वैश्विक स्तर पर बढ़ते सामरिक तनाव और बदलते रणनीतिक परिदृश्य के बीच भारत ने अपनी हवाई सुरक्षा को नया सुरक्षा कवच प्रदान करने की कवायद तेज कर दी है। भारत सरकार ने रूस से S-400 ट्रायम्फ एयर डिफेंस सिस्टम की 5 अतिरिक्त इकाइयों की खरीद प्रक्रिया को गति दी है। रूस ने इस संबंध में भारत को बिल ऑफ क्वांटिटीज (BOQ) प्रस्ताव सौंपा है, जिसमें सिस्टम की तैनाती, निर्माण और सामग्री से जुड़ी लागतों का पूरा विवरण शामिल है। इस प्रस्ताव के मिलने से दोनों देशों के बीच मूल्य वार्ता का दौर शुरू होने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।
दुनिया में इस समय दोहरे मोर्चे पर सैन्य तैयारियां चल रही हैं। एक ओर लड़ाकू विमान, मिसाइलें, तोपखाने और ड्रोन विकसित कर आक्रामक क्षमताएं बढ़ाई जा रही हैं, तो दूसरी ओर एयर डिफेंस और एंटी-मिसाइल प्रणालियों को मजबूत कर सुरक्षात्मक ढांचा तैयार किया जा रहा है। भारत इन दोनों मोर्चों पर एक साथ काम कर रहा है। मिसाइल तकनीक में आत्मनिर्भरता हासिल करने के बाद अब भारत अपनी वायु रक्षा प्रणाली को रूस से आयातित और स्वदेशी प्रणालियों के मिश्रण से अभेद्य बना रहा है।
खरीद प्रक्रिया और 2018 के मूल समझौते का ढांचा
भारत ने वर्ष 2018 में रूस के साथ लगभग 5.43 अरब डॉलर की लागत से 5 S-400 स्क्वाड्रन खरीदने का ऐतिहासिक करार किया था। इस सौदे के तहत 4 इकाइयां पहले ही भारतीय वायुसेना में शामिल की जा चुकी हैं और चालू वर्ष के नवंबर या दिसंबर माह तक 5वीं तथा अंतिम इकाई भी भारत पहुंचने की पूरी संभावना है। अब रक्षा मंत्रालय 5 और स्क्वाड्रन की खरीद पर गंभीरता से विचार कर रहा है।
आगामी प्रक्रिया के तहत दोनों देशों के प्रतिनिधियों द्वारा लागत प्रस्ताव पर विस्तृत समीक्षा की जाएगी। मूल्य वार्ता संपन्न होने और वित्त मंत्रालय से बजटीय मंजूरी मिलने के बाद इस सौदे को अंतिम स्वीकृति के लिए सुरक्षा संबंधी कैबिनेट समिति (CCS) के समक्ष रखा जाएगा। इसके बाद ही औपचारिक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए जाएंगे।
ऑपरेशन सिंदूर में S-400 का व्यावहारिक प्रदर्शन
S-400 की नई इकाइयों को खरीदने का निर्णय मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इसके शानदार प्रदर्शन से प्रेरित है। इस सैन्य कार्रवाई के दौरान भारतीय वायु रक्षा नेटवर्क में S-400 ने बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। प्रणाली की लंबी दूरी की मिसाइल ने पाकिस्तान की सीमा के भीतर लगभग 314 किलोमीटर गहराई में स्थित एक एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल विमान को सफलतापूर्वक निशाना बनाया था।
इसके अतिरिक्त, जब पाकिस्तानी पक्ष की ओर से S-400 तैनात भारतीय एयरबेस को कामिकाजी ड्रोन से निशाना बनाने का प्रयास किया गया, तो भारत के एकीकृत एयर डिफेंस तंत्र ने उन हमलों को विफल कर दिया। S-400 प्रणाली ने दुश्मन के लड़ाकू विमानों को भारतीय सीमा के करीब आने से पूरी तरह रोके रखा, जिससे भारत को स्पष्ट रणनीतिक बढ़त हासिल हुई।
दोहरे मोर्चे की चुनौतियां और रणनीतिक आवश्यकताएं
क्षेत्रीय सुरक्षा परिदृश्य को देखते हुए भारत के लिए टू-फ्रंट वॉर की तैयारी बनाए रखना अनिवार्य है। चीन ने हाल ही में तिब्बत के रणनीतिक पठारी इलाकों में अपने पांचवीं पीढ़ी के J-20 स्टील्थ लड़ाकू विमानों की तैनाती बढ़ाई है और हाइपरसोनिक मिसाइलों का बेड़ा तैयार किया है। दूसरी ओर, पाकिस्तान अपनी सैन्य जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर चीनी हथियारों पर निर्भर है।
S-400 प्रणाली न केवल पारंपरिक लड़ाकू विमानों और ड्रोन को नष्ट करने में सक्षम है, बल्कि यह हाइपरसोनिक खतरों को भी हवा में ही बेअसर कर सकती है। इसी वजह से अपनी सीमावर्ती सुरक्षा को अपग्रेड करने के लिए भारत इन अतिरिक्त 5 इकाइयों की खरीद को प्राथमिकता दे रहा है।
Su-57 फाइटर जेट का प्रस्ताव और द्विपक्षीय बातचीत
S-400 के अतिरिक्त, रूस ने भारत को अपने पांचवीं पीढ़ी के Su-57 लड़ाकू विमानों की आपूर्ति का प्रस्ताव भी दिया है। भारतीय वायुसेना ने रूसी प्रस्ताव में रुचि अवश्य दिखाई है, लेकिन भारत सरकार ने अभी दो स्क्वाड्रन Su-57 खरीदने के विषय पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है। तिब्बत में चीनी J-20 विमानों की मौजूदगी भारतीय रक्षा विश्लेषकों के लिए निरंतर चिंता का विषय बनी हुई है।
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का 11 से 13 सितंबर के बीच दिल्ली में आयोजित होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान भारत आने का कार्यक्रम प्रस्तावित है। इस शीर्ष स्तरीय यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग, विशेष रूप से हाइपरसोनिक मिसाइल प्रौद्योगिकी और उन्नत रणनीतिक प्रणालियों के सह-विकास पर दूरगामी निर्णय लिए जाने की उम्मीद है।



















