उत्तराखंड की राजधानी देहरादून सहित उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में गुर्दे की पथरी यानी किडनी स्टोन के मामलों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। मैदानी और पहाड़ी इलाकों के मध्य स्थित भौगोलिक बनावट, मौसम में आते बदलाव और खान-पान की बदलती शैलियों को इस समस्या का प्रमुख कारण माना जा रहा है। इसके साथ ही क्षेत्र में उपलब्ध पानी की गुणवत्ता और उसमें मौजूद कैल्शियम की अधिकता भी इस बीमारी को बढ़ावा दे रही है। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि जब शरीर में तरल पदार्थों का संतुलन बिगड़ता है और पानी की भारी कमी हो जाती है, तो मूत्र में मौजूद खनिज तत्व एक जगह जमा होने लगते हैं। यही खनिज धीरे-धीरे सूक्ष्म क्रिस्टल का रूप धारण करते हैं और समय बीतने के साथ कठोर पथरी में परिवर्तित हो जाते हैं।
शरीर में पानी की कमी और तरल पदार्थों का सही गणित
गुर्दे को सेहतमंद रखने और पथरी के जोखिम को न्यूनतम करने के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी पीना सबसे बुनियादी और असरदार उपाय माना जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, एक सामान्य वयस्क को रोजाना कम से कम 3 से 4 लीटर पानी अवश्य पीना चाहिए। हालांकि पानी की यह आवश्यक मात्रा प्रत्येक व्यक्ति की उम्र, उसके शारीरिक स्वास्थ्य, दैनिक गतिविधियों और आसपास के मौसम पर भी निर्भर करती है। शरीर में नमी बनाए रखने के लिए सादे पानी के अलावा प्राकृतिक पेय पदार्थों का सहारा लेना बेहद लाभदायक सिद्ध होता है। अपनी दैनिक दिनचर्या में नारियल पानी, ताजा नींबू पानी और फाइबर से भरपूर ताजे फलों के रस को शामिल करना चाहिए। इसके विपरीत, अधिक नमक वाले भोजन, जंक फूड और उच्च ऑक्सलेट की मात्रा वाले खाद्य पदार्थों से परहेज करना बहुत आवश्यक है। यदि किसी व्यक्ति को पेट के निचले हिस्से या कमर में अचानक असहनीय और तेज दर्द का अनुभव हो, तो बिना समय गंवाए विशेषज्ञ डॉक्टर से अपनी जांच करानी चाहिए।
सूक्ष्म क्रिस्टल से लेकर स्टैगहॉर्न कैलकुलस तक के विभिन्न प्रकार
देहरादून में अपनी सेवाएं दे रहे आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. सिराज सिद्दीकी के अनुसार, उनके पास हर महीने गुर्दे की पथरी से पीड़ित बड़ी संख्या में मरीज पहुंचते हैं। इन मरीजों में बहुत छोटे आकार की पथरी से लेकर लगभग 30 एमएम तक की विशाल पथरी के मामले शामिल होते हैं। कुछ बेहद जटिल मामलों में पथरी का आकार काफी बढ़ जाता है और वह किडनी की शाखाओं में फैल जाती है, जिसे चिकित्सा विज्ञान में स्टैगहॉर्न कैलकुलस कहा जाता है। इसके अतिरिक्त, कई रोगियों की गुर्दे में एक साथ अनेक पथरियां पाई जाती हैं, जिससे स्थिति और अधिक गंभीर हो जाती है।
डॉ. सिराज सिद्दीकी ने बताया कि केवल बड़ी पथरियां ही चिंता का विषय नहीं हैं, बल्कि लगभग 2 एमएम आकार वाले माइक्रोलिथ स्टोन भी मरीजों को बहुत परेशान करते हैं। आकार में अत्यधिक छोटे होने के कारण यह माइक्रोलिथ स्टोन कई बार सामान्य अल्ट्रासाउंड जांच में भी स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देते हैं। उत्तर भारत के राज्यों जैसे उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में इस प्रकार के स्वास्थ्य मामले बहुतायत में देखने को मिल रहे हैं, जिसके पीछे स्थानीय जलवायु और खान-पान मुख्य कारक हैं।
ऑक्सलेट और यूरिक एसिड जमा होने की वैज्ञानिक वजहें
