तेजी से बदलती जीवनशैली और तकनीकी विकास के इस दौर में घरों का खान-पान और रसोई का सामान भी काफी बदल चुका है। आज के समय में रसोई के ज्यादातर काम हाईटेक और बिजली से चलने वाली मशीनों के जरिए किए जाते हैं, जिसके चलते पुरानी संस्कृति से जुड़ी कई चीजें धीरे-धीरे प्रचलन से बाहर हो चुकी हैं। इसके बावजूद कुछ ऐसी चीजें आज भी अपनी खास पहचान और उपयोगिता बनाए हुए हैं जिन्हें आधुनिक मशीनें चाहकर भी पूरी तरह विस्थापित नहीं कर पाई हैं।
ऐसी ही एक पारंपरिक वस्तु सिलबट्टा है, जो कभी हर घर की रसोई की मुख्य जरूरत हुआ करती थी और आज भी बाजारों में इसकी मजबूत मांग देखने को मिलती है। बाजारों में कारीगर आज भी पत्थर को हथौड़े और टांकी की मदद से तराशकर इस पारंपरिक उपकरण को हाथों से तैयार करते हैं। इन कुशल कारीगरों का मानना है कि अच्छी गुणवत्ता वाले पत्थर से बनाया गया यह साधन लंबे समय तक टिकता है और इसमें तैयार किए जाने वाले मसालों तथा चटनियों का स्वाद आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में तैयार सामग्री से बिल्कुल अलग और बेहतर होता है।
इस पारंपरिक पत्थर पर लहसुन, अदरक, विभिन्न मसाले और तरह-तरह की चटनियां पीसने का चलन सदियों पुराना है। आधुनिक मिक्सी जहां चीजों को तेजी से पीसती है, वहीं इस विधि में सामग्री की पिसाई धीरे-धीरे होती है, जिससे उसके प्राकृतिक गुण, बनावट और स्वाद में स्पष्ट अंतर महसूस होता है। यही मुख्य कारण है कि आज भी कई लोग खास पकवानों और पारंपरिक चटनियों का असली स्वाद पाने के लिए इसी विधि का उपयोग करना पसंद करते हैं।
विशेष स्वाद के अनुभव के कारण अब नई पीढ़ी के लोगों का झुकाव भी एक बार फिर इस पारंपरिक रसोई उपकरण की तरफ बढ़ने लगा है। विशेष तौर पर ग्रामीण इलाकों के अलावा पारंपरिक भोजन शैली को पसंद करने वाले परिवारों में इसका प्रयोग आज भी बड़े पैमाने पर देखा जा सकता है, जो आधुनिकता के बीच पुरानी संस्कृति की मजबूत पकड़ को दर्शाता है।
आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. ओमप्रकाश भारद्वाज का इस विषय में कहना है कि यह उपकरण प्राकृतिक पत्थर से बनता है और इसमें सामग्री पीसने की प्रक्रिया पूरी तरह पुरानी पद्धति पर आधारित होती है। उनके अनुसार, घरेलू स्तर पर तैयार की जाने वाली इन चीजों में ताजे घटकों के प्रयोग से भोजन की गुणवत्ता और स्वाद में सकारात्मक अंतर आता है। इस तरह पारंपरिक रूप से तैयार ताजा भोजन पाचन तंत्र के लिए भी काफी मुफीद साबित हो सकता है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि इसे किसी प्रकार की बीमारी या पेट संबंधी समस्याओं के इलाज के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
आम लोगों का भी यही मानना है कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में समय की बचत के लिए बिजली से चलने वाली मिक्सी का उपयोग अनिवार्य हो गया है, लेकिन जब बात किसी खास स्वाद और प्रामाणिक तरीकों से खाना बनाने की आती है तो सिलबट्टे का विकल्प कोई नहीं ले सकता है। यही कारण है कि एक समय जो सामान घरों से लगभग गायब होता दिख रहा था, वह अब एक बार फिर आधुनिक दौर के रसोई घरों में अपनी जगह बनाता नजर आ रहा है।





















