राजस्थान के टोंक जिले में आस्था और लोक विश्वास का एक अत्यंत विशिष्ट धाम दूनी कस्बे में स्थित है. यहाँ तालाब के किनारे बना दूणजा माता का पावन मंदिर अपनी विलक्षण मान्यताओं और सदियों पुरानी रीतियों के कारण दूर-दूर तक पहचाना जाता है. वैसे तो पूरे साल ही इस तीर्थ स्थल पर दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है, लेकिन शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों में मंदिर परिसर का परिवेश अत्यंत दिव्य और जीवंत नजर आता है. टोंक जिले के साथ-साथ राजस्थान के विभिन्न अंचलों से भक्त अपनी निजी मन्नतें और मनोकामनाएं लेकर दूणजा माता के सम्मुख नतमस्तक होने पहुंचते हैं. श्रद्धालुओं में यह दृढ़ धारणा बसी है कि सच्चे मन से हाजिरी लगाने वाले किसी भी याचक को माता के इस पावन दरबार से कभी खाली हाथ नहीं लौटना पड़ता.
मदिरा भोग अर्पण की परंपरा और भक्तों का अटूट विश्वास
दूणजा माता मंदिर से जुड़ी सबसे विस्मयकारी मान्यता माता रानी को मदिरा अर्पण करने की है. स्थानीय मान्यताओं और भक्तों के विश्वास के मुताबिक देवी अपने उपासकों द्वारा चढ़ाया गया मदिरा का भोग प्रत्यक्ष स्वीकार करती हैं. जब किसी श्रद्धालु की मनोकामना फलित हो जाती है, तो वह कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु मंदिर पहुंचता है और माता के श्रीचरणों में शराब की शीशी समर्पित करता है. मंदिर के पुजारियों और क्षेत्रीय निवासियों का कहना है कि जब मदिरा की शीशी प्रतिमा के मुख के पास स्पर्श कराई जाती है, तो वह कुछ ही क्षणों के भीतर खाली होने लगती है. मदिरापान के इस अनूठे विधान और देवी के चमत्कारिक प्रभाव को साक्षात देखने के लिए विशाल जनसमूह उमड़ता है. मन्नत पूरी होने के उपलक्ष्य में भक्त केवल शराब ही भेंट नहीं करते, बल्कि माता को विशेष पोशाक अर्पित करते हैं और सवामणि प्रसादी का भव्य आयोजन भी करवाते हैं.
फूल की पंखुड़ी से मिलने वाली पाती और कार्य सिद्धि की मान्यता
दूणजा माता धाम में केवल मदिरा का भोग ही आकर्षण का केंद्र नहीं है, बल्कि यहाँ कार्य सिद्धि के लिए ‘पाती’ मांगने की एक प्राचीन और प्रतिष्ठित परंपरा भी विद्यमान है. जनमानस में इस विधि के प्रति असीम श्रद्धा है. जब कोई व्यक्ति अपने किसी विशेष कार्य, संकट या योजना को लेकर असमंजस में होता है, तो वह पूरी निष्ठा के साथ माता की चौखट पर अर्जी लगाता है. लोक धारणा के अनुसार जिस व्यक्ति को देवी की पाती प्राप्त हो जाती है, उसका वह अभीष्ट कार्य शत-प्रतिशत सिद्ध होना निश्चित मान लिया जाता है. वास्तव में पाती माता की अलंकृत पोशाक से स्वयं गिरने वाली फूल की एक पंखुड़ी होती है. जब कोई भक्त इस दिव्य संकेत की याचना करता है, तब पुजारी के माध्यम से प्रतिमा के समक्ष एक कोरा श्वेत कागज रख दिया जाता है. इसके बाद पुजारी माता के समक्ष विनती और अरदास प्रस्तुत करता है. यदि उस व्यक्ति के संकल्प की सफलता तय होती है, तो देवी की पोशाक में सजे पुष्पों में से एक पंखुड़ी अपने आप अलग होकर सीधे उस कागज पर आ गिरती है. इस पाती के मिलते ही भक्त आश्वस्त हो जाते हैं कि उनका कार्य बिना किसी बाधा के पूर्ण होगा.
राजसी दौर में खुदाई के बावजूद अनुत्तरित रहा मदिरापान का रहस्य
दूणजा माता के इस मदिरापान का प्रसंग हालिया दौर का न होकर सदियों पुराना है. इस रहस्यमयी घटनाक्रम ने लंबे समय से जनसामान्य के साथ-साथ तार्किक दृष्टिकोण रखने वालों को भी चकित किया है. मंदिर के सेवादार बताते हैं कि प्राचीन समय में इस क्षेत्र के तत्कालीन शासक ने भी इस पूरी प्रक्रिया के पीछे की हकीकत जानने का गंभीर प्रयास किया था. राजा के मन में यह शंका उत्पन्न हुई थी कि संभवतः प्रतिमा के भीतर कोई गुप्त नली, छिद्र या पाइप प्रणाली छिपी हो सकती है, जिसके जरिए मदिरा सीधा भूमिगत नालियों में उतर जाती हो. अपने इस संशय का निवारण करने के लिए तत्कालीन राजा ने आदेश जारी कर मंदिर के चारों तरफ गहरी खाइयां खुदवा दी थीं. कई दिनों तक सैनिकों और कारीगरों ने मंदिर की नींव के इर्द-गिर्द व्यापक खुदाई और बारीकी से छानबीन की, लेकिन राजा और उनकी सैन्य टुकड़ी को मदिरा रिसाव का कोई भी प्रमाण नहीं मिल सका. जमीन की खुदाई में शराब की एक बूंद तक नहीं पाई गई. इस गहन पड़ताल के विफल होने के बाद तत्कालीन नरेश ने भी जन आस्था और माता के अलौकिक स्वरूप को स्वीकार कर लिया था. वर्तमान समय में भी शारदीय नवरात्रि के पर्व पर दूणजा माता का मंदिर भव्य रूप से सजा हुआ है और दर्शनार्थियों का अपार सैलाब माता के जयघोष के साथ अपनी श्रद्धा निवेदित कर रहा है.





















