झुंझुनूं में सत्यप्रकाश सोनी की रिपोर्ट के अनुसार, तकनीक के प्रसार के साथ व्यापार के तौर-तरीके भले ही बदल चुके हों और आज कारोबारी कंप्यूटर, लैपटॉप तथा डिजिटल माध्यमों पर हिसाब रखने लगे हों, लेकिन सदियों पुरानी बही-खातों की परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है। हर साल दीपावली के पावन पर्व पर व्यापारी नई बही-खाते खरीदते हैं, उनका विधि-विधान से पूजन करते हैं और इसी के साथ अपने नए व्यापारिक वर्ष का श्रीगणेश करते हैं। झुंझुनूं के स्थानीय बाजारों में इन दिनों बही-खातों की दुकानों पर ग्राहकों की खासी चहल-पहल देखी जा रही है।
दीपावली पर होता है विशेष पूजन
व्यापार जगत के लिए दीपावली का पर्व अत्यधिक महत्व रखता है। इस खास दिन व्यवसायी अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में शुभ मुहूर्त के अनुसार माता लक्ष्मी की आराधना करते हैं और साथ ही नई बही-खातों का पूजन संपन्न करते हैं। पूजा-अर्चना पूर्ण होने के उपरांत ही नई बहियों में नए वित्तीय वर्ष का लेखा-जोखा दर्ज करने की शुरुआत की जाती है। स्थानीय व्यापारियों का ऐसा अटूट विश्वास है कि यदि उचित और शुभ मुहूर्त में अनुष्ठान कर नए कार्य का आरंभ किया जाए, तो प्रतिष्ठान में सुख-समृद्धि का वास होता है। परंपरा के अनुसार बही के अतिरिक्त कांटा-तराजू और बांट का भी पूजन विधि-विधान से किया जाता है।
बाजारों में विभिन्न आकारों की बहियां उपलब्ध
जैसे-जैसे दीपावली का पर्व नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे बही-खातों की दुकानों पर रौनक और ग्राहकों की भीड़ बढ़ती जा रही है। बाजार में जरूरत के अनुसार छोटे आकार से लेकर बड़े आकार तक की बहियां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। इनकी विभिन्न डिजाइन और साइज ग्राहकों का ध्यान अपनी ओर खींच रहे हैं। छोटे स्तर के दुकानदार अपनी आवश्यकतानुसार छोटी बहियों का चयन कर रहे हैं, जबकि बड़े कारोबारी बड़े आकार की बहियों की खरीदारी कर रहे हैं। कई ऐसे पुराने व्यापारी भी हैं जो हर दीपावली पर नई बही खरीदने के इस सिलसिले को एक परंपरा के रूप में निरंतर निभाते आ रहे हैं।
कंप्यूटर और लैपटॉप भी बने पूजन का हिस्सा
वर्तमान समय में व्यापार का एक बहुत बड़ा हिस्सा कंप्यूटर और लैपटॉप के जरिए संचालित होता है। ऑनलाइन बिलिंग सिस्टम और डिजिटल भुगतानों ने रोजमर्रा के कामकाज को काफी सुगम बना दिया है। इसके बावजूद ढेरों व्यापारी आज भी अपनी बही में हाथ से हिसाब लिखना ज्यादा बेहतर मानते हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि बही-खाता उनके कारोबार का एक अनिवार्य अंग है, इसलिए आज के आधुनिक दौर में तकनीक के साथ पुरानी रीति-रिवाज भी समानांतर चल रहे हैं। पहले के समय में दीपावली पर केवल बही, कांटा, तराजू और बांट की ही पूजा की जाती थी, लेकिन अब समय के साथ इसमें कंप्यूटर और लैपटॉप को भी शामिल कर लिया गया है। जिन कारोबारियों का अधिकांश कार्य डिजिटल उपकरणों पर ही निर्भर रहता है, वे अब इन गैजेट्स की भी पारंपरिक तरीके से पूजा करने लगे हैं।
युवा पीढ़ी भी निभा रही है परंपरा
आज की युवा पीढ़ी के व्यापारी भी अपने बुजुर्गों की इस सांस्कृतिक विरासत और परंपरा को पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। युवा उद्यमी भले ही पूरी तरह आधुनिक तकनीक का उपयोग करके अपना व्यापार संभाल रहे हों, लेकिन दीपावली के खास मौके पर नई बही खरीदना और उसकी पूजा करना वे बिल्कुल नहीं भूलते। इस संबंध में बही विक्रेता रमेश गाडिया ने जानकारी दी कि काम को तेज और आसान बनाने के उद्देश्य से व्यापारी बेशक कंप्यूटर की तरफ आए हैं, मगर बही-खातों की प्रासंगिकता और महत्व आज भी बाजार में पूरी तरह बरकरार है। छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े पैमाने के कारोबारी तक सभी इन बहियों का उपयोग कर रहे हैं। दीपावली के पर्व पर नई बही खरीदने और उसका पूजन करने की यह प्राचीन परंपरा आज भी उतनी ही मजबूती से जारी है, जिसमें अब कंप्यूटर और लैपटॉप का पूजन भी जुड़ गया है।



















