राजस्थान के सिरोही जिले से सामने आया एक मामला बच्चों की सुरक्षा को लेकर पूरे सिस्टम की नाकामी उजागर कर रहा है। यहाँ बिना किसी सरकारी अनुमति के चल रहे एक निजी हॉस्टल में 5 से 11 साल तक के मासूम बच्चों के साथ यौन शोषण की घटना सामने आई। इतना ही नहीं, जब इन सहमे हुए बच्चों को कानूनी प्रक्रिया के तहत मेडिकल जांच के लिए सरकारी अस्पताल ले जाया गया, तो वहाँ तैनात एक डॉक्टर ने कथित तौर पर पुलिसकर्मियों से बियर मांगकर पूरी घटना को और शर्मनाक बना दिया।
गुमनाम शिकायत से खुला हॉस्टल में दरिंदगी का राज
यह मामला तीन दिन पहले तब सामने आया जब जिला विधिक सेवा प्राधिकरण यानी डीएलएसए को एक गुमनाम ई-मेल मिला। इस ई-मेल में हॉस्टल के भीतर बच्चों के साथ लगातार हो रहे यौन उत्पीड़न की खौफनाक जानकारी दी गई थी। शिकायत को हल्के में लेने के बजाय डीएलएसए सचिव सावित्री आनंद ने तुरंत बाल कल्याण समिति यानी सीडब्ल्यूसी और स्थानीय पुलिस के साथ मिलकर एक संयुक्त टीम बनाई। इस टीम ने बिना देर किए हॉस्टल पर अचानक छापा मार दिया, ताकि सबूत मिटने न पाएं। छापे के दौरान सामने आया कि इस हॉस्टल के पास कोई वैध रजिस्ट्रेशन ही नहीं था, यानी यह पूरी तरह अवैध रूप से चल रहा था, फिर भी यहाँ 30 बच्चों को रखा जा रहा था। इनमें से 6 मासूम बच्चों ने रोते हुए अधिकारियों के सामने अपने साथ हुई दरिंदगी की पूरी आपबीती बयां की, जिसने मौके पर मौजूद हर अधिकारी को भीतर तक झकझोर दिया।
रात में अस्पताल पहुंचे बच्चे, वहाँ मिली एक और शर्मिंदगी
हॉस्टल में मासूमों पर बीती आपबीती सामने आने के बाद कानूनी कार्रवाई के तहत पीड़ित बच्चों को उसी रात मेडिकल परीक्षण के लिए सरकारी अस्पताल ले जाया गया, क्योंकि ऐसे मामलों में जल्द से जल्द मेडिकल जांच जरूरी होती है। लेकिन यहाँ इन बच्चों का इंतजार एक और दर्दनाक अनुभव कर रहा था। आरोप है कि उस वक्त इमरजेंसी ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर पूरी तरह नशे की हालत में था। पहले से डरे-सहमे और सदमे में बैठे इन बच्चों का इलाज और मेडिकल परीक्षण करने के बजाय उस डॉक्टर ने वहाँ खड़े पुलिसकर्मियों से खुलेआम बियर की बोतलें मांगनी शुरू कर दीं। इस पूरे शर्मनाक घटनाक्रम के गवाह बाल कल्याण समिति के सदस्य और डीएलएसए के वरिष्ठ अधिकारी भी बने, जो अपनी आंखों के सामने डॉक्टर की इस असंवेदनशीलता और अमानवीय रवैये को देखकर स्तब्ध रह गए। एक तरफ बच्चों को संभालने और उनका भरोसा जीतने की जरूरत थी, दूसरी तरफ जिस डॉक्टर से मदद की उम्मीद थी, वही अपनी ड्यूटी को लेकर पूरी तरह गैरजिम्मेदार नजर आया।
वार्डन पर पोक्सो के तहत मामला दर्ज, सबूत के लिए सीसीटीवी और कंप्यूटर जब्त
बाल कल्याण समिति के सदस्य प्रताप सिंह और डीएलएसए सचिव ने अस्पताल में हुई इस घटना को चिकित्सा विभाग की घोर लापरवाही और आपराधिक कृत्य करार दिया है। इसे लेकर चिकित्सा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को तलब किया गया है और आरोपी डॉक्टर के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई की तैयारी चल रही है। वहीं दूसरी ओर पुलिस ने अवैध हॉस्टल के संचालक और मुख्य आरोपी वार्डन के खिलाफ पॉक्सो यानी पोक्सो एक्ट सहित अन्य गंभीर धाराओं में मामला दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर लिया है। इस पूरे नेटवर्क की तह तक जाने और यह पता लगाने के लिए कि इस अवैध हॉस्टल के पीछे और कौन-कौन शामिल था, एडिशनल एसपी की अगुवाई में एक विशेष टीम गठित की गई है, जो जांच में जुटी है। पुख्ता सबूत जुटाने के मकसद से पुलिस ने हॉस्टल परिसर से 2 कंप्यूटर जब्त किए हैं और पिछले एक हफ्ते की सीसीटीवी फुटेज को भी अपने कब्जे में लेकर सील कर दिया है, ताकि जांच के दौरान इनसे छेड़छाड़ न हो सके।
बच्चों की सुरक्षा और सरकारी सिस्टम पर उठे सवाल
इस पूरे मामले ने राजस्थान में बच्चों की सुरक्षा और सरकारी अस्पतालों के कामकाज, दोनों पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। एक तरफ शहर के भीतर बिना किसी सरकारी मंजूरी के चल रहे एक हॉस्टल में लंबे समय तक मासूमों का बचपन कुचला जाता रहा और स्थानीय प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं लगी। दूसरी तरफ जब यही पीड़ित बच्चे न्याय की उम्मीद लेकर सरकारी तंत्र के पास पहुंचे, तो वहाँ भी उन्हें एक बेहद शर्मनाक और अपमानजनक स्थिति से गुजरना पड़ा। यह घटना बताती है कि सिर्फ अवैध संस्थानों पर नजर रखना ही काफी नहीं है, बल्कि सरकारी अस्पतालों में ड्यूटी पर तैनात स्टाफ की जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है। पुलिस का मानना है कि गहनता से पूछताछ और आगे की जांच में इस हॉस्टल कांड से जुड़े पीड़ित बच्चों की संख्या और बढ़ सकती है।













