सावन के पवित्र महीने का आगमन होते ही चारों ओर भगवान शिव की भक्ति का अद्भुत उल्लास छा जाता है। देश के विभिन्न कोनों से शिवभक्त अपने आराध्य देव की विशेष पूजा-अर्चना के लिए निकल पड़ते हैं। इसी कड़ी में बिहार के भागलपुर जिले में स्थित सुल्तानगंज का विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला भी पूरे जोरों पर शुरू हो जाता है। इस मेले की भव्यता और आस्था का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां दूर-दराज से लाखों कांवड़िये एकत्रित होते हैं। इन सभी श्रद्धालुओं का मुख्य उद्देश्य सुल्तानगंज से पवित्र गंगाजल भरकर बाबा बैद्यनाथ धाम के लिए प्रस्थान करना होता है। लेकिन क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि आखिर इस कठिन यात्रा के लिए गंगाजल केवल सुल्तानगंज से ही क्यों लिया जाता है? इस सदियों पुरानी परंपरा के पीछे कई गहरी धार्मिक और भौगोलिक मान्यताएं छिपी हुई हैं, जो इस स्थान को शिवभक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती हैं।
105 किलोमीटर की कठिन पैदल यात्रा
जैसे ही सावन का महीना आरंभ होता है, पूरा सुल्तानगंज शहर कांवड़ियों के भगवा रंग से सराबोर हो जाता है। श्रद्धालु यहां आकर पूरे विधि-विधान से पवित्र गंगा नदी में स्नान करते हैं और फिर अपने कांवड़ में जल भरते हैं। इसके बाद शुरू होती है देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम तक की 105 किलोमीटर लंबी और बेहद कठिन पैदल यात्रा। ज्यादातर श्रद्धालु इस पूरी दूरी को नंगे पांव चलकर तय करते हैं, हालांकि कुछ लोग अपनी सुविधा के अनुसार वाहनों का भी सहारा लेते हैं। रास्ते भर बोल बम के जयकारे गूंजते रहते हैं, जो इस कठिन सफर में ऊर्जा भरने का काम करते हैं। इस पूरी यात्रा का मुख्य केंद्र सुल्तानगंज का वह घाट होता है, जहां से जल उठाया जाता है। अजगैबीनाथ मठ के मठाधीश प्रेमानंद महाराज के अनुसार, इस विशेष स्थान से जल ले जाने के पीछे कई प्राचीन कारण और मान्यताएं जुड़ी हुई हैं, जो इसे अन्य स्थानों से अलग करती हैं।
उत्तरवाहिनी गंगा का अद्भुत रहस्य
सुल्तानगंज के गंगाजल को इतना पवित्र और विशेष माने जाने का सबसे प्रमुख कारण भौगोलिक और आध्यात्मिक दोनों है। सुल्तानगंज से लेकर कहलगांव तक, गंगा नदी का प्रवाह दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर हो जाता है। इसे उत्तरवाहिनी गंगा के नाम से जाना जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार, उत्तर दिशा को भगवान शिव की हृदयस्थली माना जाता है। स्वयं भगवान शिव का वास भी उत्तर दिशा में स्थित कैलाश पर्वत पर है। यही कारण है कि जब भी भगवान शिव का जलाभिषेक किया जाता है, तो सबसे पहले उनके उत्तरी भाग में जल अर्पित करने की परंपरा है। उत्तर दिशा की ओर बहने वाले जल को शिव के लिए अत्यंत प्रिय और शुभ माना गया है। पूरे भारतवर्ष में केवल दो ही ऐसे पवित्र स्थान हैं जहां गंगा नदी उत्तर दिशा की ओर बहती है, जिनमें पहला सुल्तानगंज और दूसरा काशी विश्वनाथ शामिल है। यही दुर्लभ संयोग सुल्तानगंज के जल को बैद्यनाथ धाम के जलाभिषेक के लिए सबसे उपयुक्त बनाता है।
भगवान राम से जुड़ी है प्राचीन परंपरा
उत्तरवाहिनी गंगा के अलावा, इस स्थान का महत्व त्रेता युग की एक अत्यंत प्रसिद्ध पौराणिक कथा से भी जुड़ा हुआ है। दूसरी बड़ी मान्यता यह है कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने भी इसी सुल्तानगंज से पवित्र गंगाजल भरकर अपनी कांवड़ यात्रा शुरू की थी। कहा जाता है कि उन्होंने यहीं से जल लेकर बाबा बैद्यनाथ धाम जाकर भगवान शिव का जलाभिषेक किया था। उसी प्राचीन काल से यह पवित्र परंपरा आज तक अनवरत चली आ रही है। भगवान राम के पदचिह्नों पर चलते हुए ही आज भी लाखों श्रद्धालु सुल्तानगंज से जल भरकर अपनी यात्रा आरंभ करते हैं और बाबा बैद्यनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
नेपाल और भूटान से भी पहुंचते हैं श्रद्धालु
श्रावणी मेले और सुल्तानगंज की इस कांवड़ यात्रा का आकर्षण केवल बिहार या भारत के कुछ राज्यों तक ही सीमित नहीं है। इसकी ख्याति इतनी दूर तक फैली है कि पड़ोसी देशों से भी शिवभक्त यहां खींचे चले आते हैं। भारत के विभिन्न हिस्सों के अलावा नेपाल और भूटान जैसे देशों से भी बड़ी संख्या में कांवड़िये यहां पहुंचते हैं। ये सभी श्रद्धालु बिना किसी भेदभाव के एक साथ सुल्तानगंज से गंगाजल भरते हैं और पूरे रास्ते नाचते-गाते, ढोल-नगाड़ों की थाप पर शिव भजनों में मगन होकर बाबा बैद्यनाथ धाम की ओर बढ़ते हैं। आस्था और उत्साह का यह सिलसिला कई दशकों से इसी प्रकार चला आ रहा है और हर सावन में कांवड़ियों की यह अद्भुत रौनक देखते ही बनती है।




















