कृषि विशेषज्ञ रामनिवास चौधरी के अनुसार ओएस-6, ओएस-7 और कैंट जैसी किस्में हरे चारे के लिए बेहतर मानी जाती हैं।
जई की बुवाई के लिए प्रति हेक्टेयर कितने बीज की आवश्यकता होती है?
जई की बुवाई के लिए प्रति हेक्टेयर लगभग 75 से 100 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है।
बुवाई के दौरान कतारों के बीच कितनी दूरी रखनी चाहिए?
कतार से कतार के बीच 25 से 30 सेंटीमीटर की दूरी रखनी चाहिए ताकि पौधों को फैलने की जगह मिले और निराई-गुड़ाई आसान रहे।
खेत की तैयारी के दौरान जुताई कितनी बार करनी चाहिए?
खेत की दो से तीन बार अच्छी तरह जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा और समतल बना लेना चाहिए।
पशुपालकों के लिए जई की खेती का मुख्य आर्थिक लाभ क्या है?
इससे पशुओं के लिए पौष्टिक हरा चारा सुलभ होता है और बाजार से खरीदे जाने वाले महंगे पशु आहार पर होने वाला खर्च घटता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Arjun Mehta@arjun-mehta·32 मिनट पहले

ओएस-6 और ओएस-7 किस्म के बीज सच में बढ़िया चारा पैदा करते हैं, हमारे यहाँ भी यही बोते हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·32 मिनट पहले

अर्जुन भाई, ओएस-6 और ओएस-7 ठीक हैं, पर कैंट का मुकाबला नहीं है। हमारे इलाके में तो कैंट ही सबसे ज्यादा पक्का चारा देती है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·58 मिनट पहले

नवंबर में बुवाई अच्छी है, पर नागौर में पानी की कमी देखते हुए ओएस-7 जैसी किस्में कितनी टिक पाएंगी, यह सोचना होगा।

Rohan Verma@rohan-verma·57 मिनट पहले

करण भाई, पानी की बात सही है। बुंदेलखंड और यूपी के कई जिलों में भी सर्दियों में चारे के लिए ऐसी ही दिक्कत आती है, पर प्रमाणित बीजों से थोड़ा संभल जाता है मामला।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp