पश्चिमी राजस्थान के कई जिलों में भूमिगत जल के खारेपन और मिट्टी में बढ़ती लवणता के कारण कृषि उत्पादन लगातार प्रभावित हो रहा है। खेतों में लवण की मात्रा बढ़ने से जहां जमीन की प्राकृतिक उर्वरता क्षीण हो रही है, वहीं फसलों की पैदावार में भी निरंतर गिरावट दर्ज की जा रही है। इस गंभीर कृषि समस्या का स्थाई और वैज्ञानिक समाधान तलाशने के लिए कृषि विश्वविद्यालय जोधपुर ने एक बेहद महत्वपूर्ण पहल की है। विश्वविद्यालय ने वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) की ख्यातिप्राप्त प्रयोगशाला केंद्रीय नमक एवं समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान (CSMCRI), भावनगर (गुजरात) के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। शनिवार को संपन्न हुए इस द्विपक्षीय समझौते के बाद पश्चिमी राजस्थान के खारे पानी और अत्यधिक लवणता से प्रभावित कृषि क्षेत्रों में फसलों के संरक्षण और भूमि सुधार को लेकर नए शोध कार्य शुरू किए जाएंगे।
द्विपक्षीय समझौते की मुख्य शर्तें और दूरगामी लक्ष्य
विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित औपचारिक कार्यक्रम के दौरान कृषि विश्वविद्यालय जोधपुर के कुलगुरु प्रोफेसर वीरेंद्र सिंह जैतावत तथा भावनगर संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. डूंगरराम चौधरी ने एमओयू दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर कुलगुरु प्रोफेसर वीरेंद्र सिंह जैतावत ने पश्चिमी राजस्थान के भू-भाग में लवणता की चुनौती को रेखांकित करते हुए कहा कि इसका सबसे प्रतिकूल प्रभाव दलहनी फसलों की खेती और पैदावार पर पड़ रहा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि दोनों प्रतिष्ठित संस्थानों का यह संयुक्त प्रयास स्थानीय किसानों की समस्याओं को हल करने में मील का पत्थर साबित होगा। इस तकनीकी जुड़ाव से जोधपुर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों को अनुसंधान एवं कृषि प्रसार गतिविधियों के लिए न केवल आधुनिक तकनीकी विशेषज्ञता मिलेगी, बल्कि आवश्यक प्रयोगशाला संसाधनों का सहयोग भी प्राप्त होगा।
खारे पानी के शोधन और प्राकृतिक जैव उत्पादों का विकास
अपनी संस्थागत गतिविधियों और उपलब्धियों का ब्योरा देते हुए प्रधान वैज्ञानिक डॉ. डूंगरराम चौधरी ने बताया कि भावनगर प्रयोगशाला समुद्री रसायनों और नमक के विकास, खारे पानी को मीठा बनाने की तकनीकों, बायोडीजल निर्माण, अपशिष्ट जल शोधन तथा समुद्री संसाधनों से जैविक खाद तैयार करने के क्षेत्र में काम कर रही है। इसके साथ ही संस्थान द्वारा पर्यावरण अनुकूल जैव उत्पादों के निर्माण और पर्यावरण प्रबंधन से जुड़ी अनेक शोध परियोजनाएं संचालित की जा रही हैं। जोधपुर कृषि विश्वविद्यालय के साथ इस साझेदारी से भावनगर संस्थान के वर्षों के अनुसंधान, व्यावहारिक अनुभव और उन्नत तकनीकों का सीधा लाभ राजस्थान के कृषि क्षेत्र और किसानों को मिल सकेगा।
शोधार्थियों के लिए सह-मार्गदर्शन और वैज्ञानिक प्रसार
इस ऐतिहासिक समझौते का व्यापक शैक्षणिक लाभ विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों और युवा शोधकर्ताओं को भी मिलेगा। पीएचडी डिग्री कर रहे शोधार्थी अब केंद्रीय संस्थान के वैज्ञानिकों की देखरेख में सह-निर्देशक के रूप में शोध कार्य पूरा कर सकेंगे। इससे छात्रों को उच्चस्तरीय प्रयोगशाला अनुसंधान के साथ-साथ जमीनी स्तर पर व्यावहारिक तकनीकी ज्ञान अर्जित करने का अमूल्य अवसर मिलेगा। इसके साथ ही कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों के अनुप्रयोग, ग्रामीण विकास, युवाओं के कौशल संवर्धन और वैज्ञानिक सोच के प्रसार को नई दिशा मिलने की पूरी संभावना है। इस एमओयू हस्ताक्षर समारोह में कृषि विश्वविद्यालय के निदेशक अनुसंधान डॉ. एम. सुंदरिया सहित विभिन्न संकायों के अधिष्ठाता, निदेशक, वरिष्ठ अधिकारी और कृषि वैज्ञानिक उपस्थित रहे।


















