शारदीय नवरात्र का पावन पर्व नजदीक आते ही राजस्थान के सीकर शहर में धार्मिक आयोजनों की तैयारियां जोरों पर पहुंच गई हैं। विभिन्न पूजा पंडालों और मंदिरों के लिए मां दुर्गा की भव्य और आकर्षक प्रतिमाओं के निर्माण का सिलसिला पूरी रफ्तार पकड़ चुका है। शहर के अलग-अलग इलाकों में पश्चिम बंगाल से पहुंचे कुशल मूर्तिकार दिन-रात प्रतिमाओं को जीवंत रूप देने में लगे हुए हैं। इन प्रतिमाओं के निर्माण की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि इनमें स्थानीय मिट्टी के साथ-साथ विशेष तौर पर पश्चिम बंगाल से मंगवाई गई मिट्टी का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे प्रतिमाओं को बेहद बारीक और सुंदर फिनिशिंग दी जा सके।
कारीगरों की अनवरत मेहनत और काम के लंबे घंटे
मां दुर्गा, महिषासुर और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को संपूर्ण आकार देना बेहद जटिल और धैर्य की मांग करने वाला कार्य है। इस बार पश्चिम बंगाल से लगभग 11 मूर्तिकारों का दल सीकर पहुंचा है। नवरात्र का शुभारंभ होने से पूर्व सभी ऑर्डर्स को समय पर पूरा करने के लिए ये कारीगर रोजाना 18 से 20 घंटे तक निरंतर काम कर रहे हैं। सुबह से देर रात तक मूर्तियों के बुनियादी ढांचे को तैयार करने, मिट्टी का लेप लगाने, उन्हें सुखाने और फिर रंगों व वस्त्रों से सजाने का काम बिना रुके जारी है।
लकड़ी के ढांचे से लेकर बंगाल की मिट्टी से फिनिशिंग तक की प्रक्रिया
प्रतिमा निर्माण से जुड़े मूर्तिकार राजू पाल के अनुसार, इस पूरी कलात्मक प्रक्रिया की शुरुआत मजबूत लकड़ी और बांस के ढांचे से होती है। लकड़ी के कंकाल पर पुआल, घास-फूस और सुतली को कसकर बांधा जाता है, जिससे देवी की देह और भुजाओं को आधारभूत स्वरूप मिलता है। इसके पश्चात पहले चरण में सीकर की स्थानीय मिट्टी का मोटा लेप लगाया जाता है। जब यह परत सही तरीके से बैठ जाती है, तब अंतिम व सबसे महत्वपूर्ण परत के लिए बंगाल से लाई गई विशेष मिट्टी का प्रयोग किया जाता है।
राजू पाल बताते हैं कि पश्चिम बंगाल की मिट्टी अत्यधिक चिकनी, लचीली और चिपकने की क्षमता वाली होती है। इस मिट्टी से बनाई गई प्रतिमाओं की बाहरी सतह बेहद मुलायम और चमकदार निकलकर आती है। इसके अलावा धूप व हवा में सूखने के दौरान मूर्तियों पर दरारें पड़ने का जोखिम लगभग न के बराबर रहता है। इसी विशिष्ट गुण के कारण मूर्तिकार अपने साथ सैकड़ों किलोमीटर दूर से बोरियों में यह मिट्टी लेकर आते हैं, ताकि देवी के मुख और आभूषणों की हर बारीक लकीर साफ और सुंदर दिखाई दे।
रंग-रोगन, पारंपरिक शृंगार और करोड़ों का कारोबार
मिट्टी का काम पूर्ण होने और उसके भली-भांति सूख जाने के बाद प्रतिमाओं को चटख रंगों से रंगा जाता है। देवी की विशाल आंखों को पारंपरिक बंगाली शैली में चित्रित करने के बाद उन्हें रेशमी वस्त्रों, चमकीले मुकुटों, पारंपरिक आभूषणों और विभिन्न प्रकार के दैवीय अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित किया जाता है। अंतिम शृंगार के पश्चात प्रतिमाओं की आभा देखते ही बनती है।
सीकर में दुर्गा पूजा का पर्व अब एक बड़े धार्मिक और आर्थिक आयोजन का रूप ले चुका है। शहर में दुर्गा प्रतिमाओं से जुड़ा वार्षिक कारोबार 1 करोड़ रुपये से अधिक का रहता है। इस सीजन में कारीगरों ने 100 से ज्यादा प्रतिमाएं तैयार करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। मांग केवल सीकर शहर तक ही सीमित नहीं है, बल्कि आसपास के क्षेत्रों जैसे चूरू, झुंझुनूं, नागौर, फतेहपुर और जयपुर से भी भारी संख्या में पंडाल समितियों ने मूर्तियों के ऑर्डर दिए हैं। अकेले सीकर शहर में ही दो दर्जन से अधिक प्रमुख स्थलों पर शारदीय नवरात्र के दौरान भव्य दुर्गा पूजा पंडाल स्थापित किए जाते हैं।





















