अक्टूबर का महीना शुरू होते ही जब गुलाबी ठंड दस्तक देती है, तो मारवाड़ की गलियों में खान-पान का पूरा मिजाज बदलने लगता है। राजस्थान के पाली जिले की पहचान यूं तो विश्व प्रसिद्ध मेहंदी की खुशबू से होती है, लेकिन सर्दियों का मौसम आते ही यहां की पारंपरिक मिठाइयों का जायका सबसे आगे आ जाता है। जैसे ही मौसम में हल्की ठंडक घुलती है, पाली के सोजत कस्बे में प्रसिद्ध 'तीलोट मावा' भट्ठियों पर पकने लगता है। सोजत में भंवर चक्की के नाम से जाने जाने वाले भंवर बा का यह मावा लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय है। यह केवल एक आम मिठाई भर नहीं है, बल्कि बदलते मौसम में शरीर को तंदुरुस्ती और ऊर्जा देने वाला खान-पान का एक अनूठा संगम है। अक्टूबर आते ही सोजत के हलवाइयों की दुकानों पर लोहे के विशाल कढ़ावों में शुद्ध दूध को लगातार कढ़ाकर गाढ़ा मावा बनाने का दौर शुरू हो जाता है।
धीमी आंच पर सिकाई और सूखे मेवों का भरपूर तड़का
इस पारंपरिक मिठाई की असली पहचान इसका विशुद्ध देशी अंदाज है। हलवाई शुद्ध दूध से निकले खोये को धीमी आंच पर तब तक भूनते हैं, जब तक कि उसमें से एक खास सोंधी खुशबू न उठने लगे। इसके बाद इसमें तिलों के साथ-साथ बादाम, काजू, पिस्ता और इलायची जैसे सूखे मेवों का भरपूर मिश्रण मिलाया जाता है। यह तड़का मावे को न केवल बेहतरीन स्वाद देता है, बल्कि सर्दियों के महीनों में इसे शरीर के लिए पौष्टिक और ऊर्जादायक भी बना देता है।
कड़ाके की ठंड में गर्माहट और रोग प्रतिरोधक क्षमता का सहारा
सर्दियों के दिनों में शरीर को भीतर से गर्माहट देने और इम्युनिटी यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने के लिए सोजत का यह तीलोट मावा बहुत गुणकारी माना जाता है। इस मौसम में तिल और मेवों का सेवन सेहत के लिहाज से रामबाण माना जाता है, क्योंकि इनका यह मेल शरीर के भीतर प्राकृतिक गर्मी बनाए रखता है। यही कारण है कि पाली जिले के स्थानीय निवासियों के अलावा आसपास के जिलों और अन्य राज्यों से आने वाले लोग भी सोजत से तीलोट मावा पैक करवाकर अपने साथ ले जाना बिल्कुल नहीं भूलते। बदलते मौसम में सोजत आने वाले मुसाफिरों और सैलानियों के लिए सुलगती भट्ठियों से निकला ताजा और गरमा-गरम तीलोट मावा चखना एक खास अनुभव बन जाता है।
पारंपरिक भट्ठियों में तैयार होने का पारंपरिक तरीका
सोजत के तीलोट मावे का स्वाद आधुनिक मशीनों से नहीं, बल्कि लकड़ी और कोयले की पारंपरिक भट्ठियों से आता है। धीमी आंच पर देर तक पकने के कारण इसका सोंधापन लंबे समय तक बना रहता है। इसे तैयार करने की पूरी प्रक्रिया तीन प्रमुख चरणों में बंटी होती है
- शुद्ध दूध की कड़ाई: सबसे पहले लोहे के बड़े कढ़ाव में शुद्ध दूध को घंटों तक उबाला जाता है, जिससे गाढ़ा और दानेदार खोया तैयार होता है।
- तिल और मेवों का मिश्रण: जब मावा अच्छी तरह तैयार हो जाता है, तब उसमें भुने हुए सफेद तिल, काजू, बादाम, पिस्ता और हरी इलायची का बारीक पाउडर डाला जाता है।
- धीमी आंच पर अंतिम सिकाई: सभी सामग्रियों को एक साथ मिलाकर धीमी आंच पर पकाया जाता है, जिससे सूखे मेवों और तिल का प्राकृतिक तेल पूरी तरह से मावे में रच-बस जाए और हर निवाले में उसका स्वाद आए।
पाली के गुलाब हलवे जैसी लोकप्रियता
जैसे ही अक्टूबर में मौसम खुशनुमा होता है, लोग सोजत के तीलोट मावे को नाश्ते और मिठाई दोनों रूपों में चाव से खाने लगते हैं। ग्राहकों की भारी मांग को देखते हुए सोजत के हलवाई बाजारों में इसका निर्माण तेजी से बढ़ा देते हैं। मांग को पूरा करने के लिए रोजाना भारी मात्रा में यह मावा तैयार किया जाता है। स्थानीय खान-पान की दुनिया में यह माना जाता है कि पाली के मशहूर गुलाब हलवे के बाद सर्दियों में सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली मिठाई सोजत का यही तीलोट मावा है।






















