शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर शक्ति की उपासना का महापर्व शुरू हो चुका है, जिसके चलते राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले में आध्यात्मिक उत्साह चरम पर है। पूरे नौ दिनों तक चलने वाले इस धार्मिक अनुष्ठान में मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा की जाती है। जिले के शक्तिपीठों और प्राचीन देवी मंदिरों में इस दौरान विशेष रौनक छाई हुई है। प्रतापगढ़ की भूमि पर स्थापित इन पवित्र धामों का इतिहास सदियों पुराना है और हर मंदिर से जुड़ी मान्यताएं अपने आप में बेहद दुर्लभ और अनूठी हैं। कहीं माता की दिन में तीन बार आरती की जाती है, तो कहीं मनोकामना सिद्ध होने पर लोहे की जंजीरें अर्पित करने का अनूठा रिवाज है।
शहर के हृदय स्थल और राजमहल परिसर के प्रमुख मंदिर
प्रतापगढ़ शहर के मुख्य बाजार और केंद्रीय इलाके में स्थित राज राजेश्वरी माता मंदिर पूरे नगरवासियों के लिए अटूट आस्था का बड़ा केंद्र है। इस सिद्ध पीठ में प्रतिदिन तीनों पहर माता की भव्य आरती संपन्न होती है। इसके अलावा मंदिर के गर्भगृह में सदियों से एक अखंड दीपक प्रज्वलित है, जो बिना रुके निरंतर जलता आ रहा है। स्थानीय लोग इस अखंड दीप को सकारात्मक ऊर्जा और माता के प्रत्यक्ष आशीर्वाद का प्रतीक मानते हैं।
वहीं ऐतिहासिक विरासत को समेटे शहर के पुराने किला परिसर में बाणेश्वरी माता का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है। बाणेश्वरी माता को स्थानीय पूर्व राजपरिवार की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है। इस धाम की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि यहां माता की अलौकिक प्रतिमा अश्व यानी घोड़े पर सवार मुद्रा में स्थापित है। नवरात्र के पावन दिनों में राजमहल परिसर में माता के दर्शन पाने के लिए तड़के से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग जाती हैं।
ग्रामीण अंचलों में बीजमाता, भंवरमाता और पद्मावती माता के धाम
प्रतापगढ़ के कस्बों और देहाती इलाकों में भी कई अति प्राचीन शक्तिपीठ मौजूद हैं, जिनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई है। देवगढ़ क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध बीजमाता मंदिर और छोटीसादड़ी इलाके का भंवरमाता मंदिर सदियों पुराने तीर्थ स्थल हैं। इन दोनों ही शक्तिपीठों पर नवरात्र उत्सव के उपलक्ष्य में विशाल धार्मिक मेलों का आयोजन होता है। आसपास के क्षेत्रों से हजारों की संख्या में भक्त अपनी मन्नतें लेकर यहां हाजिरी लगाते हैं।
इसी क्रम में जिले के निनोर गांव में स्थित पद्मावती माता मंदिर अपनी एक अत्यंत दुर्लभ आध्यात्मिक परंपरा के लिए जाना जाता है। इस मंदिर के बारे में यह प्रबल मान्यता है कि यहां भक्तों को एक ही दिन में माता के तीन अलग-अलग स्वरूपों और अवस्थाओं के दर्शन प्राप्त होते हैं। जीवन की तीन अवस्थाओं के दर्शन की यह अलौकिक व्यवस्था श्रद्धालुओं को भीतर तक विस्मित और भावविभोर कर देती है।
सदियों पुरानी अखंड ज्योत और लोहे की बेड़ियां चढ़ाने की परंपरा
जिले के बारावरदा इलाके में स्थित खेड़ा नाहरसिंह माता मंदिर अपनी चमत्कारी अखंड ज्योति के लिए पूरे क्षेत्र में विख्यात है। लोकमान्यता के अनुसार इस मंदिर में जलने वाली पावन ज्योत कई पीढ़ियों और सदियों से कभी बुझी नहीं है और लगातार प्रकाशमान है। श्रद्धालु इस पवित्र अग्नि के दर्शन कर स्वयं को धन्य मानते हैं।
दूसरी ओर देवाकमाता मंदिर की परंपरा तो श्रद्धालुओं को हैरान कर देने वाली है। इस पावन धाम में जब किसी भक्त की कोई कठिन मन्नत अथवा मनोकामना पूरी हो जाती है, तो वह आभार स्वरूप माता के चरणों में लोहे की मजबूत बेड़ियां भेंट करता है। यह विचित्र रिवाज यहां सदियों से लगातार निभाया जा रहा है। मंदिर प्रांगण और गर्भगृह के आसपास एकत्रित सैकड़ों लोहे की बेड़ियां इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि कितने लोगों की मुरादें यहां पूरी हुई हैं।
शिवना नदी का तट और दुर्लभ मुर्गे की सवारी वाली प्रतिमा
प्रतापगढ़ जिले के शांत और मनोरम प्राकृतिक परिवेश में भी शक्ति की उपासना के केंद्र विद्यमान हैं। शिवना नदी के पावन तट पर स्थित चामुंडामाता मंदिर अपने प्राकृतिक सौंदर्य और असीम आध्यात्मिक शांति के लिए पहचाना जाता है। नदी की बहती जलधारा के बीच माता का पूजन भक्तों को एक अलग ही मानसिक शांति प्रदान करता है।
वहीं मेरियाखेड़ी के समीप एक ऊंची पहाड़ी की चोटी पर कामेश्वरी माता का दुर्लभ मंदिर बना हुआ है। इस शक्तिपीठ की सबसे अनूठी विशेषता माता की सवारी है। आमतौर पर शेरावाली या सिंहवाहिनी के रूप में पूजी जाने वाली देवी की प्रतिमा यहां मुर्गे पर सवार स्वरूप में प्रतिष्ठित है। देवी प्रतिमा का यह स्वरूप पूरे देश में अत्यंत दुर्लभ माना जाता है, जिसके दर्शन के लिए भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
पड़ोसी राज्यों से उमड़ता है श्रद्धालुओं का सैलाब
नवरात्र के पूरे नौ दिनों के दौरान प्रतापगढ़ के इन सभी नौ देवी धामों में अखंड दुर्गा सप्तशती पाठ, विशेष महाआरती, हवन-यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों की अविरल श्रृंखला चलती रहती है। जयकारों की गूंज से समूचा अंचल भक्तिमय बना रहता है। इन पावन स्थलों पर न केवल राजस्थान बल्कि सीमावर्ती राज्य मध्यप्रदेश से भी हजारों की तादाद में श्रद्धालु शीश नवाने आते हैं। ये सभी नौ धाम प्रतापगढ़ की सदियों पुरानी धार्मिक धरोहर, संस्कृति और जनआस्था के जीवंत प्रतीक हैं।






















