मारवाड़ के बाजारों में गुलाबी ठंड की शुरुआत होते ही ठेलों और दुकानों पर सिंघाड़े सजने लगे हैं, लेकिन इस बार स्थानीय फल की मिठास पूरी तरह गायब नजर आ रही है। मारवाड़ अंचल में जब भी कुरकुरे, रसीले और प्राकृतिक मिठास वाले सिंघाड़े की चर्चा छिड़ती है, तो सबसे पहला नाम पाली का ही सामने आता रहा है। दशकों तक जिस फल ने अपनी अनूठी पहचान के दम पर दूर-दराज की मंडियों में धाक जमाई, आज उसी की स्थानीय पैदावार अपने वजूद की लड़ाई हार चुकी है। कभी लोरडिया तालाब के लबालब पानी से सींची जाने वाली यह पारंपरिक फसल अब उसी जलस्रोत की बदहाली के चलते इतिहास के पन्नों में दर्ज होने की कगार पर पहुंच गई है।
गंदगी और सीवरेज की मार से उजड़ गई पारंपरिक खेती
पाली शहर के ऐतिहासिक लोरडिया तालाब को स्थानीय सिंघाड़ा उत्पादन का उद्गम स्थल और प्रमुख केंद्र माना जाता था। पिछले कुछ दशकों के दौरान तेज गति से हुए अनियंत्रित शहरीकरण ने इस प्राकृतिक जलस्रोत का स्वरूप बिगाड़ कर रख दिया। शहर की नालियों का गंदा सीवरेज का पानी, घरों से निकलने वाला कचरा और प्लास्टिक सीधे तालाब में गिरने से इसका पानी जहरीला हो गया। पानी की सतह के नीचे भारी मात्रा में गाद और प्लास्टिक कचरा जम जाने से जलीय पौधों और सिंघाड़े की बेलों का पनपना मुश्किल होता गया। लगातार गिरती गुणवत्ता और फसल खराब होने से किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। प्रशासनिक देखरेख के घोर अभाव और लगातार उपेक्षा से तंग आकर पीढ़ियों से सिंघाड़ा उगाने वाले माली समाज और स्थानीय कृषकों ने इस काम से पूरी तरह किनारा कर लिया। इसके चलते दर्जनों परिवारों के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया और उनका पारंपरिक रोजगार हमेशा के लिए छिन गया।
स्वाद और बनावट में क्यों बेजोड़ माना जाता था लोरडिया का फल
कृषि विशेषज्ञों और पुराने जानकारों के मुताबिक, लोरडिया तालाब के प्राकृतिक शुद्ध पानी और वहां के तलछट की काली उपजाऊ मिट्टी के अनोखे मिश्रण की वजह से यहां उगने वाले सिंघाड़े का स्वाद बेमिसाल होता था। सामान्य सिंघाड़ों के मुकाबले लोरडिया का सिंघाड़ा मध्यम आकार का होता था, जिसे छीलना बेहद आसान रहता था। इसमें गूदा अधिक मात्रा में निकलता था, जो प्राकृतिक रूप से बेहद मीठा और कुरकुरा होता था। यही खास खूबियां थीं जिनके दम पर पाली के सिंघाड़े की जबर्दस्त मांग सिर्फ स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रही, बल्कि जोधपुर, सिरोही, जालौर और बाड़मेर तक के बाजारों में इसकी जोरदार खपत होती थी। आज भी कई फल विक्रेता अपने ठेलों पर ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए इसी नाम का सहारा लेते हैं।
ब्यावर की आवक से चल रही है दुकानों की साख
लोरडिया तालाब में स्थानीय पैदावार शून्य हो जाने के बावजूद त्योहारी और मौसमी बाजार में सिंघाड़े की मांग कम नहीं हुई है। अपनी साख और वर्षों पुरानी दुकानदारी को जिंदा रखने के लिए स्थानीय व्यापारी अब पड़ोसी जिले ब्यावर और अन्य बाहरी इलाकों के जलाशयों से प्रतिदिन गाड़ियां मंगवा रहे हैं। फल विक्रेताओं का कहना है कि बाहर से माल लाकर बाजार की जरूरत और ग्राहकों की मांग तो पूरी की जा रही है, लेकिन जो स्वाद, कुरकुरापन और खास सौंधापन लोरडिया तालाब की उपज में था, उसकी बराबरी कोई बाहरी फल नहीं कर सकता। यदि स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभाग ने जल्द ही लोरडिया तालाब के जीर्णोद्धार और इसे सीवरेज व प्रदूषण से मुक्त कराने के ठोस कदम नहीं उठाए, तो पाली के सिंघाड़े की यह ऐतिहासिक मिठास हमेशा के लिए सिर्फ किस्सों और चर्चाओं तक ही सिमट कर रह जाएगी।

















