राजस्थान के अलवर नगर निगम में सफाई कर्मचारियों की भर्ती प्रक्रिया और अनुभव प्रमाण पत्र जारी करने को लेकर चल रहा विरोध प्रदर्शन अब एक बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक विवाद में बदल चुका है। आंदोलनकारी सफाई कर्मियों का एक प्रतिनिधिमंडल जब अपनी मांगों को लेकर महापौर सुमन लता अग्रवाल से मिलने उनके कार्यालय पहुंचा, तो वहां की तस्वीर ने स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। आधिकारिक चर्चा के दौरान महापौर की कुर्सी के ठीक बगल में उनके पति अजय अग्रवाल बैठे नजर आए, जो नगर निगम के प्रशासनिक अधिकारियों या निर्वाचित जनप्रतिनिधि की तरह कर्मचारियों से सीधे संवाद कर रहे थे और उन्हें निर्देश दे रहे थे, जबकि निर्वाचित महापौर पूरे समय लगभग खामोश बैठी रहीं।
सफाई कर्मचारियों के अनुभव प्रमाण पत्र पर छिड़ा विवाद
अलवर नगर निगम में सफाई कर्मियों का एक बड़ा समूह काफी समय से अनुभव प्रमाण पत्र जारी करने की मांग कर रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि आगामी औपचारिक नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल होने और उसका लाभ लेने के लिए यह दस्तावेज बेहद अनिवार्य है। प्रमाण पत्र न मिलने से नाराज कर्मचारियों ने सोमवार को नगर निगम परिसर में जोरदार प्रदर्शन किया। आंदोलन के बाद कर्मचारियों के प्रतिनिधियों ने महापौर कार्यालय का रुख किया ताकि वे अपनी समस्याएं सीधे शहर की प्रथम नागरिक के सामने रख सकें। इस गतिरोध के कारण करीब 900 सफाईकर्मियों का भविष्य और उनकी भर्ती प्रक्रिया सीधे तौर पर प्रभावित होने की आशंका बनी हुई है।
मेयर की मौजूदगी में पति ने दिए आश्वासन और निर्देश
प्रतिनिधिमंडल के साथ हुई इस औपचारिक बातचीत का एक वीडियो सामने आने के बाद पूरे प्रशासनिक हलके में हलचल मच गई है। वीडियो में साफ दिख रहा है कि अजय अग्रवाल कर्मचारियों से नियमों के दायरे में रहकर काम करने की बात कह रहे हैं। उन्होंने कर्मचारियों को आश्वस्त करने का प्रयास किया कि महापौर पूरी तरह से उनके साथ खड़ी हैं। बातचीत के दौरान उन्होंने सफाई कर्मियों से यहां तक कहा कि शहर को सुधारने के लिए लोगों की जरूरत है और यह काम सफाईकर्मी ही कर सकते हैं। उन्होंने आगे यह भी जोड़ा कि वे हर दिन ठेकेदारों से सिरदर्दी नहीं लेना चाहते और जो लोग ईमानदारी से काम करेंगे, उन्हें वे अपने परिवार के सदस्य की तरह मानेंगे। उन्होंने कर्मचारियों से स्पष्ट कहा कि वे महापौर पर किसी भी तरह का संशय न रखें।
नियुक्ति आदेश करवाने का दावा और विरोधाभास
बैठक के दौरान सबसे बड़ा विवाद तब खड़ा हुआ जब अजय अग्रवाल ने कर्मचारियों से कहा कि वे दस्तावेज तैयार रखें, वे महापौर से उनके नियुक्ति आदेश ही जारी करवा देंगे। हालांकि, इस भारी-भरकम आश्वासन के तुरंत बाद ही उनकी बातों में एक बड़ा विरोधाभास भी सामने आया। उसी बातचीत में उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि वास्तव में नियुक्ति संबंधी अधिकार उनके पास नहीं हैं और यह शक्ति तो सरकार के स्तर पर तय होती है। उन्होंने कहा कि अनुभव के आधार पर कर्मचारियों की बात को महापौर के स्तर से राज्य सरकार के समक्ष मजबूती से उठाया जाएगा। बिना किसी प्रशासनिक या निर्वाचित पद के इस तरह नियुक्ति कराने का भरोसा दिलाना और फिर अधिकार न होने की बात कहना अब प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है।
संवैधानिक मर्यादा और समानांतर व्यवस्था पर सवाल
नगर निगम जैसी स्वायत्त और लोकतांत्रिक संस्था में निर्वाचित महापौर का एक निश्चित संवैधानिक और प्रशासनिक दायरा कानून द्वारा निर्धारित है। ऐसे में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि किसी निर्वाचित जन प्रतिनिधि के आधिकारिक कार्यालय में उनके परिजन किस कानूनी हैसियत से कर्मचारियों को दिशा-निर्देश दे सकते हैं। महापौर की उपस्थिति में उनके पति द्वारा आश्वासन देना और नीतिगत फैसले लेने जैसी बातें करना यह दर्शाता है कि क्या नगर निगम के निर्णय निर्वाचित प्रतिनिधि ले रहे हैं या पर्दे के पीछे कोई समानांतर व्यवस्था सक्रिय है। 900 कर्मचारियों की आजीविका से जुड़े इस संवेदनशील मामले में इस तरह की कार्यशैली ने नगर निगम की निष्पक्षता और कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है।




















