मानसून के विदा होने के बाद राजस्थान के ग्रामीण अंचलों में जल संकट और संभावित अकाल को लेकर चिंताएं गहराने लगी हैं। खेतों में सिंचाई के पानी के अभाव के साथ ही आने वाले महीनों में ग्रामीणों के सामने रोजी-रोटी, पशुधन के लिए चारे और बस्तियों में पेयजल की गंभीर समस्या पैदा होने का अंदेशा बढ़ गया है। इन उभरते हालातों के बीच पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राज्य सरकार को सतर्क करते हुए सुझाव दिया है कि संकट के विकराल होने का इंतजार करने के बजाय अभी से एक पुख्ता आकस्मिक कार्ययोजना तैयार कर उसे धरातल पर उतारा जाना चाहिए।
राजधानी जयपुर में अपनी बात रखते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि प्रशासन को कम बारिश के चलते पैदा हो रही इस परिस्थिति को अत्यधिक गंभीरता से लेना होगा। उन्होंने रेखांकित किया कि यह मामला सिर्फ वर्षा की कमी या खराब होती फसलों तक सीमित नहीं रहता। जब खेतों में बुवाई और कटाई की गतिविधियां रुक जाती हैं, तो ग्रामीण दिहाड़ी मजदूरों के सामने जीवनयापन का प्रत्यक्ष संकट खड़ा हो जाता है। फसलों के बर्बाद होने से किसानों की घरेलू कमाई गिरती है, घास और चारे के अभाव में मवेशी संकट में आ जाते हैं, तथा दूर-दराज के गांवों और ढाणियों में पीने के साफ पानी की मांग अचानक बढ़ जाती है।
ग्रामीण इलाकों में आजीविका और रोजगार की सुरक्षा
अशोक गहलोत ने इस बात पर विशेष बल दिया कि जब भी कोई क्षेत्र सूखे या अकाल की चपेट में आता है, तो उसकी पहली और सबसे भीषण चोट उन निर्धन परिवारों पर पड़ती है जो पूरी तरह कृषि कार्यों और दैनिक मजदूरी पर आश्रित होते हैं। अगर खेतों में काम उपलब्ध नहीं होगा तो मजदूर परिवार अपनी बुनियादी जरूरतें कैसे पूरी करेंगे, इस सवाल पर शासन को तत्काल योजना बनानी चाहिए।
उन्होंने पुरानी व्यवस्थाओं का उल्लेख करते हुए बताया कि पहले ग्रामीण क्षेत्रों में काम पाने का एक मजबूत कानूनी अधिकार मौजूद था। उसके तहत मांग करने पर रोजगार देना अनिवार्य होता था और काम न मिलने की दशा में बेरोजगारी भत्ते अथवा मुआवजे की वैधानिक व्यवस्था थी। पूर्व मुख्यमंत्री के अनुसार वर्तमान में रोजगार के अवसर सृजित करने और काम उपलब्ध कराने का निर्णय पूरी तरह राज्य सरकारों की इच्छाशक्ति और प्रबंधन पर निर्भर हो चुका है। ऐसी स्थिति में उन्होंने प्रशासन को परामर्श दिया कि बिना किसी विलंब के ग्रामीण रोजगार के नए केंद्र और राहत कार्य शुरू करने की रूपरेखा तैयार की जाए।
पीने के पानी और पशुधन के लिए चारे का अग्रिम प्रबंधन
सूखे के व्यापक दुष्प्रभावों का विश्लेषण करते हुए अशोक गहलोत ने कहा कि प्राकृतिक आपदा का असर सिर्फ इंसानी आबादी तक सीमित नहीं रहता। जब ग्रामीण बस्तियों और ढाणियों के पारंपरिक जलस्रोत सूख जाते हैं, तब पशुधन के सामने जीवन-मरण का सवाल खड़ा हो जाता है। इसलिए समय की मांग है कि इंसानों के साथ-साथ मवेशियों के लिए भी पीने के पानी की वैकल्पिक व्यवस्था तुरंत सुनिश्चित की जाए। इसके साथ ही मवेशियों को भुखमरी से बचाने के लिए चारा डिपो और चारे के सुचारु परिवहन का अग्रिम प्रबंध आवश्यक है।
उन्होंने अतीत का स्मरण कराते हुए कहा कि राजस्थान का इतिहास अकाल और सूखे से जूझने का रहा है। हालांकि बीते कुछ दशकों में ट्यूबवेल, हैंडपंप और नियमित रोजगार अभियानों के विस्तार के चलते आम जनता को अकाल की पुरानी तबाही की चुभन उतनी तीव्रता से महसूस नहीं हुई। यही वजह है कि नई पीढ़ी शायद उस भयावह दौर की विभीषिका को पूरी तरह भूल चुकी है। गहलोत ने चेताया कि पुराने दौर जैसी चरम परिस्थितियां पैदा होने का इंतजार करना बेहद नुकसानदेह साबित हो सकता है, इसलिए पहले से मुस्तैद रहना ही समझदारी है।
