बुंदेलखंड के चित्रकूट अंचल में लंबे समय से कृषि को कम मुनाफे वाला पेशा मानकर कई ग्रामीण आजीविका की तलाश में दूसरे शहरों की तरफ रुख करते रहे हैं। पथरीली जमीन और पानी की कमी के चलते खेतों को छोड़कर बाहर काम ढूंढना कई परिवारों की मजबूरी बन चुका था। हालांकि, इसी क्षेत्र में कुछ ऐसे जागरूक किसान भी मौजूद हैं जिन्होंने परंपरागत तौर-तरीकों से आगे बढ़कर जमीन की ताकत को पहचाना है। आधुनिक सोच, प्राकृतिक खाद और मूल्यवान फसलों के तालमेल से इन काश्तकारों ने न सिर्फ खेती को आत्मनिर्भर बनाया है, बल्कि हर साल लाखों रुपये की आमदनी अर्जित कर अन्य ग्रामीणों के सामने भी एक मजबूत विकल्प खड़ा किया है।
शिक्षक से सफल बागवान बने नत्थूराम का मॉडल
कर्वी तहसील अंतर्गत बैहार गांव के निवासी नत्थूराम सेवानिवृत्त शिक्षक हैं। उन्होंने सेवाकाल समाप्त होने के उपरांत वर्ष 2022 में प्राकृतिक तरीकों से खेती की शुरुआत की। शुरुआती दौर में उन्होंने अपने खेत में मूली उगाने का निर्णय लिया। जब इस पहली कोशिश से उत्साहजनक लाभ प्राप्त हुआ, तो उन्होंने अपनी रणनीति का दायरा बढ़ा दिया। वर्तमान में वह रबी और खरीफ के प्रमुख खाद्यान्नों के साथ-साथ मौसमी फल और हरी सब्जियों का व्यापक स्तर पर उत्पादन कर रहे हैं। कुल 18 बीघे रकबे में फैली उनकी इस खेती और फलदार बागवानी से उन्हें हर वर्ष 4 से 5 लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा मिल रहा है।
कोठारी सिंह पटेल: खुद तैयार की जैविक खाद, बदली लागत
मानिकपुर तहसील के ग्राम बरहट के रहने वाले किसान कोठारी सिंह पटेल ने वर्ष 2023 से रासायनिक खादों का प्रयोग छोड़कर जैविक पद्धतियों को अपनाया। वह अपने खेतों में धान, अरहर और ज्वार जैसी प्रमुख फसलों की बुवाई करते हैं। कोठारी सिंह पटेल बाजार से महंगे रसायन खरीदने के बजाय अपने घर पर ही देशी खाद तैयार करते हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि प्राकृतिक खेती में भारी वित्तीय पूंजी लगाने की जगह नियमित शारीरिक श्रम और देखरेख की ज्यादा जरूरत पड़ती है। इसी प्राकृतिक विधि से प्राप्त आय के दम पर वह अपने पूरे परिवार की जीविका भली-भांति चला रहे हैं।
पाठा के रामलाल मिश्रा: चंदन के पेड़ों से दीर्घकालिक संपत्ति
चित्रकूट के पाठा इलाके में रहने वाले रामलाल मिश्रा ने नकदी फसलों के साथ दीर्घकालिक निवेश पर ध्यान केंद्रित किया है। उन्होंने अपने फार्म हाउस पर अलग-अलग किस्मों के फलों की बागवानी के साथ चंदन के पौधे भी लगाए हैं। उनके प्रक्षेत्र में दो अलग-अलग प्रकार के चंदन के वृक्ष तैयार हो रहे हैं। रामलाल मिश्रा के अनुसार, चंदन के एक पौधे को पूर्ण रूप से परिपक्व होने में करीब 10 साल का समय लग जाता है। जब यह 10 वर्ष बाद तैयार होता है, तो प्रति पेड़ से लगभग एक लाख रुपये की भारी आमदनी प्राप्त होती है, जो किसी भी पारंपरिक फसल से कई गुना अधिक है।
विजय सिंह: औषधीय पौधों से आवारा मवेशियों का हल और अच्छी पैदावार
पाठा क्षेत्र के मानिकपुर निवासी विजय सिंह विगत 20 वर्षों से इस इलाके में कृषि कार्य से जुड़े हुए हैं। उन्होंने उस दौर में अपने सफर की नींव रखी थी जब इलाके में पानी की भारी किल्लत थी, और उन्होंने सबसे पहले कम पानी की जरूरत वाले बालीदार गेहूं की पैदावार सफलतापूर्वक की। बदलते समय के साथ उन्होंने विभिन्न प्रकार की खेती अपनाई और अपनी आय में इजाफा किया। पाठा में फसलों को चरने वाले बेसहारा और छुट्टा पशुओं से बचाने के लिए उन्होंने एक अनोखा तरीका निकाला। उन्होंने खेतों की मेड़ों पर अश्वगंधा, सोनामुखी और सतावर जैसे औषधीय पौधे लगा दिए। मवेशी इन औषधीय पौधों को नहीं खाते, जिससे मुख्य फसल सुरक्षित रहती है और इन औषधियों को बाजार में बेचकर वह अलग से लाखों रुपये कमा रहे हैं।
योगेश जैन: 50 किसानों के क्लस्टर से सामूहिक विपणन की ताकत
कर्वी तहसील के बेड़ी पुलिया क्षेत्र के काश्तकार योगेश जैन वर्ष 2010 से ही जैविक और प्राकृतिक कृषि के मॉडल पर निरंतर कार्य कर रहे हैं। अपने प्रक्षेत्र में वह आंवला, पपीता, धान और अरहर जैसी विविध नकदी एवं खाद्य फसलों की पैदावार करते हैं। अकेले काम करने के बजाय योगेश जैन ने क्षेत्र के करीब 50 किसानों को जोड़कर एक मजबूत समूह बनाया है। यह क्लस्टर अपनी जैविक उपज को सीधे बाजार में एक साथ बेचता है, जिससे बिचौलियों की भूमिका समाप्त होती है और किसानों को सही दाम मिलता है। इस सामूहिक प्रयास और विविधीकरण के माध्यम से वह हर साल करीब 8 से 9 लाख रुपये का मुनाफा प्राप्त कर रहे हैं।
कृषि विभाग की गांव-गांव पहुंच और बढ़ती जागरूकता
क्षेत्र के किसानों के इन सफल प्रयोगों को व्यापक स्तर पर लागू करने के लिए अब सरकारी मशीनरी भी सक्रिय भूमिका निभा रही है। कृषि विभाग के अधिकारी और कर्मचारी विभिन्न ग्राम पंचायतों में जाकर चौपालें आयोजित कर रहे हैं। इन अभियानों के जरिए किसानों को उन्नत तकनीकों, प्राकृतिक खेती की बारीकियों और सरकारी अनुदान योजनाओं की जानकारी दी जा रही है। नई योजनाओं की सुलभता और सफल किसानों के अनुभव देखकर बुंदेलखंड के अन्य ग्रामीण भी अब पारंपरिक पलायन का रास्ता छोड़कर अपनी पैतृक भूमि को हरा-भरा और उत्पादक बनाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं।



















