कोर्ट-कचहरी की भाषा में एक पुरानी कहावत है, जब दो पक्षों के बीच झगड़ा सुलझ नहीं पाता तो लोग कहते हैं अदालत में देख लेंगे. मगर अगर विवाद खुद दो जजों के बीच हो, तो फैसला सुनाने वाली कुर्सी पर बैठा कौन होगा? यही सवाल इन दिनों देश की सबसे ऊंची अदालत के गलियारों में गूंज रहा है, और इसका जवाब ढूंढने की जिम्मेदारी अब चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत के कंधों पर आ गई है.
सीजेआई की जिम्मेदारी और सुनवाई का बुनियादी नियम
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत के लिए यह विवाद सिर्फ एक और फाइल नहीं है, बल्कि मुखिया के तौर पर घर के भीतर की इस लड़ाई को जल्द से जल्द सुलझाना उनकी सीधी जिम्मेदारी बन गई है. इस मामले में उन्हें कानून के उस बुनियादी नियम का पालन करना ही होगा कि कोई भी फैसला सुनाने से पहले दोनों पक्षों को पूरी तरह सुना जाए. देरी और अस्पष्टता दोनों ही इस विवाद को और उलझा सकती हैं, इसलिए जितनी जल्दी एक साफ और निष्पक्ष प्रक्रिया शुरू होगी, उतनी ही जल्दी न्यायपालिका के भीतर की यह खींचतान थमेगी.
चार पत्र और गंभीर आरोपों की फेहरिस्त
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा को लेकर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को लगातार चार पत्र लिखे हैं. इन पत्रों में जस्टिस शर्मा पर कुप्रशासन, दुराचार, पक्षपात और भाई-भतीजावाद जैसे आरोप लगाए गए हैं. इतना ही नहीं, प्रशासनिक शक्तियों के दुरुपयोग और आंतरिक न्यायिक जांच में हस्तक्षेप करने के आरोप भी इन पत्रों का हिस्सा हैं. जिस तरह की भाषा और गंभीरता के साथ ये आरोप सामने आए हैं, उसने न्यायपालिका के भीतर की एक अंदरूनी लड़ाई को आम जनता के बीच चर्चा का विषय बना दिया है. लेकिन यहां एक बुनियादी सिद्धांत को भूलना नहीं चाहिए, चाहे आरोप कितने भी गंभीर क्यों न हों, आरोप लगते ही कोई दोषी करार नहीं दिया जा सकता. आरोप और सजा के बीच जांच और सुनवाई का एक पूरा रास्ता होता है, और उस रास्ते को पार किए बिना किसी नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी होगी.
सीजेआई ने साफ कर दी अपनी लाइन
26 अगस्त को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस पूरे विवाद पर जो बात कही, वह शायद इस मामले की सबसे अहम कसौटी बन सकती है. उनका कहना था कि जस्टिस शर्मा के खिलाफ लगे आरोपों पर सार्वजनिक तौर पर कोई फैसला नहीं सुनाया जा सकता. उन्होंने यह भी जोड़ा कि किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले संबंधित न्यायाधीश को निष्पक्ष अवसर मिलना ही चाहिए, और आगे भी यही रास्ता अपनाया जाना चाहिए. सीजेआई की यह बात दरअसल न्याय की उस बुनियादी शर्त की याद दिलाती है, जिसे अदालतें खुद बार-बार दोहराती आई हैं, हर पक्ष को सुना जाए. अगर किसी जज के खिलाफ शिकायत गंभीर है तो उसकी जांच जरूर हो, अगर किसी आंतरिक समिति की स्वतंत्रता में दखल की बात है तो उसकी भी पड़ताल हो, और प्रशासनिक शक्तियों के दुरुपयोग के आरोपों की भी तह तक जाया जाए. मगर इस पूरी प्रक्रिया में शिकायतकर्ता की बात जितनी अहमियत रखती है, उतनी ही अहमियत आरोपी न्यायाधीश के पक्ष को भी मिलनी चाहिए. न्याय का सिद्धांत यह इजाजत नहीं देता कि पहले शिकायतकर्ता की बात मान ली जाए और आरोपी को बाद में सफाई देने के लिए छोड़ दिया जाए.
दूसरी तरफ से भी आया इनकार
यह कोई मामूली प्रशासनिक टकराव नहीं है, बल्कि इसमें उच्च न्यायपालिका के दो मौजूदा न्यायाधीशों के नाम सीधे तौर पर जुड़े हैं. एक तरफ सुप्रीम कोर्ट के जज हैं, जिन्होंने कई पत्रों के जरिए गंभीर आरोप दर्ज कराए हैं. दूसरी तरफ राजस्थान हाईकोर्ट के जज हैं, जिन्होंने इन सभी आरोपों को पहले ही निराधार करार दे दिया है. जब दोनों पक्षों के दावे इस कदर टकरा रहे हों, तो संस्थागत प्रक्रिया का पालन ही सबसे सुरक्षित और भरोसेमंद रास्ता बचता है. किसी एक पक्ष की बात पर भरोसा कर लेना और दूसरे को नजरअंदाज करना, पूरी व्यवस्था की निष्पक्षता पर ही सवाल खड़ा कर सकता है.