बाड़मेर की प्रशासनिक सुस्ती का उदाहरण और जमीनी राहत
राहत कार्यों के अमल में आने वाली प्रशासनिक लेटलतीफी पर सवाल उठाते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने बाड़मेर जिले के हालिया घटनाक्रम का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री ने बाड़मेर क्षेत्र के लिए सहायता की घोषणा तो कर दी, लेकिन घोषणा के तीन दिन बीत जाने के बाद भी संबंधित आदेश जिला कलेक्टर के कार्यालय तक नहीं पहुंच पाए थे।
गहलोत ने सवाल उठाया कि अगर शीर्ष स्तर से की गई घोषणाओं के औपचारिक आदेश निचले प्रशासनिक तंत्र तक पहुंचने में ही इतना लंबा समय लगेगा, तो सूखे जैसी आपात स्थिति का समयबद्ध मुकाबला कैसे संभव होगा। उनके अनुसार असली मुद्दा कागजी घोषणाओं का नहीं, बल्कि घोषणा के बाद पीड़ित व्यक्ति तक वास्तविक सहायता पहुंचने में लगने वाले समय का है। किसी भी आपदा पीड़ित परिवार के लिए कागजी बयानों के बजाय यह मायने रखता है कि उनके दरवाजे तक पानी का टैंकर किस दिन पहुंचा, पशुओं के लिए चारा कब उपलब्ध हुआ, मजदूरी का नकद भुगतान कब मिला और स्वीकृत राहत राशि उनके हाथों में कब पहुंची।
किसानों के कर्ज माफ करने और आर्थिक संबल देने की मांग
सूखे की मार झेल रहे काश्तकारों की दयनीय स्थिति का हवाला देते हुए अशोक गहलोत ने सरकार से किसानों के कर्ज माफ करने का कदम उठाने की सिफारिश की। अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल के अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि उस दौरान उनकी सरकार ने किसानों के 14 हजार करोड़ रुपए के कर्ज माफ कर उन्हें संबल दिया था।
उनका तर्क है कि अकाल का दुष्प्रभाव केवल एक चालू फसल के नष्ट होने तक सीमित नहीं रहता। फसल खराब होते ही किसान की पूंजी समाप्त हो जाती है और उसके ऊपर बैंक व साहूकारों के कर्ज चुकाने का भारी दबाव बन जाता है, जबकि दूसरी ओर अगली बुवाई के लिए बीज व खाद जुटाने की चुनौती भी खड़ी होती है। इस दोहरे संकट से उबारने के लिए किसानों को तात्कालिक नकद राहत देने के साथ-साथ उनकी पूरी आर्थिक स्थिति को स्थिरता प्रदान करना अनिवार्य है।
जमीनी हकीकत परखने सूखा प्रभावित क्षेत्रों में उतरेंगे कार्यकर्ता
पूर्व मुख्यमंत्री ने जानकारी दी कि सूखे के वास्तविक प्रभाव और सरकारी मशीनरी की मुस्तैदी की पड़ताल करने के लिए कांग्रेस के ब्लॉक, जिला और प्रदेश स्तर के पदाधिकारी प्रभावित क्षेत्रों का सघन दौरा करेंगे। इस अभियान के तहत कार्यकर्ता यह जांचेंगे कि प्रशासन ने राहत परियोजनाएं शुरू की हैं या नहीं, निर्धन परिवारों को तय समय पर इमदाद मिल पा रही है या नहीं, श्रमिकों को उनकी मजदूरी का समय पर भुगतान हो रहा है या नहीं, तथा गांवों में चारे और पेयजल की वास्तविक स्थिति क्या है।
गहलोत ने कहा कि उनकी पार्टी के पास दशकों से अकाल राहत कार्यों में सक्रिय रहने का संगठनात्मक अनुभव है। पूर्व के वर्षों में भी जब अकाल पड़ा, तब जिला स्तर की कमेटियों को अकाल राहत समितियों और प्रादेशिक ढांचे को प्रदेश अकाल राहत समिति के रूप में मैदान में उतारा जाता रहा है। उन्होंने सरकार से मांग की कि वह समय गंवाए बिना यह तय करे कि किन क्षेत्रों में रोजगार के काम तुरंत खोले जाने हैं, कहां चारा डिपो स्थापित करने हैं, किन ढाणियों में टैंकरों से पानी पहुंचाना है और किसानों को किस तरह वित्तीय सहायता दी जानी है। गहलोत ने दोहराया कि संकट जब भयावह रूप ले ले तब कदम उठाने के बजाय उसके शुरुआती संकेत मिलते ही पूरी तैयारी करना ही बेहतर शासन का प्रमाण है।




















