राजस्थान के राजनीतिक गलियारों में इस समय नगरीय निकाय चुनावों को लेकर सरगर्मियां चरम पर हैं। भले ही यह स्थानीय स्तर का मतदान है, लेकिन इसके परिणाम राज्य की राजनीति पर दीर्घकालिक प्रभाव डालने वाले माने जा रहे हैं। राज्य में वर्तमान भजनलाल शर्मा सरकार अपना आधा कार्यकाल पूरा कर चुकी है। सत्ता की बागडोर संभालने के बाद मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के लिए यह पहला ऐसा चुनाव है जिसमें पूरे प्रदेश की प्रत्यक्ष भागीदारी हो रही है। यही वजह है कि राजनीतिक विश्लेषक इन चुनावों को मुख्यमंत्री की नेतृत्व क्षमता और सरकार के कामकाज पर जनता की मोहर के तौर पर देख रहे हैं। इन चुनावी नतीजों का असर न केवल ढाई साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव और उसके बाद आने वाले लोकसभा चुनाव पर पड़ेगा, बल्कि राज्य में आगामी महीनों में प्रस्तावित पंचायती राज चुनावों पर भी इसका सीधा असर देखने को मिलेगा।
भजनलाल शर्मा सरकार के आधा कार्यकाल और नेतृत्व का परीक्षण
राजस्थान में वर्ष 2023 के अंत में जब बीजेपी सत्ता में वापस आई, तो केंद्रीय नेतृत्व ने नए चेहरों पर दांव खेलते हुए सभी को चौंका दिया था। पहली बार विधायक बने भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। किसी भी गुटबाजी से दूर रहने वाले और बेदाग छवि वाले भजनलाल शर्मा पर भरोसा जताते हुए पार्टी ने पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे जैसे अनुभवी और दिग्गज नेताओं को दरकिनार कर दिया था। ऐसा ही प्रयोग मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी दोहराया गया था। इस अप्रत्याशित फैसले के बाद अब समय आ गया है जब मुख्यमंत्री को अपनी प्रशासनिक पकड़ और जनाधार को साबित करना होगा। यह चुनाव तय करेंगे कि केंद्रीय नेतृत्व ने जिस भरोसे के साथ उन्हें राज्य की कमान सौंपी थी, वे उस पर कितने खरे उतरे हैं। सरकार के ढाई साल पूरे होने के बाद यह पहला अवसर है जब राज्य की जनता सीधे तौर पर सरकार की नीतियों और कामकाज पर अपना फैसला सुनाएगी।
संगठन की शीर्ष रणनीति और उत्तर प्रदेश चुनाव से संबंध
बीजेपी इस चुनाव को किसी भी स्थिति में हलके में लेने के मूड में नहीं है। पार्टी नेतृत्व जानता है कि स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजे जनता के मूड को दर्शाते हैं। इसलिए इसे केवल एक स्थानीय चुनाव न मानकर शीर्ष स्तर से रणनीति बनाई जा रही है। स्वयं मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा चुनाव मैदान में उतरकर लगातार रोड शो कर रहे हैं और स्टार प्रचारक के रूप में पार्टी प्रत्याशियों के लिए माहौल तैयार कर रहे हैं। वहीं सांगठनिक स्तर पर बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष ने खुद जयपुर पहुंचकर चुनावी बागडोर अपने हाथों में संभाल ली है। इस चुनाव का एक बड़ा राजनीतिक पहलू पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश से भी जुड़ा हुआ है। उत्तर प्रदेश में कुछ समय बाद विधानसभा चुनाव होने हैं और दोनों ही राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं। राजस्थान का यह चुनाव बीजेपी के लिए एक अनुकूल राजनीतिक वातावरण और नैरेटिव तैयार करने का काम करेगा। यही कारण है कि शीर्ष नेतृत्व से लेकर निचले स्तर के कार्यकर्ताओं तक एक मजबूत रणनीति पर काम किया जा रहा है।
जयपुर में मैराथन बैठकें और बागियों की चुनौती
चुनाव की घोषणा के बाद से ही बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के भीतर उठी बगावत की लहर बनी हुई है। नामांकन वापस लेने की अंतिम तिथि बीत जाने के बाद भी राज्य के विभिन्न निकायों में बड़ी संख्या में बागी प्रत्याशी मैदान में डटे हुए हैं। यद्यपि ये बागी प्रत्याशी खुद जीत पाएं या न जीत पाएं, लेकिन वे पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवारों के वोटों में सेंध लगाकर चुनावी गणित को बिगाड़ सकते हैं। इस आंतरिक कलह को काबू में करने और चुनावी तैयारियों का जायजा लेने के लिए बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष ने जयपुर स्थित पार्टी मुख्यालय में मैराथन समीक्षा बैठकें कीं। उन्होंने संभागवार नेताओं से सीधा संवाद स्थापित किया और नामांकन से लेकर बगावत तक के हर एक पहलू पर विस्तृत रिपोर्ट ली। राज्य की डबल इंजन सरकार को ट्रिपल इंजन सरकार में बदलने के उद्देश्य से बुलाई गई इस उच्चस्तरीय बैठक में बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़, राष्ट्रीय महामंत्री हरीश द्विवेदी और संगठन महामंत्री अजेय कुमार सहित चुनाव संचालन समिति के वरिष्ठ सदस्य उपस्थित रहे।
