राजस्थान के करौली जिले में स्थित प्रसिद्ध अतिशय क्षेत्र श्री महावीर जी जैन मंदिर के प्रबंधन और स्वामित्व अधिकारों को लेकर श्वेतांबर तथा दिगंबर संप्रदाय के बीच लंबे समय से चली आ रही कानूनी लड़ाई में शीर्ष अदालत ने अपनी सुनवाई पूरी कर ली है। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की दो सदस्यीय पीठ ने इस संवेदनशील मामले पर अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है। अदालत ने मामले से जुड़े श्वेतांबर और दिगंबर दोनों ही पक्षों को निर्देश दिया है कि वे अगले 8 दिनों की समयावधि के भीतर अपनी-अपनी अंतिम लिखित दलीलें कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करें।
धार्मिक भावना और आपसी मुकदमेबाजी पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत की पीठ ने दोनों संप्रदायों के बीच जारी खींचतान पर काफी भावुक और गंभीर रुख अपनाया। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने दोनों पक्षों के आचरण पर सवाल उठाते हुए कहा कि पूरी दुनिया को सत्य, अहिंसा और शांति का मार्ग दिखाने वाले महान संत भगवान महावीर के नाम पर इस प्रकार का अनवरत विवाद खड़ा करना बेहद दुखद है। अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि दोनों पक्षों को यह विचार करना चाहिए कि क्या इस तरह की बेवजह की मुकदमेबाजी और आपसी प्रतिद्वंद्विता से भगवान महावीर प्रसन्न होंगे। पीठ ने यह सवाल भी उठाया कि क्या यह व्यावहारिक या उचित होगा कि सुबह के समय श्वेतांबर संप्रदाय के लोग अपनी परंपरा के अनुसार मंदिर में पूजा-अर्चना करें और शाम होते ही दिगंबर संप्रदाय के लोग भगवान के वस्त्र उतारकर अपनी पद्धति से धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराएं। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि धर्म और जनभावनाएं अत्यंत संवेदनशील विषय हैं, अतः दोनों पक्षों को आपस में बैठकर इस विवाद को यहीं समाप्त करने का प्रयास करना चाहिए।
1991 के पूजा स्थल अधिनियम के प्रयोग पर कानूनी बहस
शीर्ष अदालत के समक्ष हुई बहस का मुख्य केंद्रबिंदु पूजा स्थल अधिनियम 1991 (Places of Worship Act, 1991) की व्याख्या और इस मामले में उसकी प्रासंगिकता रही। याचिकाकर्ता श्वेतांबर पक्ष की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता आर्यमा सुंदरम और प्रतिवादी दिगंबर पक्ष की ओर से उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने अपनी कानूनी दलीलें पेश कीं।
- दिगंबर पक्ष का तर्क: वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने अदालत के समक्ष पक्ष रखते हुए कहा कि यह विवाद मंदिर के धार्मिक स्वरूप या पूजा स्थल के रूपांतरण से जुड़ा हुआ नहीं है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से मंदिर के प्रशासनिक प्रबंधन और ट्रस्ट के संचालन से संबंधित मामला है। इस आधार पर उन्होंने दलील दी कि इस प्रकरण में पूजा स्थल अधिनियम 1991 लागू नहीं होता है और इसका निस्तारण केवल पेश किए गए ऐतिहासिक तथा प्रशासनिक साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।
- श्वेतांबर पक्ष का तर्क: वरिष्ठ वकील आर्यमा सुंदरम ने अपनी दलीलों में कहा कि निचली अदालत ने 1991 के कानून की धारा 4 के प्रावधानों का हवाला देते हुए मुकदमे की कार्यवाही को रोक दिया था। उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि 1991 के अधिनियम के तहत कोई वैधानिक अपील करने का प्रावधान मौजूद नहीं है, इसलिए हाईकोर्ट द्वारा इसके खिलाफ अपील स्वीकार किया जाना कानूनी रूप से उचित नहीं था। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि मंदिर परिसर, मूल प्रतिमा और उससे संलग्न परिसंपत्तियों पर ऐतिहासिक रूप से दिगंबर संप्रदाय का ही प्रबंधन रहा है।
1950 के दशक से वर्तमान तक विवाद का पूरा घटनाक्रम
करौली के इस प्राचीन मंदिर पर प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर छिड़ी यह कानूनी लड़ाई कई दशकों पुरानी है। इस विवाद की शुरुआत राजस्थान सार्वजनिक ट्रस्ट अधिनियम 1959 की धारा 40 के अंतर्गत दायर किए गए एक आवेदन से हुई थी, जिसमें दिगंबर प्रबंध समिति के तत्कालीन अध्यक्ष एवं सचिव को हटाकर श्वेतांबर संप्रदाय के प्रतिनिधियों वाली नई प्रबंध समिति गठित करने का अनुरोध किया गया था।
- वर्ष 1970 का प्रशासनिक आदेश: उप खंड अधिकारी (SDO) ने दिगंबर समिति के विरुद्ध दायर आवेदन को स्वीकार करते हुए आदेश पारित किया था।
- वर्ष 1994 का निचली अदालत का फैसला: ट्रायल कोर्ट ने पूजा स्थल अधिनियम 1991 की धारा 4 को आधार बनाते हुए इस पूरे मामले की विधिक कार्यवाही को निरस्त (Abate) कर दिया था।
- राजस्थान हाईकोर्ट का निर्णय: मामले की सुनवाई करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने माना कि राजस्थान सार्वजनिक ट्रस्ट अधिनियम के तहत दिया गया आदेश एक वैधानिक 'डिक्री' के समान है, इसलिए इसके विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील दायर की जा सकती है।
- सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: हाईकोर्ट के इसी फैसले के खिलाफ दिगंबर प्रबंध समिति ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल की थी, जिस पर अब सुनवाई संपन्न हो चुकी है और अंतिम फैसला आना बाकी है।





















