दीपावली का पावन पर्व देश के हर हिस्से में अलग-अलग मान्यताओं और अनूठे रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। राजस्थान के करौली जिले में भी एक ऐसी ही बेहद खास परंपरा बरसों से चली आ रही है, जिसे आज भी स्थानीय लोग पूरी आस्था के साथ निभा रहे हैं। इस इलाके में दीपावली के पावन अवसर पर मां लक्ष्मी के पूजन के दौरान घरों में मिट्टी की हाट भरने का खास विधान है। क्षेत्रीय लोगों का ऐसा अटूट विश्वास है कि इस विशेष हाट के बिना दीपावली की पूजा अधूरी ही रह जाती है। यही वजह है कि जैसे-जैसे रोशनी का यह त्योहार नजदीक आता है, करौली के बाजारों में मिट्टी के दीयों के साथ-साथ इन विशेष हाटों की मांग भी तेजी से बढ़ने लगती है।
कुंभकार परिवारों की मेहनत से तैयार होती है हाट
करौली की इस पुरानी परंपरा को जीवित रखने और आगे बढ़ाने का पूरा जिम्मा स्थानीय कुंभकार परिवारों के कंधों पर है। पर्व से काफी हफ्तों पहले ही कारीगर इन हाटों के निर्माण कार्य में जुट जाते हैं। शुद्ध मिट्टी और गोबर के खास मिश्रण से इसे एक निश्चित आकार दिया जाता है। इसके बाद इसे धूप में अच्छी तरह सुखाया जाता है और फिर पारंपरिक शैली में रंगा व सजाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में कारीगरों को काफी ज्यादा मेहनत और लंबे समय की दरकार होती है, तब जाकर यह कलाकृति बाजार में बिक्री के लिए पहुंच पाती है।
पांच कुल्हड़ों के मेल से बनती है विशेष रचना
देखने में यह मिट्टी की हाट भले ही एक सामान्य सी वस्तु लगे, लेकिन इसे बनाने की कला और तरीका बेहद अनोखा है। यह पूरी रचना मूल रूप से पांच मिट्टी के कुल्हड़ों का एक अनूठा संयोजन होती है। इसमें नीचे की तरफ चार छोटे कुल्हड़ आपस में मजबूती से जुड़े होते हैं, जबकि पांचवें और मुख्य कुल्हड़ को उन चारों के ठीक ऊपर करीने से रखा जाता है। कुंभकार परिवार इन सभी हिस्सों को जोड़ने और सुखाने के बाद पारंपरिक रंगों और देसी लोक चित्रकारी से बहुत ही सुंदर ढंग से सजाते हैं, जो इसकी सबसे बड़ी और मुख्य पहचान होती है।
पांच तरह की मिठाइयों से होती है हाट की भराई
दीपावली के दिन जब शाम को घरों में विधि-विधान से लक्ष्मी पूजन किया जाता है, तब इस मिट्टी की हाट को कभी भी खाली नहीं रखा जाता है। इसके अंदर अलग-अलग प्रकार की स्वादिष्ट मिठाइयां भरी जाती हैं। प्राचीन स्थानीय परंपरा के मुताबिक, इस हाट को लट्टू, बर्फी, इमरती समेत कुल पांच तरह की अलग-अलग मिठाइयों से भरा जाता है। करौली के लोगों की इस रस्म को परिवार की सुख-समृद्धि, घर के बच्चों की लंबी उम्र और वंश की निरंतर वृद्धि से जोड़कर देखा जाता है, जो इसे और अधिक महत्वपूर्ण बनाता है।
सोने-चांदी के विकल्प भी नहीं डिगा पाए लोगों की आस्था
करौली की इस लोक परंपरा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि आधुनिक युग में बाजार के भीतर पूजा-पाठ के लिए कई अन्य विकल्प और धातुएं आ चुकी हैं, इसके बावजूद इस मिट्टी की हाट का महत्व जरा सा भी कम नहीं हुआ है। स्थानीय जनमानस में इसे पूरी तरह से पवित्रता और शुभता का प्रतीक माना जाता है। यही एक मुख्य कारण है कि आज के दौर में भी लोग लक्ष्मी पूजन के लिए सोने या चांदी के विकल्पों को छोड़कर केवल मिट्टी की हाट ही खरीदना सबसे ज्यादा पसंद करते हैं। त्योहार पास आते ही बाजारों में इन कुंभकार परिवारों के हाथों बनी हाट की धूम मच जाती है और हर घर में इसकी खरीददारी होती है। यह अनूठी परंपरा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक भर नहीं है, बल्कि यह स्थानीय कारीगरों की कला और हमारे पारंपरिक माटी शिल्प से भी बहुत गहराई से जुड़ी हुई है।



















