त्योहारी सीजन के आगमन के साथ ही गुलाबी नगरी में घरों के कायाकल्प और सजावट का माहौल पूरी तेजी पर है। अपनी समृद्ध हस्तशिल्प और कलात्मक विरासत के लिए दुनिया भर में मशहूर जयपुर में देश के विभिन्न हिस्सों की कला को हमेशा से खास कद्र मिलती रही है। दीपावली के पर्व से ठीक पहले शहर में शिल्पकला और लकड़ी के सामान की खरीदारी बहुत बढ़ जाती है। इसी अवसर पर देशभर के हुनरमंद कारीगर अपने उत्पाद लेकर यहां जुटते हैं। इन दिनों जयपुर के प्रतिष्ठित जवाहर कला केंद्र में स्वदेशी आर्ट एंड क्राफ्ट फेयर चल रहा है, जहां उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से आए काष्ठशिल्पी अपनी प्रसिद्ध कलाकृतियां और फर्नीचर लेकर पहुंचे हैं। सहारनपुर के इस पारंपरिक काम की लोकप्रियता केवल त्योहारों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि राजधानी के बाशिंदों के बीच इसकी मांग सालभर बनी रहती है।
सहारनपुर से आए कारीगर राहुल कुमार के अनुसार, इस फर्नीचर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि छोटे सजावटी सामान से लेकर बड़े से बड़े ढांचे तक, हर चीज पूरी तरह हाथों से गढ़ी जाती है। मशीनी सांचों के बजाय हाथों के हुनर से तैयार होने की वजह से यह फर्नीचर न केवल बेहद आकर्षक दिखता है, बल्कि अपनी मजबूती और टिकाऊपन के लिए भी पूरे भारत में जाना जाता है। यहां घर की आंतरिक साज-सज्जा, रसोई, बागवानी, बालकनी और खुले परिसर के लिए उपयुक्त हर प्रकार का काष्ठशिल्प उपलब्ध है, जिसे लोग त्योहार के दौरान अपने आशियाने को नया रूप देने के लिए उत्साहपूर्वक चुन रहे हैं।
सागौन, शीशम और चंदन की कीमती लकड़ियों से निर्माण
बाजारों में मिलने वाले आम फर्नीचर अक्सर हल्की लकड़ियों या दबाए गए लकड़ी के बुरादे यानी पार्टिकल बोर्ड से बनाए जाते हैं, जो जल्दी खराब हो जाते हैं। इसके विपरीत, सहारनपुर के कारीगर अपनी कृतियों में केवल शीशम, चंदन और सागौन जैसी टिकाऊ, मजबूत और महंगी लकड़ियों का ही उपयोग करते हैं। निर्माण प्रक्रिया की शुरुआत लकड़ी के चयन से ही हो जाती है, जहां कच्ची लकड़ी को पूरी तरह सुखाने और तैयार करने में ही दो से तीन साल का लंबा वक्त लगता है। गीली लकड़ी के प्राकृतिक रूप से सूखने के बाद ही उस पर कटाई, महीन नक्काशी और पॉलिशिंग का काम शुरू किया जाता है।
कारीगरों का कहना है कि इन दुर्लभ और गुणवत्तापूर्ण लकड़ियों की अपनी लागत ही लाखों रुपयों में होती है। यही वजह है कि कार्यशालाओं में लकड़ी का एक छोटा सा टुकड़ा भी व्यर्थ नहीं जाने दिया जाता। बड़े ढांचों के निर्माण के बाद बचे छोटे-छोटे हिस्सों का सदुपयोग छोटे सजावटी सामान, बक्से या अन्य उपयोगी घरेलू वस्तुएं बनाने में किया जाता है। प्रत्येक वस्तु पर की गई बारीक हाथ की नक्काशी उसकी सुंदरता और मजबूती को वर्षों तक बरकरार रखती है।
जयपुर के खरीदारों में जबरदस्त रुझान और मूल्य सीमा
सहारनपुर के काष्ठशिल्पियों के मुताबिक, जयपुर के कलाप्रेमी ग्राहक उम्दा कारीगरी की पूरी कीमत चुकाने के लिए सहर्ष तैयार रहते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए व्यापारी यहां 500 रुपये के छोटे हस्तशिल्प उपहारों से लेकर 50 हजार रुपये तक के बड़े और भव्य फर्नीचर लेकर पहुंचे हैं। दीपावली से पहले लोग घरों की सघन साफ-सफाई के साथ-साथ नया फर्नीचर स्थापित करना शुभ और आवश्यक मानते हैं, जिसके चलते इस वक्त बिक्री में भारी उछाल दर्ज किया जा रहा है।
मेले में पारंपरिक बड़े झूले, कलात्मक मेज-कुर्सियां, नक्काशीदार ड्रेसिंग टेबल, सोफा सेट और लकड़ी के फ्लावर पॉट की सबसे ज्यादा मांग बनी हुई है। इसके अलावा, दीपावली पर परिजनों और परिचितों को भेंट करने के लिए लोग उपहार के रूप में छोटे सजावटी काष्ठ उत्पादों को भी बड़ी संख्या में खरीद रहे हैं। कारीगर राहुल कुमार बताते हैं कि सहारनपुर की काष्ठकला का यह स्वरूप किसी अन्य स्थान पर तैयार नहीं किया जा सकता, क्योंकि यहां के कारीगरों को यह हुनर पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत में मिलता है। लकड़ियों के विशेष उपचार से लेकर अंतिम फिनिशिंग और बारीक नक्काशी की यह विद्या सहारनपुर की सदियों पुरानी कारीगरी की पहचान है।




















