भीलवाड़ा जिले के ग्रामीण और कृषि इलाकों में गाजर घास का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है, जिससे किसान काफी परेशान हैं। चटक चांदनी और सफेद टोपी के नाम से भी जानी जाने वाली यह विदेशी खरपतवार न केवल फसलों की पैदावार कम कर रही है, बल्कि मवेशियों और इंसानों के स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा बनती जा रही है। खाली जमीनों, खेतों के किनारों और सड़कों के आसपास यह पौधा तेजी से अपने पैर पसार रहा है।
1955 में अमेरिका से भारत आई थी यह खरपतवार
यह खतरनाक पौधा भारत का मूल निवासी नहीं है। वर्ष 1955 में जब अमेरिका से गेहूं का आयात किया गया था, उसी खेप के साथ इस खरपतवार के बीज भारत पहुंचे थे। इसके बाद से यह पौधा पूरे देश के अलग-अलग राज्यों में फैल गया। एक अनुमान के अनुसार, वर्तमान में देश का लगभग 3.5 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र इस घास की चपेट में आ चुका है।
बीजों का तेजी से फैलाव और छोटा जीवन चक्र
गाजर घास की सबसे बड़ी खासियत और समस्या इसका तेजी से होने वाला फैलाव है। इस पौधे का जीवन चक्र केवल तीन से चार महीने का होता है, लेकिन यह साल भर किसी भी मौसम में उगने की क्षमता रखता है। एक अकेला गाजर घास का पौधा लगभग 5 हजार से लेकर 25 हजार तक बेहद बारीक बीज पैदा करता है। ये बीज हवा के तेज झोंकों और बहते पानी के जरिए आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंच जाते हैं। इसी वजह से यदि किसी एक हिस्से में यह खरपतवार उग आती है, तो बहुत जल्द आसपास के पूरे इलाके में फैल जाती है।
फसलों की पैदावार में 40 प्रतिशत तक की गिरावट
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, गाजर घास फसलों के उत्पादन पर बेहद बुरा असर डालती है। इस पौधे में सेस्क्युटरपिन लैक्टोन नाम का एक जहरीला रसायन पाया जाता है। यह केमिकल आसपास उगने वाली मुख्य फसलों की ग्रोथ को रोक देता है और उनकी जड़ों व पत्तियों के विकास को बाधित करता है। जिन खेतों में इस खरपतवार का प्रकोप अत्यधिक हो जाता है, वहां फसल उत्पादन में 40 प्रतिशत तक की भारी गिरावट दर्ज की जाती है। इससे किसानों को हर साल बड़ा आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है।
इंसानों और पशुधन की सेहत पर पड़ रहा बुरा असर
यह खरपतवार केवल फसलों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इंसानों और मवेशियों की सेहत को भी नुकसान पहुंचाती है। जो लोग लगातार इसके संपर्क में आते हैं, उन्हें त्वचा पर एलर्जी, दाने, तेज बुखार और सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इससे अस्थमा के मरीजों की परेशानी बढ़ सकती है। दूसरी ओर, यदि गाय, भैंस या अन्य पशु इसे चर लेते हैं, तो उनके पाचन तंत्र और स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ता है। साथ ही दुधारू पशुओं के दूध का स्वाद कड़वा होने की शिकायत भी सामने आती है।
रोकथाम के जरूरी उपाय और जैविक नियंत्रण
गाजर घास के फैलाव को रोकने के लिए कृषि विशेषज्ञों ने समय रहते कदम उठाने की सलाह दी है। इसे रोकने का सबसे असरदार तरीका यह है कि पौधे में फूल आने से पहले ही इसे जड़ से उखाड़कर नष्ट कर दिया जाए। पौधे को उखाड़ते समय किसानों व आम लोगों को हाथों में दस्ताने और मुंह पर मास्क पहनना अनिवार्य है, ताकि इसके विषैले तत्वों से बचाव हो सके। उखाड़े गए पौधों का निस्तारण सुरक्षित तरीके से करना जरूरी है ताकि बीज दोबारा जमीन में न गिरें। इसके अलावा, कृषि विभाग जैविक नियंत्रण के तहत प्रभावित इलाकों में मैक्सिकन बीटल नामक मित्र कीट छोड़ने की सलाह देता है। यह कीट गाजर घास की पत्तियों को खाकर इसके विकास को रोक देता है, जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना इस पर काबू पाया जा सकता है।



















