राजस्थान के विभिन्न नगर निकायों में अध्यक्ष, सभापति और मेयर पदों के चुनाव की उल्टी गिनती शुरू होते ही राजनीतिक दलों का पूरा ध्यान अपने पार्षदों को एकजुट रखने पर टिक गया है। मतदान की तारीख 21 सितंबर तय है, लेकिन मतदान कक्ष तक पहुंचने से पहले की सियासी जंग होटलों, रिसॉर्ट्स और गुप्त ठिकानों पर लड़ी जा रही है। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही दलों ने अपने चुने हुए जनप्रतिनिधियों को सुरक्षित कैंपों में भेज दिया है। इन जगहों पर सुरक्षा व्यवस्था इतनी कड़ी कर दी गई है कि किसी भी बाहरी व्यक्ति या विरोधी दल के नेताओं का संपर्क पार्षदों से न हो सके। स्थानीय निकायों में बहुमत का फासला बेहद कम होने के कारण एक भी सदस्य का इधर-उधर होना पूरे बोर्ड के समीकरण को पलट सकता है।
जयपुर में बहुमत के बावजूद जोखिम टालने की रणनीति
राजधानी जयपुर नगर निगम में संख्याबल का गणित साफ तौर पर बीजेपी के पक्ष में दिखाई दे रहा है, फिर भी संगठन कोई ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है। जयपुर के 150 सदस्यीय निगम बोर्ड में बीजेपी के पास 78 पार्षद हैं, जबकि कांग्रेस के 57 और 15 निर्दलीय सदस्य जीतकर आए हैं। पूर्ण बहुमत का आंकड़ा छूने के बाद भी पार्टी ने अपने सभी 78 पार्षदों और कुछ समर्थक निर्दलीयों को अजमेर के गंज थाना क्षेत्र में पुष्कर रोड खरखेड़ी स्थित एक होटल में ठहराया है। बीजेपी ने मेयर पद के लिए सुनील कोठारी को अपना आधिकारिक उम्मीदवार बनाया है। नामांकन प्रक्रिया संपन्न होने के बाद अब मुख्य चुनौती मतदान के दिन इन सभी वोटों को एक साथ ईवीएम या मतपेटी तक सुरक्षित पहुंचाने की है। पार्टी रणनीतिकारों का मानना है कि मतदान के क्षण तक संख्या को सुरक्षित रखना ही जीत की वास्तविक गारंटी है।
संगरिया में बाड़ेबंदी के बीच पंजाब पहुंची पुलिस
हनुमानगढ़ जिले की संगरिया नगरपालिका में पार्षदों की घेराबंदी का मामला सिर्फ राजनीतिक रस्साकशी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रशासनिक और कानूनी विवाद में तब्दील हो गया। कांग्रेस खेमे में मौजूद दो पार्षदों, ओमप्रकाश स्वामी और साहिल स्वामी के कथित अपहरण की शिकायत दर्ज होने के बाद संगरिया पुलिस जांच करते हुए पंजाब पहुंच गई। पंजाब में कांग्रेस कैंप पर पुलिस की मौजूदगी को लेकर विधायक अभिमन्यु पूनिया और पुलिस दल के बीच तीखी नोकझोंक हुई। विधायक ने सत्ता पक्ष पर सरकारी मशीनरी और पुलिस का दुरुपयोग कर पार्षदों पर दबाव बनाने का आरोप लगाया। हालांकि, जब पुलिस अधिकारियों ने मौके पर दोनों पार्षदों से सीधे पूछताछ की, तो उन्होंने किसी भी तरह के अपहरण से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि वे अपनी मर्जी से पंजाब आए हैं। इसके बाद पुलिस टीम वापस लौट गई, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो सामने आने के बाद सियासी तापमान काफी बढ़ गया है।
निर्दलीय पार्षदों की भूमिका बनी सबसे अहम
इस चुनाव में सबसे ज्यादा दबाव और हलचल उन निकायों में देखी जा रही है जहां किसी भी पार्टी को अपने दम पर स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। कई जगह बीजेपी और कांग्रेस के बीच अंतर महज दो से तीन सीटों का है। ऐसी स्थिति में 15 निर्दलीय पार्षदों का रुख बोर्ड बनाने या गिराने में पूरी तरह निर्णायक साबित होगा। दोनों ही दल इन निर्दलीय सदस्यों को साधने के लिए लगातार संपर्क बनाए हुए हैं। फोन कॉल्स से लेकर गुप्त मुलाकातों तक हर स्तर पर बातचीत की जा रही है, ताकि 21 सितंबर को मतदान के वक्त आवश्यक संख्याबल जुटाया जा सके।
जोधपुर में उम्मीदवार तय होने के बाद जोड़-तोड़ की तैयारी
जोधपुर नगर निगम में भी महापौर पद को लेकर स्थिति अब स्पष्ट हो चुकी है। कई दौर के आंतरिक विचार-विमर्श और मंथन के बाद बीजेपी ने प्रसन्न चंद मेहता को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है। चेहरे का फैसला होने के बाद अब स्थानीय संगठन का पूरा ध्यान पार्षदों को लामबंद करने और क्रॉस वोटिंग की किसी भी संभावना को रोकने पर केंद्रित हो गया है। जोधपुर में भी निर्दलीय और असंतुष्ट पार्षदों के रुख को भांपते हुए विशेष रणनीति पर काम किया जा रहा है।
मतदान तक हर हलचल पर टिकी नजरें
नामांकन पत्रों की जांच और नाम वापसी का चरण खत्म होने के बाद अब चुनावी प्रक्रिया अपने अंतिम और सबसे संवेदनशील दौर में प्रवेश कर चुकी है। राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी परीक्षा यह सुनिश्चित करना है कि उनके समर्थक पार्षद 21 सितंबर को मतदान केंद्र तक पार्टी लाइन पर ही रहें। यही कारण है कि जिन होटलों में बाड़ेबंदी की गई है, वे राजस्थान की स्थानीय राजनीति के प्रमुख शक्ति केंद्र बन गए हैं। मतदान के दिन तक हर आवाजाही, नए समर्थन की घोषणा और खेमेबंदी की मजबूती ही यह तय करेगी कि किस शहर में किस दल का बोर्ड बनेगा।




















