राजस्थान के पाली स्थित बांगड़ अस्पताल में सिजेरियन ऑपरेशन के जरिए प्रसव कराने के कुछ ही घंटों बाद 23 वर्षीय ललिता की संदिग्ध हालात में जान चली गई। पोकरण के रहने वाले पवन नागौरा की पत्नी ललिता को प्रसव पीड़ा के चलते रविवार को अस्पताल में दाखिल कराया गया था। चिकित्सकों ने शल्य चिकित्सा की मदद से डिलीवरी कराई, जिसके बाद ललिता ने एक स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया। परिवार में नवजात के आगमन की खुशियां छाई ही थीं कि रविवार देर रात अचानक ललिता का स्वास्थ्य तेजी से बिगड़ने लगा और सघन चिकित्सीय देखरेख के बीच उसने अंतिम सांस ली।
परिजनों का गंभीर आरोप और समय पर इलाज न मिलने की शिकायत
ललिता के निधन की सूचना मिलते ही परिजनों में भारी आक्रोश फैल गया। मृतका के रिश्तेदारों ने अस्पताल के ड्यूटी डॉक्टरों और नर्सिंग कर्मियों की कार्यप्रणाली पर सीधा सवाल उठाया है। परिजनों का कहना है कि ऑपरेशन के बाद जब प्रसूता की हालत लगातार गिर रही थी, तब वार्ड में तैनात स्वास्थ्य कर्मियों को बार-बार इसकी जानकारी दी गई। उनका आरोप है कि गंभीर स्थिति के बावजूद स्टाफ ने समय रहते जरूरी कदम नहीं उठाए और न ही उचित आपातकालीन उपचार दिया। परिजनों का स्पष्ट कहना है कि यदि चिकित्सा दल समय पर सक्रिय होकर ध्यान देता, तो ललिता का जीवन बचाया जा सकता था।
मोर्चरी के बाहर आक्रोश और पुलिस बल की तैनाती
घटना के तुरंत बाद मृतका के पार्थिव शरीर को बांगड़ अस्पताल के शवगृह में सुरक्षित रखवाया गया है। मोर्चरी के बाहर बड़ी संख्या में परिजन, रिश्तेदार और स्थानीय लोग एकत्रित हो गए, जहां वे मामले की निष्पक्ष जांच कराने और दोषी चिकित्सकों पर सख्त कानूनी कार्रवाई करने की मांग पर अड़े रहे। अस्पताल परिसर में बढ़ते तनाव और संवेदनशीलता को देखते हुए प्रशासन ने तुरंत पुलिस बल तैनात कर दिया, जिससे शांति व्यवस्था बनी रहे। पुलिस अधिकारी और अस्पताल प्रबंधन के प्रतिनिधि शोकाकुल परिजनों से बातचीत कर उन्हें नियमों के तहत उचित व पारदर्शी जांच का भरोसा दिलाने में जुटे हैं।
नवजात बच्ची की स्थिति और राजस्थान की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल
जन्म के साथ ही अपनी मां को खोने वाली नवजात बालिका को बांगड़ अस्पताल के शिशु वार्ड में रखा गया है, जहां बाल रोग विशेषज्ञों की निगरानी में उसकी सेहत की देखभाल की जा रही है। पाली की इस हृदयविदारक घटना ने हाल ही में कोटा के एक सरकारी अस्पताल में घटित इसी तरह के मामले की कड़वी यादें ताजा कर दी हैं, जहां चिकित्सीय देरी और लापरवाही के चलते एक प्रसूता की जान चली गई थी और भारी विरोध हुआ था। लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाएं राज्य के सरकारी अस्पतालों में आपातकालीन चिकित्सा प्रबंधन, प्रसवोत्तर निगरानी और मरीजों की सुरक्षा पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती हैं।

