चिकित्सीय परीक्षणों में पाया गया है कि मरीजों में सबसे ज्यादा मामले कैल्शियम ऑक्सलेट स्टोन के सामने आते हैं। हम जो रोजाना भोजन करते हैं, उनमें से कई खाद्य पदार्थों में ऑक्सलेट स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहता है। जब कोई व्यक्ति पर्याप्त मात्रा में पानी नहीं पीता, तो मूत्र सांद्र हो जाता है और ऑक्सलेट कैल्शियम के साथ मिलकर क्रिस्टल बनाने लगता है। यही क्रिस्टल आगे चलकर ठोस पथरी का रूप ले लेते हैं।
इसके अलावा, शरीर में यूरिक एसिड का स्तर बढ़ना भी पथरी बनने का एक अन्य प्रमुख कारण है। डॉ. सिराज सिद्दीकी के अनुसार, जो लोग अपनी खुराक में अत्यधिक नॉनवेज या मांसाहारी भोजन शामिल करते हैं और उसके अनुपात में पर्याप्त पानी का सेवन नहीं करते, उनके शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा अनियंत्रित हो जाती है। यूरिक एसिड के यह क्रिस्टल धीरे-धीरे गुर्दे में जमा होने लगते हैं और पथरी के निर्माण की प्रक्रिया को तेज कर देते हैं।
हिमालयन इंस्टीट्यूट की शोध रिपोर्ट के महत्वपूर्ण निष्कर्ष
गुर्दे की पथरी के क्षेत्रीय प्रभाव को समझने के लिए हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज द्वारा एक विस्तृत अध्ययन आयोजित किया गया था। डॉ. सिद्दीकी ने इस शोध के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि यह स्टडी वर्ष 2005 से 2018 के मध्य की गई थी, जिसमें कुल 435 मरीजों के स्वास्थ्य आंकड़ों का गहन विश्लेषण किया गया। इस दीर्घकालिक अध्ययन में यह बात उभरकर सामने आई कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों में किडनी स्टोन की समस्या अधिक पाई जाती है। विशेष रूप से 20 से 40 वर्ष की आयु वर्ग के युवा और वयस्क पुरुष इस बीमारी से सबसे ज्यादा प्रभावित पाए गए।
अनुसंधान में यह बात साफ तौर पर सिद्ध हुई कि शरीर में डिहाइड्रेशन यानी पानी का अवांछित अभाव ही पथरी बनने की प्राथमिक वजह है। शुरुआत में जब पथरी बेहद छोटी होती है, तो मरीज को विशेष लक्षण या दर्द महसूस नहीं होता। लेकिन लगातार अनदेखी करने पर पथरी का आकार धीरे-धीरे बढ़ता चला जाता है, जो अंततः किडनी की कार्यप्रणाली को क्षति पहुंचाता है। यदि सही समय पर उपचार न किया जाए, तो रोगी की स्थिति अत्यंत गंभीर हो सकती है।
घरेलू नुस्खों की सीमाएं और डॉक्टरी परामर्श की अनिवार्यता
शुरुआती दौर में छोटी पथरी के इलाज के लिए हमारे समाज में कई पारंपरिक और घरेलू उपायों का प्रयोग किया जाता रहा है। डॉ. सिद्दीकी के मुताबिक, लोग आमतौर पर पत्थरचट्टा की पत्तियों के अर्क का सेवन करते हैं, गेहूं की दाल का उबला हुआ पानी पीते हैं या भुट्टे के बाल को पानी में उबालकर उसका काढ़ा बनाकर इस्तेमाल करते हैं। हालांकि डॉक्टर यह स्पष्ट करते हैं कि इन नुस्खों को किसी भी स्थिति में वैज्ञानिक डॉक्टरी इलाज का विकल्प नहीं माना जा सकता।
किसी भी प्रकार के घरेलू उपाय को अपनाने से पूर्व किसी योग्य चिकित्सक से परामर्श लेना अत्यंत आवश्यक है। यदि पथरी का आकार 30 एमएम जितना बड़ा हो, कमर या पेट का दर्द लगातार बढ़ रहा हो, या पेशाब करने में किसी प्रकार की रुकावट व तकलीफ महसूस हो रही हो, तो घरेलू नुस्खों के भरोसे घर पर नहीं बैठना चाहिए। ऐसी स्थिति में तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर के पास जाकर अल्ट्रासाउंड और अन्य आवश्यक जांचें करानी चाहिए। समय पर कराया गया सही इलाज ही मरीज को किसी बड़ी चिकित्सीय जटिलता से बचा सकता है।



