चौथे पत्र में उठा एक नया और नाजुक मुद्दा
जस्टिस मेहता के चौथे पत्र में जो आरोप जोड़े गए हैं, वे मामले को और पेचीदा बनाते हैं. इसमें कहा गया है कि आंतरिक न्यायिक जांच में हस्तक्षेप किया गया और संवेदनशील कार्यवाही की गोपनीयता भंग हुई. अगर यह आरोप सही साबित होता है, तो यह पूरे मामले को कहीं ज्यादा गंभीर बना देगा, क्योंकि किसी भी आंतरिक जांच की साख इसी बात पर टिकी होती है कि जांच समिति कितनी स्वतंत्र है और उसकी कार्यवाही कितनी गोपनीय और निष्पक्ष रहती है. लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही सच है, इन आरोपों की पुष्टि भी बिना उचित प्रक्रिया अपनाए नहीं हो सकती. इसीलिए इस पूरे प्रकरण में जल्दबाजी में कोई राय बना लेना न तो न्यायपालिका के हित में है और न ही न्याय के सिद्धांत के अनुकूल.
कॉलेजियम की सिफारिश, अलग सवाल
इसी घटनाक्रम के बीच 31 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस संजय के अग्रवाल के नाम की सिफारिश राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पद के लिए की है. यह अपने आप में एक बड़ा प्रशासनिक फैसला है, लेकिन इसे जस्टिस शर्मा के खिलाफ लगे आरोपों की सच्चाई से जोड़कर देखना ठीक नहीं होगा. एक प्रशासनिक नियुक्ति अपनी जगह है, और किसी न्यायाधीश पर लगे आरोपों की जांच अपनी जगह, दोनों को अलग-अलग निगाहों से और अलग-अलग प्रक्रियाओं के तहत ही परखा जाना चाहिए. इन्हें आपस में मिलाकर कोई निष्कर्ष निकाल लेना तथ्यों से ज्यादा अटकल पर आधारित होगा.
सुनवाई का सिद्धांत सिर्फ किसी एक के पक्ष में खड़ा होना नहीं
यहां सीजेआई सूर्यकांत के लिए दोनों पक्षों को सुनना केवल किसी व्यक्ति विशेष की तरफदारी करना नहीं, बल्कि उस न्यायिक सिद्धांत को मजबूत करना है, जिसे अदालतें खुद बरसों से दोहराती आई हैं, कोई भी फैसला सुनाने से पहले दोनों पक्षों की बात सुनी जानी चाहिए. एक और अहम पहलू यह है कि जैसे ही किसी जज के खिलाफ आरोप सार्वजनिक होते हैं, उसकी छवि और प्रतिष्ठा को तुरंत नुकसान पहुंचता है. जजों के मामले में यह नुकसान कहीं ज्यादा गंभीर हो जाता है, क्योंकि न्यायपालिका पर जनता का भरोसा सिर्फ उसकी संस्थाओं से नहीं, बल्कि उसमें बैठे हर जज की निजी साख से भी बंधा होता है. इसलिए जांच की पूरी प्रक्रिया कुछ इस तरह होनी चाहिए कि शिकायत करने वाले जज को यह भरोसा हो कि उसकी बात गंभीरता से सुनी गई, और जिस जज पर आरोप लगे हैं, उसे भी यह यकीन हो कि उसके साथ इंसाफ हुआ.
पूरे न्यायिक तंत्र की साख दांव पर
इस विवाद में सबसे ज्यादा नुकसान किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरी न्यायपालिका की सामूहिक छवि का होने का खतरा है. आम जनता के लिए सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट अलग-अलग व्यक्तियों के जमावड़े नहीं, बल्कि एक ही न्याय-व्यवस्था के दो स्तंभ हैं. जब इसी व्यवस्था के भीतर बैठे वरिष्ठ न्यायाधीश सरेआम एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगाते नजर आते हैं, तो स्वाभाविक तौर पर आम आदमी के मन में यह सवाल उठता है कि जब जज ही आपस में उलझ जाएं, तो इंसाफ की उम्मीद आखिर किससे की जाए. यही वजह है कि सीजेआई सूर्यकांत के सामने यह मौका है कि वे इस पूरे विवाद को पारदर्शी, निष्पक्ष और तेज प्रक्रिया के जरिए ऐसे अंजाम तक पहुंचाएं, जिससे न सिर्फ दोनों पक्षों को इंसाफ मिले, बल्कि आम नागरिक का अदालतों पर भरोसा भी बरकरार रहे.



