2024 के लोकसभा चुनाव परिणाम और हालिया उपचुनाव
राजस्थान की राजनीति का इतिहास रहा है कि वहां हर पांच साल में सरकार बदलने की परंपरा रही है। साल 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को शिकस्त देकर बीजेपी सत्ता में तो आ गई, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों में पार्टी को बड़ा झटका लगा। इससे पहले वर्ष 2014 और 2019 के आम चुनावों में बीजेपी ने राज्य की सभी 25 संसदीय सीटों पर एकतरफा जीत दर्ज की थी, जबकि कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला था। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के हाथ से 11 सीटें निकल गईं और वह केवल 14 सीटों पर सिमट गई। इस परिणाम ने जहाँ कांग्रेस को नई ऊर्जा दी, वहीं बीजेपी को सतर्क मोड में ला दिया। लोकसभा चुनाव के बाद रिक्त हुई सात विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनावों में बीजेपी ने अपना दबदबा बनाए रखा, लेकिन इसके बाद पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के प्रभाव वाले क्षेत्र की अंता विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में बीजेपी को पराजय का सामना करना पड़ा। इस हार ने पार्टी संगठन को अपनी जमीनी रणनीति पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर किया।
विपक्ष के निशाने पर सरकार: प्रशासक, परिसीमन और नीट का मुद्दा
स्थानीय निकायों और पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल पूरा होने के बाद सरकार ने वहां तुरंत चुनाव कराने के बजाय सरकारी अधिकारियों को प्रशासक नियुक्त कर दिया था। शहरी निकायों और पंचायतों की कमान पूरी तरह से सरकारी मशीनरी के हाथों में सौंपे जाने को विपक्षी दल कांग्रेस ने बड़ा मुद्दा बनाया और सरकार पर लोकतंत्र को कमजोर करने का आरोप लगाया। इसके अतिरिक्त, कांग्रेस ने नगरीय निकायों के परिसीमन और नीट पेपर लीक के मामलों को लेकर भी सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाया। ये मुद्दे स्थानीय स्तर पर सरकार के लिए गले की फांस बनते दिखे। विपक्ष इन मुद्दों के सहारे जनता के बीच यह संदेश देने में सफल रहा कि सरकार चुनाव कराने से बच रही है। इन प्रशासनिक चुनौतियों और विपक्षी घेराबंदी से पार पाना मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और बीजेपी संगठन के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित हो रहा है।
ओबीसी आरक्षण विवाद, हाईकोर्ट का रुख और बीजेपी का संकल्प पत्र
स्थानीय चुनाव में देरी के पीछे सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया था कि जब तक राज्य का अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं कर देता, तब तक चुनाव कराना इस वर्ग के साथ अन्याय होगा। सरकार का कहना था कि बिना अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण का निर्धारण किए चुनाव प्रक्रिया पूरी नहीं की जा सकती। यह मामला अंततः राजस्थान उच्च न्यायालय की चौखट तक पहुँचा। उच्च न्यायालय द्वारा जारी कड़े दिशा-निर्देशों के बाद आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिससे निकाय चुनाव कराए जाने का मार्ग प्रशस्त हुआ। हालांकि, अदालती प्रक्रिया के दौरान कांग्रेस राजनीतिक माहौल को अपने पक्ष में मोड़ने में काफी हद तक सफल रही। अब चुनाव की राह साफ होने के बाद बीजेपी ने स्थानीय निकाय चुनावों के लिए एक विस्तृत घोषणा-पत्र जारी किया है, जिसमें शहरी विकास, बुनियादी सुविधाओं के विस्तार और नागरिक सेवाओं को बेहतर बनाने के बड़े वादे किए गए हैं। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा शुरुआती चरण से ही मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए धुआंधार प्रचार में जुटे हैं।



















